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शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2021

महात्मा गांधी का भाषा चिंतन



 महात्मा गांधी का भाषा चिंतन

- प्रो. दिलीप सिंह
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गांधी और भाषा

यह बात कहने की नहीं है कि गांधी जी कोई भाषा वैज्ञानिक नहीं थे। लेकिन कहने की बात यह जरूर है कि वे अपने समय के भारत के भाषाई यथार्थ को जाँच-परख चुके थे – गहराई के साथ। उनके भाषाई चिंतन की पृष्ठभूमि में ये यथार्थ ही अनुभूत रूप में व्यक्त मिलते हैं। गांधी जी सत्य के आग्रही थे, अतः भाषा के प्रश्न को भी वे सत्यबल के साथ हल करने को दृढ़ संकल्प थे। यह ध्यान दें तो अचरज होता है कि गांधी जी के समय का कोई नेता हमें ‘भाषा’ के प्रश्न को इतने व्यापक धरातल पर व्याख्यायित करता या जीवन पर्यंत इनसे जूझता नहीं मिलता। वे भारतीय भाषाओं के लिए लड़े–भिड़े भी और अपने भाषा- दर्शन को सीधे–सच्चे ढंग से देश की जनता तक पहुँचाया भी। लिखकर, और अधिकतर अपने भाषणों के माध्यम से। इन पर दृष्टियात करें तो इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता कि उनकी भाषा–दृष्टि अत्यंत व्यापक थी। दो तरह से, एक तो वे भारतीय भाषाओं को उनका उचित देय दिलाने को दृढ़ प्रतिज्ञ थे और दूसरा कि भाषा के माध्यम से वे भावात्मक, सांस्कृतिक और भाषाई एकता का प्रयास इस तरह से कर रहे थे जो स्वतन्त्रता संग्राम का हिस्सा बन सके। संक्षेप में कहा जाय तो भारत की आत्मा (भाषाई अस्मिता) और भाषाई यथार्थ (बहुभाषिकता-बहुसांस्कृतिकता) की गांधी को स्पष्ट पहचान थी। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो गांधी एक सजग समाज भाषा विज्ञानी सिद्ध होते हैं। आगे यह प्रतिपादन स्वतः प्रमाणित होता जाएगा।

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गांधी का समय और भारतीय भाषा-परिदृश्य

भारत आने के बाद ही (1915) अपनी भारत-यात्रा के दौरान गांधी जी को यह भान हो गया था कि ब्रिटिश शासन अपने समस्त अलगाववादी अस्त्र –शस्त्रों के साथ भारतीय भाषाओं और उनकी अस्मिता के सभी तत्वों को कुचलने के षणयंत्र में लिप्त है। वे भलीभाँति समझ चुके थे कि ब्रिटिश शासन अँग्रेजी भाषा और संस्कृति के वर्चस्व को बढ़ाने की फिक्र में भाषाई धोखाधड़ी तक पर उतर आया है। बहुभाषिक भारत में ‘शिक्षा में भाषा’ के प्रश्न को भारतीय भाषाओं से जोड़ने के बजाय अँग्रेज नीति – नियंताओं ने अँग्रेजी भाषा के दबाव को ‘शिक्षा’ का लक्ष्य निर्धारित करके भारतीय संस्कृति तथा भारतीय भाषाओं को उपयोगी व्यवहार क्षेत्रों (डोमेन्स) में पीछे धकेलने की कसम खा ली थी। इतना ही नहीं भारतीय भाषाओं को देसी और गँवारू (वर्नाकुलर) सिद्ध करने की निंदनीय पहलें भी शुरू हो चुकी थीं। भाषा – अध्ययन के ऐसे –ऐसे पीठ और भाषाविद (?) ब्रिटिश शासन के दुष्चक्रों को साकार करने के लिए खड़े किए गए जो भारत की ‘सामासिक संस्कृति’ से रची- बसी फुलवारी को एक वीराने में तब्दील करने के प्रयास में प्राणप्रण से जुट गए थे। भारत में भाषा – संघर्ष (लैंग्वेज कांफ्लिक्ट) ही भाषाई यथार्थ है, इस तरह के भ्रामक भाषा वैज्ञानिक शोधपत्रों, पुस्तकों और सर्वेक्षण रपटों का अंबार लगा दिया गया था। इस तरह के मिथ्या प्रचारों में आर्य- द्रविड़ भाषाओं, हिन्दी और उसकी बोलियों, सीमावर्ती भाषाओं (बार्डर लैंग्वेजेज़) तथा हिन्दी – उर्दू पर न जाने कितने गलत भाषा वैज्ञानिक निष्कर्ष देकर इनके बीच वैमनस्य फैलाने की कोशिशें की जा रही थीं। सच, भारतीय भाषाओं और हिन्दी भाषा के लिए यह एक बहुत कठिन समय था। ऐसे माहौल में गांधी भारतीय भाषाओं के लिए ढाल बनकर आ खड़े हुए।

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दूरद्रष्टा गांधी

गांधी दूरद्रष्टा थे। वे भारत की सभी समस्याओं को जनसंदर्भ में देखने वाले मनीषी थे। अतः भारतीय भाषाओं पर किए जा रहे इस अनाचार को उन्होंने गहराई से पहचाना। वे अपने भाषाचिंतन में बार–बार यह संकेत देते हैं कि भाषा के टूटने का अर्थ है समाज और संस्कृति की टूटन। गांधी जी यह समझते थे कि भाषा में जोड़ने और तोड़ने की दोनों शक्तियाँ निहित होती हैं। वे समझ चुके थे कि ब्रिटिश शासन भारतीय भाषाओं का इस्तेमाल समाज और संस्कृति को तोड़ने के लिए करने पर आमादा है। ऐसे में वे भाषा द्वारा देश को जोड़ने का संकल्प लेकर आगे आए। गांधी का सपना संगठित राष्ट्र का सपना था। अपने इस सपने को साकार करने के लिए उन्होंने अन्य कई अवरोधों के साथ-साथ उन भाषाई अवरोधों को भी तोड़ने का प्रयास किया जिनकी पालपोस ब्रिटिश सरकार कर रही थी। इस मार्ग पर वे स्वयं चले और असंख्य भारतवासियों को भी इस पर चलने के लिए प्रेरित किया। गांधी जी की इसी भाषाई चेतना ने ‘राष्ट्रभाषा आंदोलन’ की नींव रखी, जिसका एकमात्र लक्ष्य था – राष्ट्रीय एकता की स्थापना।

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राष्ट्रभाषा हिंदी का गांधीवादी यथार्थ

भारतीय भाषाओं के निरंतर क्षरण और अपमान से गांधी जी क्षुब्ध थे। एकता, सहभाव और मेलजोल से निर्मित भारत का भाषाई यथार्थ उन्हें दरकता हुआ दिखाई पड़ने लगा था। भारतीय भाषा परिदृश्य में वे हिंदी भाषा के महत्व को जान चुके थे। एक अखिल भारतीय संपर्क भाषा (पैन इंडियन लिंक लैंग्वेज) के रूप में उसकी ‘जोड़ने वाली’ शक्ति को परख चुके थे। गांधी जी की दृष्टि में राष्ट्रभाषा हिंदी का यथार्थ पाँच मूलभूत क्षमताओं (कांपिटेंस) से आबद्ध था – भारत की प्रमुख संपर्क भाषा के रूप में, सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति की समन्वयक भाषा के रूप में, भारतीय साहित्य के उत्थान एवं आदान–प्रदान के लिए जोड़ भाषा के रूप में, एक वैज्ञानिक भाषा के रूप में तथा देश को एकजुट रखने वाली राष्ट्रभाषा के रूप में। हिंदी भाषा की इन क्षमताओं पर गांधी जी बोलते रहे, लिखते रहे और राष्ट्रभाषा आंदोलन को दिशा देने के लिए अपनी ‘भाषा नीति’ बनाते रहे। अपनी इसी नीति के चलते उन्होंने हिंदी भाषा के प्रचार–प्रसार को स्वतन्त्रता संग्राम का एक अस्त्र बनाया और अपने रचनात्मक कार्यक्रम में खादी के साथ हिंदी को एक महत्वपूर्ण स्थान दिया। कहना न होगा कि ये दोनों प्रतीक गांधी के सामने ही स्वावलंबन और स्वभाषा अस्मिता का पर्याय बन गए थे।

गांधी जी एक राष्ट्र के लिए एक राष्ट्रभाषा के हिमायती थे। उन्हीं के शब्दों में – ‘समूचे हिंदुस्तान के साथ व्यवहार करने के लिए हमको हमारी भाषाओं में से एक ऐसी जबान की जरूरत है जिसे अधिक से अधिक संख्या में लोग जानते और बोलते हैं और जो सीखने में सुगम हो। इसमें शक नहीं कि हिंदी ही ऐसी भाषा है’। गांधी जी के इस विचार में हिंदी भाषा की वकालत उसमें निहित ‘व्यापक व्यवहार की भाषा’ तथा ‘सुगम भाषा’ के गुणों के कारण की गई है। जिसे आगे चलकर उन्होंने राष्ट्रभाषा की संज्ञा दी और जिसके प्रचार–प्रसार के लिए पूरे भारत में, विशेष रूप से दक्षिण भारत में ऐसी अलख जगाई कि राष्ट्रीय एवं भावात्मक एकता की बयार बह चली। ‘राष्ट्रभाषा हिंदी’ के संदर्भ में उन्हीं का एक उद्धरण देखें – ‘अगर हिंदुस्तान को एक राष्ट्र बनाना है तो चाहे कोई माने या न माने, राष्ट्रभाषा हिंदी ही बन सकती है क्योकि हिंदी को जो स्थान प्राप्त है वह किसी दूसरी भाषा को नहीं मिल सकता। अगर स्वराज करोड़ों निरक्षरों का, दलितों और अंत्यजों का हो और हम सब के लिए हो तो हिंदी ही एकमात्र राष्ट्रभाषा हो सकती है’। यहाँ यह देखने की बात है कि गांधी जी ‘राष्ट्र भाषा’ के प्रश्न को भावावेश में नहीं उठा रहे हैं। एक यथार्थ भाषा परिदृश्य सदैव उनके समक्ष है। यहाँ भी वे हिंदी की व्याप्ति को अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में तरजीह दे रहे हैं। ‘हिंदी को जो स्थान प्राप्त है’ वाक्य स्पष्टत: हिंदी की अखिल भारतीय व्याप्ति तथा राष्ट्रीय एकीकरण की उसकी शक्ति की ओर इशारा कर रहा है। इस उद्धरण के दूसरे भाग में वे यह भी कह रहे है कि जो भाषा अभिजन की आकांक्षाओं का साथ दे वही स्वराज के सपने को साकार कर सकती है।

हिंदी भाषा के माध्यम से ‘राष्ट्रीय एकता’ के लक्ष्य की पूर्ति गांधी की ‘राष्ट्रभाषा’ का एक खास पहलू था। वे जानते थे कि एक राष्ट्रभाषा के बिना इस लक्ष्य की प्राप्ति नहीं की जा सकती थी। उन्होंने बार-बार यह उद्घोषणा की कि – भारत को एकता की कड़ी में जोड़ने के लिए हिंदी ही उपयोगी भाषा है। वे पूरे भारत में ‘एकता की भाषा’ के रूप में हिंदी को स्थापित करना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार–प्रसार का बीड़ा उठाया जिसकी भूमिका वे अपने प्रसिद्ध ‘इंदौर भाषण’(19 मार्च,1918) में बना चुके थे। इसी वर्ष उन्होंने दक्षिण भारत में हिंदी की एक संस्था स्थापित कर दी – दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास और 18 वर्षीय अपने पुत्र देवदास गांधी को इस कार्य के लिए मद्रास (अब चेन्नई) भेज दिया। इस संस्था का मूल वाक्य है – ‘एक राष्ट्रभाषा हिंदी हो, एक हृदय हो भारत जननी’। यह वास्तव में गांधी जी के ‘राष्ट्रभाषा’ संबंधी चिंतन से सिंचा वाक्य है। गांधी जी स्वयं इस संस्था के आजीवन अध्यक्ष रहे।

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गांधी और ‘हिंदुस्तानी’

हिंदी भाषा की ‘सुगमता’ की बात गांधी जी बहुत सोच–समझ कर कर रहे थे। वे हिंदी भाषा की सुबोधता और संप्रेषणीयता के हामी हैं, यह बात वे कई तरह से कहते चले आ रहे थे। संभवतः इसीलिए कहीं-कहीं उन्होंने राष्ट्रभाषा के लिए ‘हिंदुस्तानी’ शब्द का भी प्रयोग किया है। ‘हिंदुस्तानी’ भारत में प्रचलित बोलचाल की हिंदी का मूल रूप है जिसे आधार बनाकर अँग्रेजी शासन ने बोझिल उर्दू (हाई उर्दू) और संस्कृतनिष्ठ हिंदी (हाई हिंदी) जैसे कृतिम भाषा रूप गढ़ कर हिंदी को हिंदुओं की और उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहकर एक सांप्रदायिक रंग दे दिया था। गांधी जी अंग्रेजों के इस षणयंत्र को समझ रहे थे। इसीलिए वे ज़ोर देकर कह रहे थे कि राष्ट्रभाषा के रूप में वे जिस संपर्क भाषा हिंदी की बात कर रहे हैं, यह वही भाषा रूप है जिसका प्रयोग भारत की आम जनता करती है और जिसे देश के हिंदू और मुसलमान दोनों बोलते समझते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ‘हिंदुस्तानी’ ही जनभाषा के रूप में भारत के एक बड़े हिस्से में मौखिक संप्रेषण व्यापार की भाषा है। गांधी के इस मंतव्य को उनकी पुस्तिका ‘राष्ट्रभाषा हिंदुस्तानी’ (1947) के भीतरी आवरण पर अंकित इस अनुच्छेद से भलीभाँति समझा जा सकता है – ‘हिंदुस्तानी का मतलब उर्दू नहीं, बल्कि हिंदी और उर्दू की वह खूबसूरत मिलावट है जिसे उत्तरी हिंदुस्तान के लोग समझ सकें और नागरी या उर्दू लिपि में लिखी जा सकती हो। यह पूरी राष्ट्रभाषा है, बाकी अधूरी’। हिंदी–उर्दू के बीच अलगाव पैदा करके हिंदू और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक विद्वेष पैदा करने वाली दूषित ब्रिटिश प्रवृत्ति से गांधी जी को आत्मिक कष्ट हुआ था। इस प्रवृत्ति से टकराने के लिए ही उन्होंने ‘हिंदुस्तानी आंदोलन’ खड़ा किया। भाषा के प्रश्न पर गांधी जी को दो स्तर पर जूझना पड़ रहा था – एक ओर राष्ट्रीय एकता के लिए और दूसरी ओर सांप्रदायिक सद्भाव के लिए। हिंदुस्तानी’ के पक्ष में वे यहाँ तक कह चुके थे कि – उत्तर भारत में मुसलमान और हिंदू दोनों एक ही भाषा बोलते हैं (और वह है हिंदुस्तानी –लें)। गांधी जी के लिए हिंदुस्तानी का तात्पर्य उस आम मौखिक परंपरा वाली हिंदी से था जिसमें भाषा–अवमिश्रण के, आदान–प्रदान के और मेलजोल के बीज विद्मान थे, अर्थात जो सदियों से भारत की समन्वित एकात्मकता का माध्यम थी जिसे ‘भाषा–इतिहास’ में कभी हिंदी, कभी हिंदुई तो कभी हिंदी,रेख्ता या खड़ी बोली और उर्दू के नाम से अभिहित पाते हैं।

वे भलीभाँति यह जानते थे और उन्होंने कहा भी कि ‘अंतर पढ़े-लिखे लोगों ने पैदा किया है’। अपने इस कथन की व्याख्या करते हुए उन्होंने लिखा कि – ‘इसका अर्थ यह है कि हिंदू शिक्षित वर्ग ने हिंदी को केवल संस्कृतमय बना दिया है। इस कारण कितने ही मुसलमान उसे समझ नहीं सकते। लखनऊ के मुसलमान भाइयों ने उर्दू में फारसी भर दी है और हिंदुओं के समझने के अयोग्य बना दिया है। यह दोनों केवल पंडिताऊ भाषाएँ हैं और इनको जनसाधारण में कोई स्थान प्राप्त नहीं है। यहाँ इस बात की ओर भी ध्यान दें कि खड़ी बोली में जो जन सहभागिता है, रेख्ता में जो मेलजोल का भाव है, या हिंदी में जो जन समान्य की भाषा का रूपांतर है,वह सब गांधी की ‘हिंदुस्तानी’ के भीतर आ सिमटा है।

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि ‘खड़ी बोली’ मुसलमानों के भारत आने के बहुत पहले से यहाँ मौजूद थी। यही खड़ी बोली (हिंदी) उर्दू का भी मूलाधार बनी। पं. अंबिका प्रसाद वाजपेयी ने अपनी पुस्तक ‘हिंदी पर फारसी का प्रभाव’(संवत 2016) में वली मौलवी वहीउद्दीन साहब ‘सलीम’ का यह उद्धरण दिया है – ‘हिंदी को हम अपनी जबान के लिए अमल्लुनिसान (भाषा की जननी) और मूलायअव्वल (मूलतल) कह सकते हैं। उसके बगैर हमारी जबान की कोई हस्ती नहीं है’। गांधी जी हिंदी–उर्दू के इसी मूल तत्व की गवाह ‘हिंदुस्तानी’ के पक्ष में खड़े हुए थे।

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हिंदी–उर्दू की तकरार और गांधी

पर क्या कहें अंग्रेजों की भाषा नीति को, जो सांप्रदायिक भाषावाद फैलाने में लिप्त थी। हिंदी – उर्दू के बीच विभाजन रेखा खींचकर इनके बीच की खाई को गहरा करने में जुटी थी। वे कहते भी हैं, और बार–बार इस बात को दोहराते भी हैं कि – हिंदी और उर्दू दोनों भाषाएँ दो भिन्न भाषाएँ नहीं हैं। इसीलिए वे कृत्रिम हिंदी और कृत्रिम उर्दू के पैरोकारों के सामने ‘हिंदुस्तानी’ का परचम लेकर डटकर खड़े हुए। यहाँ अंग्रेजों ने एक और चाल चली, उन्होंने ‘हिंदुस्तानी’ को उर्दू का पर्याय सिद्ध करने का षणयंत्र शुरू कर दिया। उनके पिट्ठू वैयाकरण ‘हिंदुस्तानी व्याकरण’ के नाम पर ‘उर्दू का व्याकरण’ लिखने में लग गए। गांधी जी यह भी देख रहे थे। वे उर्दू –हिंदी के बीच के बढ़ते विभेद से अचरज में थे। पर वे हारे नहीं। इसका समाधान उन्होंने अपनी ज़िंदगी में ही ढूंढा। तर्क दिए, बहसें कीं,समझावन की, विरोध सहे। यह सब गांधी चिंतन में लिपिबद्ध है। अंतत: वे अपनी बात कहते–कहते ही चले गए। गांधी के चले जाने के बाद हिंदी–उर्दू के उलझे प्रश्न को सुलझाने के यत्न कई भाषाविदों ने जारी रखे जिनमें धीरेन्द्र वर्मा, किशोरी दास वाजपेयी, रामविलास शर्मा, रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव, अशोक केलकर और पं. विद्यानिवास मिश्र का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है।

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लिपि का प्रश्न और गांधी

हिंदी–उर्दू के बढ़ते विभेद से गांधी जी खिन्न थे। एक जगह तो उन्होंने यह भी कह दिया है कि – ‘हम हिंदी – उर्दू के झगड़े में पड़कर अपना बल क्षीण नहीं करेंगे। लिपि की कुछ तकलीफ जरूर है। राष्ट्र में दोनों को स्थान मिलना चाहिए। इसमें कुछ कठिनाई नहीं है। अंत में जिस लिपि में ज्यादा सरलता होगी, उसकी विजय होगी’। यहाँ ध्यान दें कि हिंदी – उर्दू अस्मिता का प्रश्न लिपि की अस्मिता का प्रश्न भी बन गया था। हिंदू–मुसलमान एक होकर रहें इसलिए उन्होंने दोनों लिपियों में ‘हिंदुस्तानी’ लिखने की बात कहीं थी। गांधी जी समन्वय की भाषा, सम्प्रेषण की उस मौखिक भाषा ‘हिंदुस्तानी’ को राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन करने की जद्दोजहद कर रहे थे और समस्या आ खड़ी हुई लिखी जाने वाली भाषा के लिपि चयन की, (अर्थात वही कृत्रिम हिंदी, कृत्रिम उर्दू को लिखे जाने की)। गांधी जी के सपने टूटने के कगार पर थे। भाषा को लिखने का माध्यम ‘भाषाई अस्मिता’ का प्रश्न बना दिया गया था। इसीलिए लिपि के प्रश्न को ‘परेशानी का कारण’ मानते हुए उन्होंने दोनों लिपियों के प्रयोग की स्वीकृति दी थी। इस स्वीकृति के लिए उन्हें घोर विरोध का भी सामना करना पड़ा – यह सब लिखित रूप में दर्ज है। गांधी की यह दृढ़ मान्यता थी कि इस प्रकार के लेखन से उच्च हिंदी या उच्च उर्दू को बढ़ावा नहीं मिलेगा। पं. विद्यानिवास मिश्र ने कहीं यह व्यंग किया था कि ‘उर्दू के धनी–धौरी नागरी लिपि से लाभ तो लेना चाहते हैं, पर अलग लिपि के बिना उन्हें अपना अस्तित्व प्रमाणित नजर नहीं आता’। गांधी के सामने भी कुछ ऐसा ही प्रश्न खड़ा था जहाँ एक संप्रदाय अपनी लिपि की मान्यता का अनावश्यक आग्रह कर रहा था,जिस पर गांधी को समझौते का मार्ग भी अपनाना पड़ा और जिससे वे विलग हुए अपनी मृत्यु के ठीक पाँच दिन पहले ‘हरिजन सेवक’ (25 मार्च, 1948) में यह लिखकर कि ‘ नागरी और उर्दू लिपि के बीच में जीत नागरी की होगी’।अपने अंतिम दिनों तक गांधी जी भाषा के माध्यम से राष्ट्रीय एकता एवं सांप्रदायिक सद्भाव के लिए लड़ते रहे। देश–विभाजन ने उनके भाषाई–सौहार्द्र के सपने को चकनाचूर कर दिया था। गांधी का भाषा चिंतन राष्ट्र निर्माण के सपने से संबद्ध था। उन्होंने ‘सच’ के बल पर अपनी बातें कहीं। संपर्क भाषा, राष्ट्रभाषा, शिक्षा में भाषा, स्वभाषा गौरव पर विचार किया। राष्ट्रभाषा हिंदी और हिंदुस्तानी के प्रचार–प्रसार के लिए प्राणप्रण से जुटे। भारतीय भाषाओं और उनके साहित्य को भरपूर मान दिया।

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गांधी के भाषा चिंतन के आयाम

गांधी जी ने जीवन भर हिन्दी में बोलने का प्रण ले रखा था। अपनी विनम्रता के चलते वे यह कहते रहे थे कि ‘मेरी हिन्दी अच्छी नहीं है’ या यह भी कि ‘मैं भारत कि भाषाओं को बोलने वालों के मन की बहुत अच्छे से नहीं जनता’ पर वे दोनों ही को खूब जानते-पचानते थे। उनकी खुद की हिन्दी सरल संप्रेषणीय और मर्मभेदी हिन्दी का ऐसा वाजिब पाठ है जिसने भारत के जनसमूह (चाहे वे किसी प्रांत के हों) की आत्मा को झकझोर कर रख दिया था। दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा वे आते रहते थे। मेरे चेन्नई प्रवास के दस वर्षो में कई बुजुर्ग हिन्दी सेवियों ने अलग-अलग शब्दों में यह बताया था कि अपनी प्रार्थना समाओं में गांधी जी हिन्दी में अधिक से अधिक दस वाक्य बोलते थे जो श्रोताओं पर सीधी चोट करते थे। उनकी बोली-गई हिन्दी के रिकार्ड सुन कर या उनकी लिखी हिन्दी पढ़ कर ‘भाषा की सरलता’ से उनका क्या तात्पर्य था, इसका पता चल जाता है।

गांधी जी अंग्रेजी भाषा को अतिरिक्त महत्व देने के सख्त खिलाफ थे। बनारस में (1916) जब उनका स्वागत अंग्रेजी मे किया गया तो उन्होंने खूब फटकारा और यहाँ तक कह दिया कि ‘हिन्दी भाषी प्रांतो में अंगेजी ज्यादा झाड़ते हैं और अंग्रेजी कि गुलामी में प्रसन्न हैं’। शिक्षा के क्षेत्र में अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व को उन्होंने चुनौती दी। गांधी जी का मानना था कि शिक्षा का संदर्भ राष्ट्र की प्रकृति के अनुरूप होना चाहिए जब कि ब्रिटिश शासन द्वारा निर्धारित शिक्षा के आधार भूत सिद्धांत राष्ट्र विरोधी थे। गांधी जी ने अंग्रेजी शिक्षा का विरोध करते हुए कड़े शब्दो में यह कहा था कि – ‘करोड़ो लोगो को अंग्रेजी कि शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है’। अंग्रेजी पोषित भारतीय शिक्षा-पद्धति को गांधी जी भारत को गुलाम बनाए रखने की सजिश मानते थे –‘मैकाले ने शिक्षा की जो बुनियाद डाली, वह सचमुच गुलामी की बुनियाद थी’। भारतीयों के अंग्रेजी मोह की भी उन्होंने कस कर भर्त्सना की। कांग्रेस की सभाओं में लोगो को अंग्रेजी में अपनी बात कहते हुए सुनकर उन्होंने कहा था कि –‘यह कितने दुख की बात हैं कि हम स्वराज की बात भी पराई भाषा में करते हैं’। काशी में (1916) नागरी प्रचारिणी सभा के सम्मेलन में उन्होंने वकीलों और छात्रों से अंग्रेजी का प्रयोग छोड़ कर हिन्दी का व्यवहार करने की अपील की थी। 1916 मे ही स्वभाषा: स्वराज विषय पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के अपने ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने खुलकर कह दिया था कि – ‘विदेशी भाषा में बोलना स्वदेश में अप्रतिष्ठा और अपमान की बात है’। गांधी जी कि दृष्टि में अंग्रेजी बनाम भारतीय भाषाओं का परिदृश्य एकदम स्पष्ट था। उनका दृढ़ विश्वास था कि भारतीय भाषाओं की निकटता, चाहे वह भाषाई हो या सांस्कृतिक, जिस तरह की है, वहाँ तक अंग्रेजी भाषा की पहुँच हो ही नहीं सकती।

भारत में भाषाओं के सहअस्तित्व को वे भारत की सबसे बड़ी शक्ति मानते थे। समाज, भाषा और संस्कृति के अंतस्संबंधों की उन्होंने सटीक ढंग से विवेचना की है। गांधी जी का जीवन से गहरा संबंध था। वे भारतीय लोक और उसकी आकांक्षाओं को नजदीक से जांच-परख चुके थे। इसीलिए भाषा को उन्होंने जीवन और समाज के सामने रख कर देखा। एक समाजचेता भाषाचिंतक की तरह।

संभवत: इसीलिए भारतीय भाषा यथार्थ के मूल तक गांधी की सजह पहुँच थी। इतनी सहज कि उनकी वाणी ने साहित्यकारों को आंदोलित कर सृजनात्मक लेखन में ‘हिंदुस्तानी’ के प्रवाह को समोने के लिए प्रेरित कर दिया। हिन्दी में प्रेमचंद इसके शीर्ष प्रवक्ता बने।

संक्षेप में कहा जाय तो गांधी का भाषा-चिंतन उनके अपने व्यावहारिक अनुभवों के मंथन का परिणाम है। उनके इस चिंतन में तत्कालीन भारत का वर्तमान और ‘हिन्द स्वराज’ वाले भविष्य का परस्पर द्वन्द मुखरित है। भाषा पर बात शुरू करते ही उनके समक्ष पूरा राष्ट्र और उसके लोग खड़े हो जाते थे। वो लोग जो अपने दैनिक व्यवहार में आमफहम हिंदुस्तानी बोलते थे और वे भी जो हिन्दी का प्रयोग संपर्क भाषा (लिंक लैंग्वेज) या व्यापक संप्रेषण की भाषा (लैंग्वेज फार वाइडर कम्युनिकेशन) के रूप में भारत के हर प्रांत में कर रहे थे। गांधी जी का विरोध भी हुआ। उनसे कई प्रश्न भी पूछे गए। बहसें की गईं। उधर ब्रिटिश शासन भारतीय बहुभाषिक यथार्थ को वैमनस्य और संघर्ष में बदल डालने पर आमादा था। पर गांधी जी अपनी राह चलते रहे। भाषा पर किसी राजनेता की गांधी जी जैसे गहरी संलग्नता उनके समय के और आज के भी किसी नेता में दिखाई नहीं देती। इस मामले में गांधी जी अपनी मिसाल आप हैं। उनके भाषा संबंधी विचारो के पीछे भारत का भाषिक यथार्थ मुखरित है अत: इनका बारंबार विवेचन करने की जरूरत आज भी है और आगे भी हमेशा पड़ती रहेगी।

निदेशक
लुप्तप्राय भाषा केंद्र
इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक (म॰प्र॰)
मो॰ 8989105802

शनिवार, 28 जून 2014

लाल रेखा - कहाँ कहाँ से गुजर गया

किताबों के बहाने - 8                                                 प्रो. दिलीप सिंह 

लाल रेखा/ कुशवाहाकान्त/
चिंगारी प्रकाशन/ वाराणसी/
प्रकाशन वर्ष - 1954/ मूल्य - 3रु.

मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

(वीडियो) प्रो. कैलाश चंद्र भाटिया को प्रो. दिलीप सिंह की श्रद्धांजलि





डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया (1926/27-2013) हिंदी के प्रमुख आधुनिक भाषाचिंतक थे. 29-30 मार्च 2014 को उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के बेलगाम (कर्नाटक) केंद्र में आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का एक सत्र उनकी स्मृति को समर्पित था. इस सत्र में प्रो. ऋषभ देव शर्मा, प्रो. एम. वेंकटेश्वर, प्रो. हीरालाल बाछोतिया एवं प्रो. रामजन्म शर्मा ने संस्मरण और आलेख प्रस्तुत किए. अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ भाषाचिंतक प्रो. दिलीप सिंह ने अत्यंत भावपूर्ण वक्तव दिया और हिंदी जगत का ध्यान डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया के अप्रतिम योगदान की ओर आकृष्ट किया. प्रस्तुत है प्रो. दिलीप सिंह का अध्यक्षीय वक्तव्य.

रविवार, 22 दिसंबर 2013

एक गधा नेफा में : कहाँ-कहाँ से गुजर गया

किताबों के बहाने -2 
- प्रो. दिलीप सिंह 







किताब (2) : एक गधा नेफा में
लेखक : कृश्न चंदर
प्रकाशक : राजपाल एंड संस
मूल्य : 4 रुपए
तीसरा संस्करण : 1967 (जो मेरे पास है)





शनिवार, 21 दिसंबर 2013

कलम कुल्हाड़ा : कहाँ-कहाँ से गुजर गया

किताबों के बहाने - 1 
- प्रो. दिलीप सिंह 

कलम कुल्हाड़ा 
लेखक : कौतुक बनारसी
प्रकाशक : आनंद पुस्तक भवन, वाराणसी
वर्ष : 1949, मूल्य : 2 रुपए पचास पैसे
तीसरा संस्करण : 1963 (जो मेरे पास है) 

[यह शृंखला आलोचना तो कतई नहीं है। समीक्षा भी इसे नहीं कहा जा सकता। यह किसी पढ़ी गई रचना के साथ पाठक की संलग्नता के आड़े-तिरछे पहलुओं पर बस ज़हन पर अंकित असरों के ठहर जाने की कैफ़ियत है। साहित्य और साहित्य पर किताबें पढ़ते समय भी ऐसा शायद सबको लगता है कि अरे! ऐसा ही तो मैं भी सोचता हूँ, इसने तो मेरे मन की बात कह दी, यह पात्र या जगह तो मेरी भी जानी-पहचानी है........। पढ़ते समय कई बार यह भी तो होता है कि हमारी अपनी ज़िंदगी के साथ कुछ प्रसंगों, कथनों, भावों का रिश्ता जुड़ जाता है। यह सब होता है। पर हमारी आलोचना इन बातों का ख्याल नहीं करती। तो क्या आलोचक किसी रचना को एक पाठक की तरह नहीं पढ़ता? क्या सिर्फ़ आलोचकीय औज़ार ही रचना के अच्छे–बुरे या प्रभावकारी होने की कसौटी हैं? क्या कोई रचना पढ़ जाने के बाद हमारी ज़िंदगी से कट जाती है? मेरे साथ यह सब नहीं होता, आप के साथ भी अवश्य ही न होता होगा। कुछ पढ़ते समय काफ़ी कुछ हमारे आसपास से, हमारे आसपास का जुड़ने लगता है। आगे के जीवन में भी यह जुड़ाव मिटता नहीं धुंधला तक नहीं पड़ता बल्कि निरंतर घुमड़ा करता है और कभी सामने आ खड़ा हो कर समझाता, सहलाता, चेताता, या हँसाता-रुलाता और रास्ता दिखाता है।

यह भी बात पढ़ने में खास हो जाती कि हमने किसी रचना को कब पढ़ा – किस उम्र में, तब हम किस कक्षा में पढ़ रहे थे। कैसे और कहाँ से मिली थी वह किताब या किसने हमें दी थी? कहाँ बैठ कर (या लेट कर) पढ़ा था उसे? स्कूली जीवन में पढ़ी गई कोई किताब बरसों बाद फ़िर से हाथ लग जाए तो पढ़ते समय पहली बार पढ़ी जाते समय कौन-सी बातें पकड़ाई में नहीं आईं थीं, उन्हें पकड़ पाने का आनंद भी तो बाद में पढ़ने पर भरपूर आता है। किससे-कब किसी किताब पर बातचीत हुई किसी किताब या लेखक पर किसी संगोष्ठी में क्या-क्या चर्चाएँ हुईं जिनसे अपने पढ़े-समझे में सुधार हुआ या कोई और हमारी बातचीत-चर्चा से सुधरा। ये बातें पाठक के रूप में मेरे मन में बसी रहतीं हैं इससे इनकार नहीं। किताब के साथ बहुत कुछ असंबद्ध भी आ जुड़ता है – अखबार की कोई ख़बर, कोई फ़िल्म, किसी फ़िल्म का कोई गीत – और भी न जाने क्या-क्या! इस विचार शृंखला में ऐसी ही बहकी-बहकी दृश्यावलियाँ आपको मिलेंगी। अपने संदर्भ में मैं इन्हें पाठक की रचनाधर्मिता के अहम पड़ाव मानता हूँ। शायद इस भूमिका से सब कुछ साफ़ न हो सका हो क्योंकि एक किताब हमें कब, क्या और कैसे दे जाती है इसका सही बयान किसी पढ़ी जा चुकी किताब को मन-दर्पण के सामने रख कर ही किया जा सकता है। तो चलिए किताबों के बहाने आप के साथ अपने ज़हन की कैफ़ियतों को साझा करूँ। और इस बहाने और भी बहुत सारी बातों को भी, जो किताब, उसके लेखक, अपने और उसके माहौल को अपनी समझ में उतारती रही हैं और पढ़ने की क्रिया को और भी आत्मीय, और भी प्रेरक, और भी जागरूक बनाती रही हैं।]

यह किताब पहली बार नवीं या दसवीं कक्षा में पढ़ी थी। स्कूल लाइब्रेरी से ले कर। तब ऐसी ही किताबें रुचती थीं। समय 1965-1966 का जब घर पर “धर्मयुग”, “साप्ताहिक हिंतुस्तान” नियमित आते थे। “मुसीबत है”, “कार्टून कोना ढब्बूजी” सभी सबसे पहले पढ़ते थे – एक के कार्टूनिस्ट रवींद्र थे दूसरी के आबिद सुरती। धर्मयुग का “बैठे-ठाले” और “साप्ताहिक हिंदुस्तान” का “फ़ुरसत से” स्तंभ अच्छा लगता था। बनारस के बेढब बनारसी, बेधड़क बनारसी और सूँड़ बनारसी भी इनमें छ्पते थे। फ़िर होली के अवसर पर दोनों साप्ताहिकों के “होली अंक” और होली अंक के अगले सप्ताह ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ का “व्यंग्य विनोद विशेषांक”। ये तीनों मजेदार अंक होली के पहले ही मिल जाते थे। बनारस का दैनिक “आज’ भी घर पर आता था। इसके मुखपृष्ठ पर ऊपर केंद्र में कांजीलाल का कार्टून छपता था। कृष्णा मेनन, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, चंद्रभान गुप्त के कार्टून आज भी याद हैं। इन सब को देख भी चुका था। तब इस किताब के तीसरे पृष्ठ पर यह पढ़कर मन मुदित हो गया था _____ चित्रकार _______ कांजीलाल। मुख पृष्ठ पर सींकीया पहलवान-सा लेखक हथियार की तरह अपने जितनी लंबी कलम दोनों हाथों से पकड़े हुए है। अन्नपूर्णानंद वर्मा और बेढब बनारसी आदि की कई किताबों के कवर भी कांजी लाल ने बनाए थे।
किताब के प्रकाशक के सामने नाम लिखा था – संपूर्णानंद, एम.ए.। ये हमारे ही विद्यालय में हिंदी के अध्यापक थे। हम इन्हें रोज देखते थे। मुझे गर्व हुआ था, तब कि वे उस किताब में भागीदार हैं जिसे मैं पढ़ रहा हूँ। ग्यारहवीं–बारहवीं में उन्होंने हमे हिंदी पढ़ाई फ़िर उनके दो पुत्र दयानन्द और श्रद्धानंद मेरे अभिन्न मित्र बने। अगले कुछ सालों में कौतुक की कई किताबें पढ़ डाली – कलम की कमाई, करमकल्ला, कपोल कल्पना, कुछ कच्चा कुछ पक्का, किचकिच, और कौवारोर। सब एक से बढ़ कर एक। तब न सोच पाया था आज मालूम होता है कि “क’ वर्ण से कौतुक को विशेष प्रेम था जैसे कि आज फ़िल्मकार राकेश रोशन को है जिनकी हर फ़िल्म का नाम “के” से शुरु होता है। अपना “पेन नेम” भी उन्होंने इसी वर्ण को महत्व देते हुए रख रखा था। वैसे उनका नाम था शिवमूर्ति शिव मिश्र: जन्म: 1923 बनारस में| 1943 से दैनिक “आज” के संपादकीय विभाग में पत्रकार का जीवन आरंभ किया। संगीत, व्यंग्य चित्रकला और हास्य-अभिनय में भी कौतुक की स्वांत: सुखाय रुचि थी। हास्य कवि भी थे। “संसार” और “तरंग” जैसे पत्रों के लिए भी कौतुक ने काम किया। इस किताब की भूमिका हिंदी के धुँआधार हास्य-व्यंग्य लेखक जी.पी.श्रीवास्तव ने लिखी है जिन्हें “हास्य सम्राट” कहा जाता था। श्रीवास्तव जी गोंडा में वकील थे, मेरे पापा के परिचित थे, दोंनों का वकालती संबंध भी था। वे हमारे यहाँ आते-जाते भी थे। पापा के पास उनकी कई किताबें थीं, एक थी “लतखोरी लाल” जिसे मैंने इसी दरम्यान पढ़ा था। बाद में बाकी किताबें भी पढ़ीं। अभी हाल ही में उनके हास्य निबंधों का संग्रह “बीरबल ज़िंदा है” पढ़ रहा था। कलम के जोर से हँसी के फ़ौवारे छुड़वाने में सिद्धहस्त थे श्रीवास्तव साहब। कलम में कितनी ताकत होती है यह उन्हीं को पढ़ कर पहली बार महसूस हुआ था। भूमिका में श्रीवास्तव जी ने कई गंभीर बातें भी कही हैं। विद्यार्थी गांठ बाँध लें क्यों कि मोटी–मोटी पुस्तकों में भी इतनी संजीदा बातें उन्हें न मिलेंगी –“व्यंग भी हास्य का ही एक अंग है। इसकी उत्पत्ति शब्दों के उत्तम चुनाव से होती है। इसका उद्देश्य सदा बुराइयों को दूर करना रहता है। इस तरह व्यंग हँसमुख सुधारक का काम करता है।“ आगे वे कहते हैं “व्यंग अपनी हँसमुख प्रकृति से हृदय और दिमाग को अपनी मुट्ठी में कर लेता है। अत: इसका प्रभाव कभी निष्फ़ल नहीं जाता।“ इन बड़ी-बड़ी बातों में यह भी शामिल है कि व्यंग्य रचना की सफ़लता अपूर्व कल्पना और अनोखी निरीक्षण शक्ति पर निर्भर करती है। साथ ही भाषा, विषय, मानवीय प्रकृति तथा सैली में भी काफ़ी सवधानी दरकार है अन्यथा “तनिक सी लापरवाही से इसका सारा कारबार चौपट हो जाता है”। अब आप समझ गए होंगे कि हास्य-व्यंग्य लिखने वाले कितने गंभीर होते हैं और इसे लिखने के लिए कितनी रचनात्मक क्षमता और कौशल की जरुरत पड़ती है। अब “कलम कुल्हाड़ा” पर श्रीवस्तव जी की टिपण्णी भी पढ़ लें “प्रस्तुत संग्रह कौतुक बनारसी के अनमोल व्यंग निबंधों का है। व्यंग क्षेत्र में आपकी लेखनी कैसा चमत्कार दिखाती है, यह हिंदी संसार से छिपा नहीं है। आपकी भाषा साफ़ और सुथरी है। शैली भी आपकी निराली और अपनी है जो रिझाती और गुदगुदाती है। इन निबंधों में सजीवता और रोचकता ऐसी है जो मन को लुभाए रखती है कि छोड़ने का जी नहीं चाहता”। इस “सर्टिफ़िकेट” से आप कौतुक बनारसी के रचना कौशल को भली-भँति बूझ चुके होंगे पर कौतुक खुद अपनी “पैरवी” (भूमिका) में क्या कहते है यह भी सुन लीजिए “ढूँढने से इस किताब में बहुत कम गुण दिखाई पड़ेंगे जैसे यह बहुत मोटी नहीं है, विचारों में सागर-सी कौन कहे कुँए–सी भी गहराई नहीं है, भाषा में संस्कृत शब्दों का अभाव है और विषय ऊल-जलूल है। मगर एक झुंड कमियों के होते हुए भी मेरे मित्रों का आग्रह था तो निबंधों की यह किताब छप कर आ गई है। यदि इस किताब से आपका कुछ लाभ हुआ हो तो वह आपके पढ़ने का, यदि नहीं तो वह मेरे लिखने का फ़ल है”। कौतुक की शैली की तेज़ धार का अंदाजा इन चंद सतरों से ही आपको अवश्य हो गया होगा।
चलिए, अब पैठा जाए “कलम कुल्हाड़ा के भीतर। पर एक बात और सुन लीजिए पहले कि इस तरह के ”ऊल-जलूल” हास्य लेखन की सशक्त परंपरा काशी में रही है और कौतुक इसके प्रमुख झंडाबरदा्रों में से एक। बनारस के पुराने दिनों में टाउन हॉल के मैदान में नुमाइश लगा करती थी। नवंबर अंत से दिसंबर अंत तक। पूरे मैदान की गोलाई में दुकानें लगती थीं – टिनशेड में। ऊनी कोट, मफ़लर, टोपी से लैस औरत-मर्द-बच्चे दीख पड़ते थे। भुनी मूंगफ़ली जेब में भरे या गुप्ता जी के चने चबाते हुए, जो इलाहाबाद से आ कर स्टॉल लगते थे। जब तक मैंने नुमाइश देखी (सालों देखी)। गुप्ता जी की दुकान घुसते ही दाईं तरफ़ होती थी। नुमाइश के आखिरी दिन कवि सम्मेलन और मुशयरा होता था – रात नौ से बारह बजे तक। कड़कड़ाती ठंड में। उस दिन लोग कंबल ले कर पहुँचते थे – सिर से कंबल ओढ़े ढेरों लोग बैठे दिखाई देते थे, ज़मीन पर। इसी तरह के एक नुमाइशी मुशायरे में कौतुक को सुना था। फ़िराक़ गोरखपुरी भी थे और ख़ामोश गाज़ीपुरी भी (जिनकी उस समय चढ़ी हुई थी)। यह आयोजन उत्तर प्रदेश के कवियों/ शायरों का होता था – आज़गढ़, गोरखपुर, बलिया, देवरिया, मेरठ, बरेली, लखनऊ  से इनकी आमद होती थी। मुझे याद है खा़मोश गाज़ीपुरी ने एक गज़ल सुनाई थी जिसका मतला था – हँसने के नतीजे पर यह आँख जो भर आई, हाँ हमने ख़ता की थी हाँ हमने सज़ा पाई। खामोश के गले में भी दम था और कलाम में भी, सो धूम मच जाती थी। कौतुक ने एक हास्य कविता सुनाई थी, उसकी भी कुछ पंक्तियाँ मुझे याद रह गईं थीं। इस कविता का उपयोग कौतुक ने अपने किसी लेख में भी किया था, पढ़ कर उस मुशायरे की याद ताज़ा हो गई थी। मुझे कविता का पहला बंद हमेशा याद रहा। आप पूरी कविता सुनिए—
        मुझ कविवर को प्यार न दोगे?
देख निशा की सुन्दर बेला, फ़ेंक रहा है कोई ढेला
फ़ूटे अपना इसके पहले, उसका फ़ोड़ कपार न दोगे?
चल न सकेगा आज बहाना, कल ससुराल मुझे है जाना
बहुत दिनों से माँग रहा हूँ, अपना कोट उधार न दोगे?
मुझ पर तुकबंदियाँ बनाता, कपि कपि कह कर मुझे चिढ़ाता
दुष्ट तुम्हारा है वो बेटा, उसकी चाल सुधार न दोगे?
कुछ इज़्जत पाने आया हूँ, कविता छपवाने आया हूँ
पुरस्कार क्या छप जाने पर, एक अंक अखबार न दोगे
                        मुझ कविवर को प्यार न दोगे?
क्या तो माहौल था। हर प्रश्न वाचक वाक्य के आते ही श्रोता पागल हो जा रहे थे। कौतुक लचक-लचक कर सुना रहे थे। वे कपार फ़ोड़ने के लिए बेढब की तरफ़ इशारा करते तो उधारी कोट के लिए बेधड़क की ओर। लड़के को सुधारने का इसरार वे शंभुनाथ सिंह से कर रहे थे तो पारिश्रमिक के रूप मे अखबार का एक अंक देने की गुहार ठाकुर प्रसाद सिंह से लगा रहे थे। अफ़सोस कि इस सम्मेलन में एक ही रचना सुनाने की बंदिश थी। फ़िराक़ ने अपनी चाँद वाली नज़्म सुनाई थी।
“कलम कुल्हाड़ा” बहुत मोटी नहीं है – एक सौ पैंतालिस पृष्ठों में उन्तीस निबंध हैं। पहली बार पढ़ा तब उम्र और माहौल के लिहाज़  से “गांधी जी को श्रद्धांजलि” और “कुछ घरेलू दवाएँ” अच्छी लगी थीं। जब न तब बार-बार इन्हें पढ़ता था। गाँधी जी की हत्या जनवरी अंत – 1948 में हुई थी। कितना कुछ लिखा गया होगा। मेरे घर में एक फ़ोटो टंगी थी जिसमें वृत्ताकार और विकासक्रम से गाँधी जी के छोटे-छोटे चित्र थे। सात-आठ साल के गाँधी जी गोल कढ़ाई वाली टोपी और बंद कोट में, फ़िर मैट्रिक में , फ़िर वकालत पास करने पर, स्वयं सेवी के रुप में डंडा और धोती-कुर्ता धारण किए हुए, डांडी यात्रा में आगे-आगे कदम बढ़ाते हुए, सागर तट पर मुट्ठी में नमक उठाते हुए, भारत छोड़ो आंदोलन का भाषण दोनों भुजाएँ उठा कर देते हुए, फ़िर अपने आश्रम में चरखा कातते हुए। तस्वीर के बीच की खाली और अपेक्षाकृत बड़ी जगह में उनकी प्रज्वलित चिता का चित्र; चिता के पास एक फ़ैली हुई माला जिसके बीच में “हे राम” अंकित था। यह तस्वीर हमारे खाने के कमरे में लगी थी। रोज़ दिखाई पड़ती। हर तस्वीर के नीचे छोटे-छोटे कैप्शन – बचपन में, किशोरावस्था में, बैरिस्टर गाँधी आदि। जब “कलम कुल्हाड़ा” पढ़ी तब तक आत्म कथा (सत्य के प्रयोग) पढ़ चुका था। मेरा जन्म 1951 में हुआ। पर गाँधी का प्रभाव घर-घर में होश आने के दिनों से साफ़ दिखाई पड़ने लगा था। यही असर था कि गाँधी जन्मशती वर्ष (1969) वाली नुमाइश में गाँधी आश्रम के स्टॉल से गाँधी जी की बड़ी-सी तस्वीर पाँच रुपये में खरीदी थी और लहुराबीर पर डीसीएम की बगल वाले “फ़्रेम हाउस” में मढ़वा कर घर के ओसारे में टाँगी थी जो निरंतर वहाँ रही। इस चित्र में गाँधी जी शांत मुद्रा में आँखें बंद किये बैठे थे। चश्मे के भीतर मानो एक संत के चक्षु हों। चादर पीठ की ओर ओढ़ा हुआ था जिसके किनारे दोनों कंधों पर अटके हुए थे। “कौतुक” ने अपनी अदभुत कल्पना शक्ति से गाँधी की हत्या पर आम आदमी की प्रतिक्रियायों को उनकी अपनी भाषा में व्यक्त किया है। व्यंग्य या हास्य का काम सिर्फ़ हँसाना नहीं है। मर्मिकता भी इनके माध्यम से कैसे पैदा की जा सकती है, इसका उदाहरण है यह निबंध। पूरा निबंध एक श्रृंखला है जिसमें कौतुक ने गाँधी को कैसे-कैसे तो देखा है –
खदेरू की माता जी ने कहा : राम! राम! साधुओ-महातमा के मुँह फ़ुँकवना मार डललें सब। दुनियाँ कवने रसातल में जाई हे भगवान! (राम! राम! साधु-महात्मा को भी मुँहफ़ुकौनों ने मार डाला। हे भगवान! दुनिया किस रसातल में जायेगी।)
सहदेव पहलवान ने कहा : गांधी जी वीर थे, बहादुर थे, नंबर एक लड़ाका थे। उन्होंने अंग्रेजों को ऐसे दाँव से अंटाचित्त उठा पटका कि उनकी आई-बाई पच गई।
सफ़ेरु खाँ जुलाहे ने कहा : अल्लाताला! यह तूने क्या किया? गान्ही जी ने जुलाहों के लिए क्या नहीं किया? उन्होंने दुनिया को बता दिया कि जुलाहा बने बिना दुनिया में गुजर नहीं। ऐ खुदा, तूने हमारे सबसे बड़े जुलाहे बिरादर को उठा लिया। हमारी तूने कमर तोड़ दी।
बुद्धू झाड़ू लगाने वाले ने कहा : गांधी जी हरिजनों के सबसे बड़े नेता थे। वे हमसब के सबसे बड़े चौधरी थे।
लछिमन पंडा ने कहा : उन्हीं का परताप है कि अब मंदिरों में सब कोई छोट-बड़ घुस पावत हैं जेहका वजह से चार पैसा हमनी क आमदनी बढ़ गई।
दशाश्वमेध घाट पर नहाने वाली एक बुढ़िया ने कहा : अच्छा होत भगवान, तू उनकी जगह हमके मौत देहले होता। (अच्छा होता भगवान, तूने उनकी जगह मुझे मौत दी होती।)
एक तरकारी बेचने वाले ने कहा : जे गान्ही जी मरलेस ओकर सरबनास हो जाय। (जिसने गांधी जी को मारा उसका सर्वनाश हो जाय।)
हिंदी की भाषा-शैली की निराली छटा इस निबंध की जान है। सामाजिक शैली का निर्वाह भी खूबी के साथ हुआ है।
“कुछ घरेलू दवाएँ” ने किशोरावस्था में गुदगुदाता मज़ा दिया था। तब हमारी उम्र के कई दिलफ़ेंक रिक्शे से स्कूल जा रही किसी-न-किसी लड़की को पीछे-पीछे साइकिल पर चलते हुए स्कूल तक पहुँचाने और स्कूल से घर की गली तक छोड़ने का काम एकाध मुस्कान की कीमत पर महीनों किया करते थे, अनथक। कौतुक ने ऐसे आशिकों के लिए कुछ नुस्खे दिए हैं – पता नहीं आजकल ऐसे आशिकों का वजूद है भी कि नहीं, अगर होगा तो उन्हें इन घरेलू दवाओं से अवश्यमेव लाभ मिलेगा –
प्रेम की बीमारी : यह बीमारी चपत और दुतकार का काढ़ा पीने से शीघ्र दूर हो जाती है। जिन्हें यह काढ़ा नसीब न हो वे खुशामद की सोर (जड़) एक माशा, बेहयाई के पत्ते तीन तोला और आवारगी की छाल दो पाव ले कर कूट-पीस कर तीन पाव पानी में पकावें जब पानी पकते-पकते एक पाव रह जाय तब नित्य सुबह पीयें। बुखार शीघ्र उतर जाएगा।

कलेजे में चोट : यह चोट बहुत बुरी होती है। चोटइल लोग कृपा की जड़ एक अंगुल, अनुरोध के दस पत्ते, याचना की छाल दो भर लें। धूप में सुखावें और सूखने के बाद कूट कर फ़ंकी बना लें। बकरी के दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करें। शीघ्र आराम होगा।

आँख लड़ने पर : इसकी दवा बहुत जरूरी है। इसकी दवा यह है कि ज्योंही आँख लड़े, संतरे के छिलके का रस आँख में छोड़ दें।

दिल धड़कना : दिल धड़कने की आसान दवा है कि व्यायाम किया जाय। व्यायाम यों है कि – दायें हाथ से बायाँ कान पकड़ें, बायें हाथ से दायाँ। दस बार इसी मुद्रा में उठे-बैठें। दो मास के बाद दिल की धड़कन ठीक हो जाएगी।
कल्पना की उड़ान की भी हद होती है। वैसे इसी संग्रह में कौतुक का एक अत्यंत रोचक हास्य-लेख है – “बेवकूफ़ी की हद नहीं होती”। बनारसी हास्य में इस तरह की शैतानियाँ खूब मिलती हैं जो पाठक के दिमाग को ग़िज़ा तो देती ही हैं और तेज़ भी करती हैं। “कलम कुल्हाड़ा” की शेष रचनाएँ कवियों, कवि सम्मेलनों, संपादकों, छपास की बीमारी, साहित्यिक ठगी पर प्रकाश डालती हैं, खास अपने तरीके से। कौतुक की इन सभी में खासी घुसपैठ थी। उनके इन निबंधों से यह साफ़ पता चलता है कि वे साहित्य पढ़ते थे और फ़िर अपनी तरह से उसे बरतते थे। इन निबंधों में उन्होंने ढेरों साहित्यकारों के नाम भी लिए हैं और ‘पैरवी’ में कहा है – “किताब में अनेक श्रद्धेय महानुभावों के नाम आए हैं, यदि आपको फ़ज़ूल लगे तो लेखक की लाचारी समझ कर क्षमा कर दीजिएगा, यदि उचित लगे तो कोई शाबासी का कार्ड भेजने का कष्ट मत उठाइएगा”। मैंने एम.ए. करते हुए जब दसवीं या बीसवीं बार यह संग्रह पढ़ा तो इन साहित्य-मार्का हास्य लेखों ने अजीब-सी चुलबुली पैदा कर दी थी। साहित्यिक ठगी, यानी एक ही रचना को कई जगह छपने भेज देना, कुछ रचनाओं की कतरनों से एक नई रचना तैयार कर देना, कुछ शब्द-पंक्तियाँ बदल कर किसी सशक्त रचना को अपनी बना लेना, जैसे साहसिक कृत्यों को कौतुक “कला” का दर्जा देते हैं, इस सुझाव के साथ कि “साहित्यिकों को इस कला का सम्मान करना चाहिए”। अखिल स्वर्गीय कवि सम्मेलन इंद्र के दरबार में नारद जी के संयोजन में आयोजित कवि-गोष्ठी की अनूठी झाँकी है। भारतेन्दु बाबू अध्यक्षता कर रहे हैं। आचार्य शुक्ल, महावीर प्रसाद द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद, महाकवि चच्चा ही नहीं इस काव्य संध्या में रसखान, सूरदास जी, केशव जी और भूषण भी मौजूद हैं। इस लेख की घटनाएँ और टिप्पणियाँ जानमारू हैं –
“शुक्ल जी यहाँ कभी न आते, लेकिन भारतेंदु बाबू का निमंत्रण था इसलिए आना पड़ा”,   
“गोसाईं जी ने बस दो चार चौपाइयाँ सुनाईं, द्विवेदी जी पर स्नेह था इसलिए मंच पर आए।”, “केशव जी ठीक-ठाक कह रहे थे पर श्रोता जल्द ही ऊब गए”।, “प्रसाद जी का नाम पुकारा गया। प्रेमचंद के साथ चल रही बातचीत छोड़ कर उठ खड़े हुए और ‘आँसू’ के छंद सुनाने लगे”। कहना न होगा कि यह होली के अवसर पर एक स्थानीय दैनिक में छपी रपट थी। एक निबंध “साहित्यकारों की खोपड़ी’ भी मज़ेदार है जिसमें प्रगतिशील, रहस्यवादी, ब्रजभाषा के, ग्राम साहित्य रचने वाले साहित्यकरों का “खोपड़ी विवेचन” है। इन श्रेणियों के साहित्यकारों को गहराई से पढ़े बिना ऐसा व्यंग्य नहीं लिखा जा सकता। दो और लेखों की बात जरूर करुँगा जिनकी वस्तु और शैली दोनों बेजोड़ हैं। एक है “अपनी ज़बानी” जिसमें दिनकर, बच्चन, नंददुलारे बाजपेयी, गोपालसिंह नेपाली और जैनेन्द्र कुमार ने अपनी तारीफ़ खुद की है। दिनकर कहते हैं “वादों में जो स्थान धन्यवाद का है, हिंदी जगत में ठीक वही स्थान मेरा है। मैं उछल कूद का कवि नहीं हूँ। मैं हिमालय का कवि हूँ। हिमालय से मेरी दोस्ती है। तूफ़ान मेरे शब्दों में बँधे झूलते हैं। बवंडर मेरी जीभ में सोता रहता है। भूचाल मेरी आँखों की कोर में है। मैंने ‘रेणुका’ से न जाने कितने हीरे पैदा किए। ‘हुंकार’ को घर-घर पहुँचा दिया। मेरी ‘रसवंती’ को कौन भूल सकत है? बलिदानी बहादुरशाह ‘ज़फ़र’ की दिल्ली अंतत: मुझे मिल ही गई”। कौतुक ने दिनकर की नस पहचान ली है, यह तो सिर्फ़ नमूना है “पाठ” का, कहा तो उन्होंने दो पेज में है। ‘बच्चन’ अपने बारे में क्या कहते हैं – ज़रा सुनिए – “मैं बिलकुल कवि हूँ। मैं हाला, प्याला, मधुशाला, मधुबाला ‘वाद’ का बाप हूँ। निशा को पत्र लिखने और निमात्रण देने वाला पागल, एकांत में संगीत टेरने वाला बिसुध, और भी न जाने क्या-क्या हूँ। मैं आपबीती भी लिखता हूँ। ‘सतरंगिनी’ देख रहा हूँ। यह भी समझ चुका हूँ कि ‘नीड़ का निर्माण फ़िर-फ़िर होना चाहिए। ‘जो बीत गयी सो बात गयी’ इसलिए सिर पटक कर फ़ोड़ना नहीं चाहिए। मैं हिंदी का कवि, अंग्रेजी का प्रोफ़ेसर, हृदय का भावुक और शरीर का मजबूत हूँ। मैं सब कुछ हूँ”। अब सुनिए नंददुलारे बाजपेयी “अपनी ज़बानी” क्या कह रहे हैं – “मैं खरा पहचानता हूँ और खोटा भी। चाबुक भी खूब चलाता हूँ। मार्जन आवश्यक समझता हूँ। मैं समालोचक हूँ। मैंने प्रेमचंद को सुनाया है। रामचंद्र शुक्ल को हमउम्र बतलाया है, निराला जी से दोस्ती है। हिंदी साहित्य का इतिहास शुक्ल जी ने पहले लिख दिया नहीं तो मैं ही लिखता। जब मैं भाषण देता हूँ तो आलोचना के सारे पारिभाषिक शब्द सुनाई पड़ जाते हैं। मैं जो लिखता हूँ सब छपने योग्य होता है। मैं नए लेखकों की पूस्तक की भूमिका भी लिख देता हूँ”। और गोपाल सिंह नेपाली का आत्म कहन भी सुन लीजिए – “मेरी नकल होती है। मैं नई शैली, नई गति हिंदी को दे रहा हूँ। मैं मस्ती का कलकल गान हूँ जिसका फ़ायदा सिनेमा वाले भी उठा रहे हैं। प्रेमचंद जी से मेरा परिचय था। ‘हंस’ से उन्होंने मुझे काफ़ी ऊपर भी उठाया। ‘आग पर चलो जवान, आग पर चलो’ मेरा संदेश है। एक और संदेश है ‘तुम किशोर कल्पना करो – तुम नवीन कल्पना करो”। जैनेन्द्र की अबूझ शैली में ‘कौतुक’ का शब्द चातुर्य देखिए – “मैं? तो बिल्कुल ‘मैं’ हूँ। मैं क्या हूँ, यह तो मैं नहीं जानता पर यह जानता हूँ कि मेरा नाम ‘जैनेन्द्र’ है। पर जैनेन्द्र का ‘मैं’ जानना सरल नहीं। ‘परख’ की ‘पूर्णता’ और ‘सुनीता’ की अतृप्ति मेरा जीवन दर्शन है। इन पर रामविलास शर्मा को नाज़ है। महादेवी जी इसे पढ़ती नहीं, देख लेती हैं। मैं कुछ खोया-खोया सा हूँ। क्योंकि मेरा ‘मैं’ कुछ उलझा-उलझा-सा है”।
एक हास्य-व्यंग्य लेखक की इन टिप्पणियों को उसकी आलोचकीय दृष्टि मानने में मैं समझता हूँ आपको कोई संकोच न होगा। आलोचना की “चुटीली पद्धति” भी इसे कहा जा सकता है। हम आलोचना मानें न मानें, कौतुक की बला से। पर यह तो मानना पड़ेगा कि “कौतुक” साहित्य पढ़ते, समझते और उसे अपनी तरह से देखते-परखते थे। उन्हें सिर्फ़ हास्य-व्यंग्य लेखक समझने की भूल हम न करें, आपका देश के प्रसिद्ध सामुद्रिक शास्त्रियों एवं भविष्यवक्ताओं में भी नाम था। बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे कौतुक बनारसी। साहित्य की दुनिया को वे किस तरह तीगते थे इसका बयान उन्होंने अपने दो संग्रहों में दर्ज कर दिया है – एक तो यही “कलम कुल्हाड़ा” है और दूसरा “कलम की कमाई”। चलते-चलते ‘भूमिका’ और ‘कला’ पर कौतुक का कलम कुल्हाड़ा कैसे चला है इसकी बानगी देना मैं अपना पाठकीय कर्तव्य समझता हूँ – निबंधों का शिर्षक है – “भूमिका बांधिए” और “कला का कचूमर”।
1. भूमिका बहुत सारगर्भित शब्द है। जिस लेखक ने भूमिका न लिखी उसने कुछ नहीं लिखा। बिना भूमिका के पुस्तक, बिना सिकड़ी-ताले की अलमारी है। पुस्तक में भूमिका उतनी ही जरुरी है जितनी नयी दुलहिन के ललाट पर टिकुली। आप यह जान लें कि पुस्तक में लंबी-लंबी बातें कही जाती हैं, भूमिका में गोल-गोल। ग्रंथ पुरुष है, भूमिका स्त्री है। वह भकुवा है जिसकी स्त्री नहीं है। यह भी समझ लीजिए कि भूमिका लिखने वाले किराए पर भी मिलते हैं, ठेके पर भी लिख देते हैं।
2. (क) कला अँगीठी है, साहित्य दमकला है, जीवन जाड़ा है, समालोचक आँख सेंकने वाला जीव है। अत: कलाकार को जाड़ा रुपी जीवन से घबड़ाना नहीं चाहिए, साहित्य रुपी गरम दमकले का इस्तेमाल करना चाहिए क्योंकि कलारूपी अँगीठी उसी में निहित है।
(ख) कला सौंदर्यरुपी तेल से भरी हुई वह कड़ाही है जिसमें साहित्य रूपी पकौड़ी छना करती है और जिसे साहित्यकार रूपी दुकानदार शब्द रूपी पौने से छानता रहता है।
अब क्या कहेंगे आप? कौतुक से असहमत ज़रुर हुआ जा सकता है, पर उनकी बात को झटकार कर अलगाया नहीं जा सकता। विषयगत तथ्य तो यहाँ भी हैं। पहले ऐसी अभिव्यंजना आपकी निगाह से नहीं गुज़री तो कौतुक क्या करें! कलम को तलवार के रुप में और कुल्हाड़े के रुप में देखने का यही भेद है। पर इतना तो आप भी मानेंगे कि “उपमान मैले हो गए हैं” वाला सिद्धांत हमने बाद में बूझा, “कौतुक” ने साहित्य के रूढ़ उपमानों की कैसी ऐसी-तैसी कर दी है, यह उन्हें पढ़ कर ही जाना जा सकता है।

मैं कहना चाहते हुए भी यह नहीं कहता कि कौतुक का साहित्य “श्रेष्ठ” की कोटि में रखा जाए क्योंकि इससे कौतुक की ही हेठी होगी। यह साहित्य एक खास “विधा” का ऐसा पतीला है जिसमें कौतुक ने अपनी कड़छी चलाई है और रोचक व्यंजन तैयार किए हैं। यह भी ईमानदारी की शपथ ले कर कहता चलूँ कि हिंदी भाषा का सलोना रुप सीखने में इस तरह के साहित्य ने मेरी बहुत मदद की है। नये-नये शब्द, अनदेखे शब्द-संयोग, गुदगुदाने वाली वाक्य संरचनाएँ, देसीपन लिए हुए अभिव्यंजनाएँ – और भी काफ़ी कुछ मुझे कौतुक जैसे रचनाकारों से सीखने को मिला है। ऐसे ही साहित्य ने बाद में शरद जोशी, हरिशंकर परसाई, फ़िक्र तौंसवी, मुज़्तबा हुसैन को पढ़ने में और उनको समझने में मेरी मदद की। और उलट-पुलट अभिव्यंजना या उलटबाँसी को समझने में भी। कबीर की नगरी में ही ऐसा घट पाना संभव था। आज भी मैं रामरिख मनहर, शैल चतुर्वेदी, हुल्लड़ मुरादाबादी, जैमिनी हरियाणवी, सुरेन्द्र शर्मा को बार-बार पढ़ना चाहता हूँ, हाँ काका हाथरसी को भी। इनके लिए मैं “धर्मयुग” और “साप्ताहिक हिंदुस्तान” की पुरानी फ़ाइलों को भी जब-तब पलट लेता हूँ। स्वाद बदल जाता है और दृष्टि भी। लोग कहते हैं कि “सरल लिखना कठिन है, और कठिन लिखना सरल” – कौतुक, बेढब, चकाचक, चोंच, सूँड़ (सभी “बनारसी”) जैसा लिख पाना तो और भी कठिन है – सरल होते हुए भी अभिव्यंजक, हास्य होते हुए भी संजीदा, शब्द होते हुए भी शब्दातीत। चलिए, चलते-चलते यह भी बता ही दूँ कि “कलम कुल्हाड़ा” को “कौतुक” ने कविवर काशीनाथ उपाध्याय “भ्रमर” (बेधड़क बनारसी) को समर्पित किया है। “बेधड़क” के इस मिथकीय नाम और छायावादी तख़ल्लुस का पता मुझे “कलम कुल्हाड़ा” से ही चला। यह भी मेरी ज़िंदगी से हमेशा के लिए जुड़ गया एक साहित्यिक यथार्थ है। 

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

प्रो. दिलीप सिंह विचार कोश - 4

भाषा की भीतरी परतें 
भाषाचिंतक प्रो. दिलीप सिंह अभिनंदन ग्रंथ
प्रधान संपादक - ऋषभदेव शर्मा
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली,
2012 प्रथम संस्करण, ९९५/-
कवि : जन-कवि 

कवि की भावनागत पावनता, निर्मलता और स्वच्छता ही उसके हृदय में अपने से इतर लोगों की भावनाओं को प्रतिबिंबित कर सकती है. ऐसा कवि ही जन-कवि बनता है. उसकी वाणी असंख्य लोगों के दिलों की आवाज बन जाती है और उसका शब्द-शब्द लोगों के मन को बेध जाता है. (बच्चन का काव्यशास्त्र; पाठ विश्लेषण; पृ.59) 

कविता 

कविता भाषा में आबद्ध सबसे संश्लिष्ट रचना है, अतः इसे सूक्ष्मता के साथ पढ़ना-पढ़ाना अपेक्षित है. किसी भी साहित्यिक कृति को 'पढ़ना' एक ओर अर्थ-बोध है तो दूसरी ओर काव्य वस्तु की पुनः सर्जना भी है. (साहित्य शिक्षण; भाषा, साहित्य और संस्कृति शिक्षण; पृ.156) 

कविता : प्रयोजन 

कविता का प्रयोजन जब पाठक/ श्रोता को संस्कार देने से आ जुड़ता है तब कवि और कविता से पाठक की अपेक्षाएँ काफी बढ़ जाती है. (बच्चन का काव्यशास्त्र; पाठ विश्लेषण; पृ. 60) 

कविता मनुष्य को पूर्णकाम बनाए तभी वह जन-प्रिय भी हो सकती है, लोगों को जीने का ढंग सिखा सकती है और निरंतर उनके साथ चल सकती है, उनकी अपनी बनकर. (बच्चन का काव्यशास्त्र; पाठ विश्लेषण; पृ. 60) 

आम भाषा का परिष्कार भी आज की कविता का अहम काव्य-लक्ष्य है. (सब कुछ, सब कुछ, सब कुछ भाषा; पाठ विश्लेषण; पृ.74)

कविता : भाषा प्रयोग 

कविता अपने गर्भ में अतीत से लेकर समसामायिकता तक के पूरे आयाम को समेटे रहती है और उसमें शैलीय नाम के धरातल पर निम्नतम श्रेणी के भाषा प्रयोग से लेकर उच्चतम श्रेणी तक के भाषा प्रयोग का संश्लेषण होता है. (साहित्य शिक्षण की भाषाविज्ञानिक दृष्टि अन्य भाषा शिक्षण के बृहत संदर्भ; पृ.120) 

कविता : भावक 

आज के काव्य चिंतन में कविता को 'उत्पाद' और भावक को 'उपभोक्ता' के रूप में देखने की दृष्टि अपने उत्कर्ष पर है. (बच्चन का काव्यशास्त्र; पाठ विश्लेषण; पृ. 59) 

कविता का कथ्य 

मनुष्य का अतीत और वर्तमान कविता के कथ्य को ही नहीं उसके अभिव्यक्ति माध्यम भाषा को भी दरेरते, कुरेदते हैं. (छायावादोत्तर काव्यभाषा; पाठ विश्लेषण; पृ.53) 

कविता की भाषा 

कविता का क्षेत्र हमारे जीवन की ही भाँति विविधरूपी होता है. ... कविता भाषा में ही और भाषा के माध्यम से ही रची-समझी जाती है. कविता की भाषा में उतनी ही सर्जनात्मकता होती है जितनी हमारे मस्तिष्क की. (साहित्य शिक्षण की भाषावैज्ञानिक दृष्टि; अन्य भाषा शिक्षण के बृहत संदर्भ; पृ.119) 

सभी भाषाई तत्व या उसकी शक्तियाँ जब एक निर्धारित चौखटे में आती हैं तब उसे हम उस भाषा समुदाय की कविता की भाषा कह सकते हैं. (साहित्य शिक्षण की भाषावैज्ञानिक दृष्टि, अन्य भाषा शिक्षण के बृहत संदर्भ; पृ.120) 

कविता पाठ विश्लेषण 

प्रसिद्ध भाषा चिंतक तथा शैलीविज्ञानिक रोमन याकोब्सन ने कविता पाठ विश्लेषण की एक सूक्ष्म तकनीक का जिक्र किया है (सेलेक्टेड राइटिंग्स : 1971 : मूतों, द हेग).  इस तकनीक में उन्होंने कविता को सबसे पहले बंध/ छंद (स्टैंजा) मैं बाँटने को कहा है. फिर यह देखने का आग्रह किया है कि बंधों के व्याकरणिक मदों का सममित (सिमेट्रिकल) वितरण किस तरह हुआ है कि अलग-अलग बंध मिलकर पूरे पाठ (कविता) का समूहन करते हैं, उन्हें एक 'प्रोक्ति' बनाते हैं. इस संदर्भ में उन्होंने व्याकरणिक दृष्टि से बेमेल तथा एक जैसे बंधों को एक समग्र पाठ के रूप में समन्वित करके देखने की प्रणाली भी हमें दी है. ('पटकथा' को यहाँ, यहाँ और यहाँ से भी देखो; पाठ विश्लेषण; पृ.90-91)

सोमवार, 23 सितंबर 2013

प्रो. दिलीप सिंह विचार कोश - 3

कथा पाठ विश्लेषण : चार स्तर 

कथा पाठ के चार स्तर बनते हैं - कहानी का प्रारंभ, कहानी के भीतर निहित विवरण, कहानी के बिंदु का प्रस्तुतीकरण और कहानी द्वारा किसी अन्य घटना या क्रिया को उठा लेना. (हिंदी कहानी की भाषा; पाठ विश्लेषण. पृ. 112)

कथा भाषा : 

कथा भाषा में सामाजिक परिस्थिति, सामाजिक संबंध और भाषा प्रयोग के विविध संदर्भ घुल मिले हैं. (साहित्य शिक्षण; भाषा, साहित्य और संस्कृति शिक्षण; पृ.139) 

कहानी के संदर्भ में भाषा की  बात अभी तक अधूरे और अपर्याप्त ढंग से ही जा रही है, जबकि कहानी सामाजिक जीवन को समष्टिगत ढंग से व्यक्त करने वाली सबसे सशक्त गद्य विधा है और हिंदी भाषा भी अपनी वैविध्यपूर्ण संभावनाओं को सामाजिक संदर्भों के साथ व्यक्त करने वाली व्यापक प्रयोग क्षेत्र की भाषा. (हिंदी कहानी की भाषा; पाठ विश्लेषण; पृ.103) 

कथा भाषा के विविध स्तर : 

कथा भाषा के स्तर - लेखक सापेक्ष (Emotive), पाठ सापेक्ष (Conative), लेखक-पाठक के संबंध पर आधारित (Phatic), कोड पर आधारित (Meta-Linguistic), संदेश पर आधारित (Poetic) और संदर्भ पर आधारित (Refrential). (हिंदी कहानी की भाषा; पाठ विश्लेषण; पृ.112)
भाषा की भीतरी परतें 
भाषाचिंतक प्रो. दिलीप सिंह अभिनंदन ग्रंथ
प्रधान संपादक - ऋषभदेव शर्मा
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली,
2012 प्रथम संस्करण, ९९५/-

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

प्रो. दिलीप सिंह विचार कोश - 2

आधुनिकीकरण 

आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में अनुवाद और पारिभाषिक शब्दावली की भूमिका प्रमुख होती है. (भाषा अध्ययन की आधुनिक संकल्पनाएँ, भाषा का संसार, पृ. 167)

उच्च हिंदी 

उच्च हिंदी शैली अति औपचारिक होती है. साहित्य में ऐतिहासिकता, पौराणिक और मिथकीय पृष्ठभूमि (हिंदू मान्यताओं से संबंधित) को उभारने के लिए इस शैली को अपनाया जाता है. (साहित्य शिक्षण; भाषा, साहित्य और संस्कृति शिक्षण, पृ. 103) 

उर्दू : हिंदी 

उर्दू कोई भाषा नहीं है, हिंदी की विभाषा है. (भाषायी यथार्थ बनाम भाषा का संकट, स्रवंति, वर्ष-55, अंक-4, जुलाई-2010, पृ.15)

भाषा की भीतरी परतें 
भाषाचिंतक प्रो. दिलीप सिंह अभिनंदन ग्रंथ
प्रधान संपादक - ऋषभदेव शर्मा
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली,
2012 प्रथम संस्करण, ९९५/-

रविवार, 8 सितंबर 2013

प्रो. दिलीप सिंह विचार-कोश - 1

अनुवाद 

अनुवाद अपनी प्रकृति में एक अनुप्रयुक्त विधा है अतः वह प्रयोजन और प्रयोक्ता के दबाव से मुक्त नहीं हो सकता. (‘समतुल्यता का सिद्धांत और अनुवाद’; अनुवाद : सिद्धांत और समस्याएँ; (सं) रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, कृष्णकुमार गोस्वामी, पृ.47)

एक भाषा के किसी पाठ (Text) का सहपाठ (Co-text) के रूप में रच्नान्तार्ण अनुवाद कहलाता है.  (‘समतुल्यता का सिद्धांत और अनुवाद’; अनुवाद : सिद्धांत और समस्याएँ; (सं) रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, कृष्णकुमार गोस्वामी, पृ.44)

अनुवाद करते समय स्रोत भाषा के पाठ के भाषिक उपादानों के समतुल्य लक्ष्य भाषा के भाषिक उपादान चुन लिए जाते हैं.  (‘समतुल्यता का सिद्धांत और अनुवाद’; अनुवाद : सिद्धांत और समस्याएँ; (सं) रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, कृष्णकुमार गोस्वामी, पृ.45)

आज अनुवाद केवल पाठ की संरचना तक सीमित न रहकर भाषा चयन, भाषा वैविध्य और भाषा के शैलीय पक्षों तक विस्तृत है. (अपनी बात, अनुवाद का सामयिक परिप्रेक्ष्य)

अनुवाद की भूमिका

भारत में प्रयोजनमूलक रूप में भारतीय भाषाओं के विकास में अनुवाद की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता. (अपनी बात, अनुवाद का सामायिक परिप्रेक्ष्य)

अनुवादक की भूमिका 

अनुवादक की भूमिका बहुआयामी होती है - पाठक की, भाषा विश्लेषक की और द्विभाषी की. (अपनी बात, अनुवाद का सामायिक परिप्रेक्ष्य)



भाषा की भीतरी परतें
भाषाचिंतक प्रो. दिलीप सिंह अभिनंदन ग्रंथ
प्रधान संपादक - ऋषभदेव शर्मा
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली,
2012 प्रथम संस्करण, ९९५/-

गुरुवार, 28 मार्च 2013

लोकार्पण : ''भाषा, संस्कृति और लोक''


लोकार्पण समारोह : ''भाषा, संस्कृति और लोक'' [ प्रो. दिलीप सिंह/ वाणी प्रकाशन/2012] : अध्यक्ष- प्रो. केशरी लाल वर्मा; मुख्य अतिथि- प्रो. वी. रा. जगन्नाथन; विशिष्ट अतिथि- प्रो.हीरालाल बाछोतिया, प्रो.गंगा प्रसाद विमल;
 साथ में - एम. सीतालक्ष्मी एवं प्रो.ऋषभदेव शर्मा :
 हैदराबाद: 10 मार्च 2013.
10 मार्च 2013 को दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के हैदराबाद केंद्र में डॉ. दिलीप सिंह द्वारा संपादित ग्रंथ 'भाषा, संस्कृति और लोक' का लोकार्पण-समारोह संपन्न हुआ. अध्यक्ष थे प्रो. केशरी लाल वर्मा और मुख्य अतिथि प्रो. वी. रा. जगन्नाथन. ग्रंथ  की पृष्ठभूमि पर स्वयं प्रो.दिलीप सिंह ने प्रकाश डाला और सामग्री का परिचय प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने दिया.

स्मरणीय है कि कुछ समय पूर्व प्रो.ऋषभ देव शर्मा ने इस ग्रंथ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी अपने ब्लॉग ऋषभ उवाच पर लिखी थी. यहाँ हम उसे उद्धृत कर रहे है....

भाषा, संस्कृति और लोक' : संपादक - प्रो. दिलीप सिंह
- ऋषभ देव शर्मा 

दो महीने से प्रतीक्षा थी इस किताब की. कल जब प्रो. दिलीप सिंह ने ज़िक्र छिड़ने पर औचक ही बैग  से प्रति निकाल कर दिखाई तो मेरा उछलना स्वाभाविक था. 'पं. विद्यानिवास मिश्र स्मृति ग्रंथमाला' [प्रधान संपादक डॉ. दयानिधि मिश्र] के अंतर्गत प्रो. दिलीप सिंह के संपादन में यह पहली किताब आई है. अत्यंत भावुकता और श्रद्धा के साथ उन्होंने सम्पादकीय में लिखा है - मुझे बराबर यह लगता रहा कि उनके अकादमिक व्यक्तित्व को जो भी अर्पित किया जाए वह उनकी विराटता के सामने अपनी लघुता ही प्रकट कर पाएगा.

प्रो. सिंह ने इस कृति ''भाषा, संस्कृति और लोक'' को ''भाषाविज्ञान की व्यावहारिक पीठिका'' उपशीर्षक दिया है जो इसकी विषयवस्तु की स्वतःघोषणा है. पंडित जी के प्रिय क्षेत्रों को ध्यान में रखकर यहाँ सात खण्डों में बीस लेखकों के चौबीस चिंतनपूर्ण आलेख संजोए गए हैं. स्वयं पं. विद्यानिवास मिश्र के ''भारतीय भाषादर्शन की पीठिका'' तथा प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव  के ''आधुनिक भाषाविज्ञान और भारतीय भाषाचिंतन'' , ''भाषिक प्रतीकों की प्रकृति'' और ''धूप की छाँव में : पं. विद्यानिवास मिश्र'' जैसे दस्तावेजी आलेख इस कृति की धुरी हैं जिसके गिर्द अत्यंत विवेकपूर्वक भाषा, संस्कृति एवं लोक विषयक सारी सामग्री को इस तरह संजोया गया है कि पाठक को अपने आप यह बोध होने लगता है कि यह सब मानो पंडित जी के ही विचारलोक का स्वाभाविक विस्तार है - संपादक ने सप्रमाण यह दर्शाया भी है.

इन  सम्मिलित लेखकों में  हैं - प्रो. सुरेश कुमार , डॉ. हीरालाल बाछोतिया, प्रो. कैलाश चंद्र भाटिया, प्रो. गोपाल शर्मा, प्रो. सूरज भान सिंह, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, डॉ. ऋषभ देव शर्मा, डॉ.पियूष कुमार श्रीवास्तव, डॉ. कविता वाचकनवी , प्रो. चतुर्भुज सही, प्रो. जगदीश प्रसाद डिमरी, प्रो. भारत सिंह, डॉ. बलविंदर कौर, डॉ. देव शंकर नवीन, डॉ.अंजू श्रीवास्तव, प्रो. देवराज, प्रो. एम.वेंकटेश्वर एवं प्रो. दिलीप सिंह. 

निस्संदेह 'आधुनिक भाषावैज्ञानिक चिंतन के व्यावहारिक पक्ष को यह किताब जगह-जगह विश्लेषणात्मक पद्धति को अपनाते हुए उजागर करती है. वैचारिक स्तर पर पुस्तक पठनीय है तो आत्मीय धरातल पर पंडित जी के प्रति एक भावभीनी श्रद्धांजलि!' 

भाषा,संस्कृति और लोक 
प्रधान संपादक - डॉ. दयानिधि मिश्र
संपादक प्रो. दिलीप सिंह 
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली 110002
2012 - प्रथम संस्करण 
204 पृष्ठ - सजिल्द
400 /=

रविवार, 30 सितंबर 2012

’अपने पथ पर चलना ही उसका बाना है‘



त्रिलोचन शास्त्री
त्रिलोचन को पढ़ना आपको प्रौढ़ बनाता है। बहुत-बहुत पहले से उनकी कविताएँ बाँध लेती थींजब छोड़तीं तो सब कुछ हल्का-हल्कापूरा पूरा लगताआज भी लगता है। उनकी कविता का स्वाद उस समय के कवियों से अनूठा था। त्रिलोचन निराशा के नहींआशा के कवि बन कर हम नव युवकों को मोह लेते थे। ऐसा वे जब मिलतेतब भी करते थे। त्रिलोचन अपनी राह चलेअपनी अदा से। अगर किसी परंपरा से वे जुड़ते दीख भी पड़ते हैं तो एक हद तक निराला से और कुछ दूर तक नागार्जुन से। मिट्टीसचएका और मनुष्यता के वे हर हाल में साथ होते हैं। तभी तो विपदाएँ उनकी आशा और उनके विश्वास के आगे पछाड़ खा-खाकरहार जाती हैं। उनका दृढ़ कवि व्यक्तित्व हमें अपनी ओर खींचता हैउन जैसा बनने को उकसाता है। वे कठिन कवि नहीं हैं। लोक-समृद्ध कवि हैं। यह कह दूँ कि लोक भाषा का ऐसा समृद्ध उपयोग कहीं और न मिलेगा। लगता है लोग शब्दों और लोक पगे मुहावरों में ही उनके सपने बसे हुए हैं। त्रिलोचन का काई खेमा नहीं है। वे अपने में अकेले ढब के कवि हैं। साफ़दो टूकमन की बात कहना कोई उनसे सीखे। वे अपने अंतर की अनुभूति को बिना रँगे चुने’ अपनी आत्मा की अतल गहराई में प्रवाहित भाव-जल में सिझा कर कागज पर उतारते हैं कि उनका दर्दउनके सपने और उनका आत्मविश्वास सब हमें तत्क्षण् अपने-से लगने लगते हैं। त्रिलोचन का जीवन भटकावों से भरा था संघर्षउनके जीवन की सच्ची कहानी था। पर उनका लेखन न तो कभी दयनीय बना और न ही आक्रोश की भट्ठी में जला-भुना। उल्टे वह सध्य और सर्वमंगला बनाखरे सोने की तरह तप-तपकर और-और निखरता गया। और त्रिलोचन की यह पंक्ति सच बनती चली गई कि लू लपटों में मिट्टी पक्की हो जाती है।

त्रिलोचन भाषा के ऐसे सौदागर हैं जो सपने बेचता है। सपनेछोटे-छोटेअपनाव के,निर्भयता केगति केसाहबस केप्रेम के। न जाने कितने सपनेकिन-किन के सपने पर सच्चे और संवेदी सपने। इसीलिए त्रिलोचन के लिए कविता विडंबनाओं का मातम करके जीवन को खोना’ नहीं है - कविता तो होना है’ - जीवन सेजीवन मेंजीवन के लिए : मृत्यु त्रिलोचन के लिए जीने की चुनौती है और नियति उनकी मुट्ठी में कैद है - घबराना क्योंजो होने को है/ वह होगा/धूपओसवर्षा से/क्या कोई बचता है।

त्रिलोचन जीवन के कवि हैं और जीना सिखाते भी हैं। ज़िंदगियों की उन्हें फ़िक्र है। धरती (१९४५) से आगे तक वे जीने का ढंग बताते चले आए हैं। उनके यहाँ प्रकृति और उसके उपकरण ज़िंदगी के उतार चढ़ाव का ही दृष्टांत बने हैं। अपनीआपकी और हमारी मानवीय कमजोरियों को वे सदा से जानते रहे हैं। तुम्हें सौंपता हूँ’ (१९८५ : राधाकृष्ण) में १९३८ से लेकर १९४६ तक की ग्यारह कविताएँ हैं और १९४७ से  १९६२ तक की तेरह कविताएँ। सबका अपना आकाश’ (१९८७ : राजकमल) में १९४८ से १९६३ तक की कविताएँ संकलित हैंजिनकी संख्या ५२ है। इनमें से चालीस कविताएँ १९४८-१९५१ के बीच की हैं।  फूल नाम है एक’ (१९८५ : राजकमल) को ९१ कविताओं में से ६६ - १९५४ तक हैं और १५ - १९६२ की। सबका अपना आकाश’ को छोड़ कर शेष दो संग्रहों में शेष कविताएँ ७० और ८० के दशक की हैं।३ कहना यह है कि परतंत्र भारत के अमानवीय माहौल में त्रिलोचन ने मानवतामनुष्यता और एकता की भावना को स्वर दिया। आजाद भारत के शुरुआती दस सालों में उनकी कविताएँ भारत की नई तस्वीर के प्रति आशान्वित हैं तो उसके बाद की (१९६७ तक की) देश में पनप रही विडंबनाओं पर नज़र रखे हुए हैं। इसके बाद त्रिलोचन आत्मलोचन की ओर मुड़ते हैंगाँव-नगर के बदलावों को लखते हैं और जीवन की आपाधापी में भूले मनुष्य की पड़ताल करते हैं। वे डगमगाते कहीं नहींकभी नहीं। डटने की उनकी मुद्रा रह-रह कर उनकी काव्य-यात्रा में कौंध-कौंध जाती है। बाद की कविताओं में त्रिलोचन की भाषा प्रयोगशील बनी है। उनकी भाषा का नयापन शुरू से ही उठान पर रहा है पर बाद में उस भाषा में निराला जैसी संरचनात्मक तोड़ फोड़ और नागार्जुन जैसी लोक संबद्धता के साथ कहन और संवाद की ही नहीं पत्र की शैली का भी कविता अच्छा खासा स्पेस बनाने लगता है। वे प्रारंभ से ही चीज़ों को आत्मीय बना कर देखने वाले कवि रहे हैं,उनका देखना’ नये कोण से देखना है जिसमें भाषा का वे अपनी तरह से इस्तेमाल करते हैं। काव्य भाषा (कविता की परंपरागत भाषा) और बोलचाल की भाषा दोनों पर उनका अद्‌भुत अधिकार है। इन्हें फेंटना भी वे जानते हैं और अलग अलग कर गाँठना भी। कवि की मुखरता का त्रिलोचन अकेले उदाहरण हैं। वे खूब बोलते हैं। पर सधे हुए स्वर में। उन्हें अपनी भाषा और अपने भावों पर पूरा भरोसा है। वे मौन नहीं जानते और इसीलिए कविता में खुद डूबे रहने की मौनी कवियों की आदत उन्हें नहीं रुचती। वे बात करना चाहते हैंसब से। अपने मन की कहना चाहते हैं - कवि हो तो अपने ही भीतर रहो न डूबे/डूब गए जोसबसे वेसब उनसे ऊबे।’ यह त्रिलोचन का वह काव्य सत्य है जो उन्हें अनोखा कवि बनाता है - त्रिलोचन का कवि बहिर्मुखी है - वह आस-पास की सब चीज़ोंसब लोगों को बाहर से ही नहीं भीतर तक देखता है। इस देखने में भाषा उनका साथ देती है। त्रिलोचन के सारे कविगुण (प्रेमआस्थाविश्वासदृढ़तासंघर्षशीलता,जिजीविषा आदि) भाषा पर उनके अपरिमित अधिकार से जगर मगर करते हैं पढ़ें तो गहरे उतर जाते हैं - चलना ही था मुझे - सडकपगडंडीदर्रे/कौन खोजतापाँव उठाया और चल दिया/खाना मिला न मिलाबड़ी या छोटी हर्रे/नहीं गाँठ बाँधीश्रम पर अधिक बल दिया।

त्रिलोचन की कविता अपने पाठक से आम संवाद हैनज़दीकी बातचीत। इस बातचीत में इसीलिए वे अपने लोगों का तू’ या तुम’ से संबोधित करते हैं ; ‘आप’ से कभी नहीं। सीधे संवाद का यह पाठ कई तरह के जीवन सत्यों को भिन्न-भिन्न कलेवर में प्रकट करता है। एक कलेवर इसमें गान’ का है। त्रिलोचन ने गीतग़ज़ल और सॉनेट तीनों लिखे। मुक्त छंद की कविता तो लिखी ही। वे गीत की ताकत पहचानते हैं। गीत ही उनके यहाँ स्वरलयगान का पर्याय हैं और एकता के कारक भी - अपने अपने कंठ किलाओगाओगाओगाओ।’ जीवन संगीत की एक तान स्वर साधना मनुष्य को यह सीख भी देती है कि उन्हें भेंट जो आगे आए।’ जो आगे बढ कर अपनत्व चाहे उसे गले लगानातभी संभव है भेद-भाव का मिटना और ऐसे समाज की रचना जहाँ अपनाव ही बने गई अवस्था।’ त्रिलोचन मिलकर गाने’ को जीवन और समाज से अटूट जुड़ने का एक जरिया मानते हैं। इस समूह गान में कहीं कहीं उनका लोक बिद्ध मन भी बिंबित है - आज सुनाना/फिर मिलकर गाना है/शैली बिरहे वाली।’ ‘बिरहा’ भोजपुरी क्षेत्र की एक विरहाकुल शैली है जिसे सुरउठा उठा कर कई लोग गाते हैं - तब दुःख मानो बँट जाता है और दर्द छँट जाता है। सब अपने हो जाते हैंअपनों से भी अपने/कवि की प्रकार भी है कि मेरे अपनेअपनों से भी अपने/खुले कंठ से गा तो/नए गीत जीवन के।’ खुले कंठयानी अपनी अंतरंग की भीतरी पर्त से - जिसमें न कोई दुःख होन बनावट और न ही अनमान मन/सब कुछ बस उन्मुक्त होइससे कम कुछ भी नहीं/तभी तो ये जीवन गीत बनेंगेवह भी नयेनवेले,ताज़ाटटके। इस जीवन गीत का न अंत है न इति। यह कभी रुकता भी नहीं। साँस की तरह धड़कता रहता है - अनवरत/मरण आएबिछोड़ा आए जीवन गीत चुकता नहींरुकता नहीं - जो छूटे हैं/उनके लिए नहीं रुक जाता है,/गाता है/गति के गान।’ हंस के हवाले से प्रस्फुटित यह पंक्ति सुख में दुख में चलते जानेआगे बढ़ने और जीवन की गति को न रुकने देने का प्रेरक संदेश है। गति ही जीवन है - यह परम सत्य यहाँ उजागर है। सब चलेंसब बढ़ें, ‘सब अपनी अपनी लय पाएँ। एक दूसरे के साथ स्तर साधें। कभी तुम्हारा स्वर दुहराएँ’ हम और कभी तुम हमारा। स्वर दुहराओकुछ इस तरह कि एक लहर में लहराएँ फिर/कंठ कंठ के गान।’ तभी यह असंभव भी संभव हो पाता है कि गीत कहीं कोई गाता है/गूँज किसी उर में उठती है।’ प्रेम,लगाव और एकता प्रेम की भावना के नतीजे को त्रिलोचन इन शब्दों में दिखाते हैं - गा कर अपने गान स्वरों से आसमान को/मुखर करेंगे और प्यार सबको परसेगा।’ प्रेम की आवाज़ को दिग दिगंत तक मुखरित करने का ऐसा संकल्प विभोर करने वाला हैवही ले सकता है यह संकल्प जो औरों के साथ होदिन रातअहर्निशपल पल मेरा दिन भी औरों के ही साथ कहीं है।’ एक आदमी की तरह साथ रहने और आदमी की तरह पहचाने जाने की बड़ी छोटी सी अभिलाषा एवज में चाहता है कवि कि - आदमी हम ऐसे हों/कि जिनके बीच रहते हैं/वे भी हमें आदमी कहें/और यों ही सदा जानते रहें।’ आज के अलगावबिलगाव और विखंडन के उत्तर आधुनिक समय में त्रिलोचन के इस भाव की फिर फिर पड़ताल और फैलाव ज़रूरी है।

त्रिलोचन जीवन की उत्कृष्टता के हामी कवि होने के साथ ही जीना सिखाने वाले एक बिरले कवि हैं। उनकी कविताएँ इस मामले में मात्र इशारा नहीं करतींसीधी और साफ़ भाषा में जीने के गुर समझती हैं। भर दे दुनियाँ को खिलखिल से’ कहने वाले त्रिलोचन अपने आत्मीयों (समस्त मानव समुदाय उनके लिए आत्मीय है) को दुनिया जहान को खुशी देने का पाठ पढ़ाते हैं। सिर्फ देने’ का नहीं खुशी’ से भर देने काजिसके लिए उनका शब्द खिलखिल’ - अपार और निश्च्छल प्रसन्नता ही खिलखिलाती है। भयमृत्युआलस्य का त्रिलोचन से बड़ा कोई दुश्मन नहीं - साहसअमरतागति के वे पक्षधर हैं - बाधाओं की भीड़ देख कर/आधे पथ से फिरना कैसा?/जाने दो जब मरण सदम है,/कायर का-सा मरना कैसा?/दिन न एक रस सदा मिलेंगे/संशय मन में भरना कैसा?’ इन पंक्तियों का एक एक शब्द कितना कुछ सिखा जाता है - कैसाके प्रयोग से यह सीख निर्भय जीवन का हमारे लिए पथ प्रशस्त कर देती है। और ये पंक्तियाँ हमें साहसतेज और ओज के अगले पड़ाव पर ला खड़ा करती हैं कि - बाधाओं की ओर न आँख उठाओ/अत्याचारी को निस्तेज बनाओ/ पराजयों में गान विजय के गाओ।’ त्रिलोचन जानते हैं कि तन-मन का आलस्य मनुष्य को जल्दी घेर लेता है। आलस्य से शिथिल लोगों की जागृति ही उसे कर्मठता की ओरसंकल्पों ी ओरविवेक की ओर मोड़ सकती हैसोकवि ने पुकार लगाई है - मत अलसाओ/मत चुप बैठो/तुम्हें पुकार रहा है कोई।’ और फिर क्या’ संरचना में लिपटी ये पंक्तियाँ भी - पछताना क्याथक जाना क्या,/बलसाना क्याभय खाना क्या,/जब तक साँसा तब तक आसा/यह मंत्र सुनाती हूँ।’ ‘संधा तारा’ के माध्यम से दिया गया यह जीवन मंत्र गाँठ में बाँध लेने योग्य है। और इसी के साथ हताशा और दुःख की जगह जीवन में विश्वाससंकल्प और सुधि (विवेक) को अपनाने का आग्रह करने वाले ये प्रेरक और उद्‌बोधक वाक्य - कब कटी है आँसुओं से राह जीवन की/दीप सा विश्वास ही है चाह जीवन की/साँस है संकल्पसुधि है थाह जीवन की।’ इसलिए पग पग पर जोत नई उकसाओ/पैर बढ़ाओं।’ इस तरह मानव जीवन को बिखरने न दे पाने की शपथ ले कर चलने वाले कवि हैं - त्रिलोचन। मनुष्य को इतनी चिंता मेरे जाने और किसी कवि ने नहीं की है - सो गया था दीप/मैंने फिर जगाया है’ - जब लिखते हैं त्रिलोचन तो एक पल भी अविश्वास नहीं होता। एक कविता को लगभग पूरा पढ़ा जायकवि की जीना सिखाने के सात्विक हठ को तफसील से समझने और जीवन में धारने के लिए - बढ़ो मृत्यु की ओर नज़र से नज़र मिलाओ/डर क्या हैजीवन में जो कुछ कल होना है/आज अभी हो जाय/तुम्हें यदि कुछ खोना है/तो अपने मन का भय/जड़ मूल से हिलाओ/इस दुर्बल तरु को,धक्के अनवरत खिलाओ/इस उस क्षण में उखड़ जाएगाजो कोना है/इसका अपनावहाँ साहस बीना है,/फिर इस बिरवे को विवेक-जल सदा पिलाओ.../कितनी सार सँभाल रखो पर जीवन की लौ/बुझती ही है ..... आगे फटती है पो,/कौन कहेगा तुमने सागर व्यर्थ थहाए।’ कोई संशय अब नहीं कि त्रिलोचन कबीर की काशी में जितना रहेरम कर हरे। प्रेम के बिना आदमी से कुछ न बनेगा। प्रेम कबीर का भी बिंदु है मानवता का और त्रिलोचन का भी - प्यार बीज हैमन बोता है/चीन्ह चीन्ह कर क्षेत्रकहाँ से वह पाता था/ऐसे ऐसे बीज/बीज कोई खोता है?’ प्रेम ही जीवन है। कवि त्रिलोचन से और इस बहाने सभी कवियों से कहा प्रेम ने कवि मुझको भूले न भूलना/जीवन को सर्वदा रूप मैं देता आया।

त्रिलोचन की कई कविताओं से उनका जीवन झाँकता है और उनकी सोच भी। आलोचकों ने कहा है कि यह उनकी आत्मपरकता’ है, ‘आत्मग्रस्तता’ नहीं। निराला’ की तरह त्रिलोचन अपनी जंदगी के कड़वे मीठे अनुभवों को ही नहीं प्रकटतेएक मोड़ पर खड़े होकर आत्मालोचन भी करते हैं। इसके अलावा भी सर्जना के पड़ावों पर उन्हें बरग लाने वालों पर व्यंग्य रसे सराबोर टिप्पणियाँ भी करते हैं। त्रिलोचन के इस जीवन सत्य में एक स्तर वह साहसजुझारूपन और दृढ़ता वाला है जिन्हें साथ ले कर चलने का आग्रह वे अपने प्रियजनों से भी करते रहे हैं - वही भाव मैं’ के साथ इस तरह अभिव्यक्त हुआ है - दूज का है चाँदतम मेरा करेगा क्या/राह मैं चलता रहूँगा,/ठोकरें सहता रहूँगा,/गिर पडूँगाफिर उठूँगा,/और फिर चलता रहूँगा;/ठोकरों सेहार से/कोई डरेगा क्या/साथ चाँदी हैन सोना,/कर्म के ही बीज बोना,/खेत काया हैबना है,/और यह अवसर न खोना;/हाथ बाँधे यह लहर कोई तरेगा क्या।’ आत्मालोचन के स्तर पर त्रिलोचन अपने जीवन का लेखा जोखा करने हुए खोने के सत्य से घबराते या हताश नहीं होतेअपनी कमियों कमज़ोरियों से सबक लेकरकलुष को धो पोंछकर आगे बढते रहने की ठान चलते हैं - जब अपना लेखा जोखा/कियाबात उतराईखुल कर आगे आई,/इधर उधर में रहा,गाँठ का भी सब खोया।/दिन रहते मैंने सुधि पाई,/और नहींअब और नहींढोया तो ढोया। दिन रहते सुधि पाने वाले कवि हैं त्रिलोचन। सुबह के भूले की तरह शाम को लौट पड़ने का विश्वास लिए हुए। आदमी दोषों का पुतला हैपर दोषों को न वह खुद देखना चाहता हैन उसे यह बर्दाश्त होता है कि कोई दूसरा उसके दोषों पर उँगली दसे। त्रिलोचन ऐसे आदमी नहीं हैं - वे खुलकर कहते हैं कि कड़वी से कड़वी भाषा में दोष बताओ/मुझको मेरेसदा रहूँगा मैं आभारी।’ और अपनी गलतियों का उन्हें भान भी हैऔर इसका भी कि वे क्यों हुईं - जहाँ जहाँ मैं चूकाथी मेरी लाचारी।’ लाचारी इसलिए कि मेरे मन में एक और मन है जो सारी/बातें उल्ट दिया करता हैसब तैयारी/रह जाती है।’ मन की दुर्बलता किसमें नहीं होतीउसे तो जीतना ही होता है। कहा भी गया है - मन के जीते जीत है मन के हारे हार। त्रिलोचन अपने दुचित्ते मन को जीत कर उलट गई बातों को सीधी कर लेने को दृढ़ संकल्प हैं - मैं फिर अपने को देखूँगाफिर जो उतरन,/इधर उधर कीइनकी उनकी संचित की है/फेंक फाँक दूँगा।’ त्रिलोचन यह भी कहना चाहते हैं कि मानव मन प्रकृतिकः मैला नहीं होतावह कलुष बनता है बाहरी तत्वों और प्रभाव से। दिन रहते त्रिलोचन इन उतरनों को चीन्ह तो पाए ही हैंइन्हें फेंक फाँक देने को उद्यत भी हैं। यह बाहर की मैल कवि त्रिलोचन को सर्जना का अलग बाना धारने को भी ललचाती रही है। वे सामान्य आदमी थेपर ऊँचे कवि। प्रगतिवादप्रयोगवादसाम्यवाद के पैरोकार उन्हें अपनी-अपनी ओर खींचने का बहुविध यत्न करते हैं - प्रतिभा नहीं चाहिएमेरे गट में आओइधर उधर मत भटको।’ पर त्रिलोचन का उन्हें कहना है कि आओइस प्रगतिवाद को छोड़ें/कविता की बात करें।त्रिलोचन ने कविता’ के सिलसिले में कभी समझौता नहीं किया और अपने बहलाने फुसलाने वालों पर करारा व्यंग्य भी किया - हो तुम भी घोचूँ ही/भाषाछंदभाव के/पीछे जान खपाते हो/पद गया जमाना/इनका/छोड़ो भी/आओअब से मन माना/लिखा करो/गद्य ही ठीक है/अब कटाव के/ढब बदले हैं/बोल चढ़े हैं भाव ताव को/ .....विषय नहीं सूझता?/अजी तुम लिख दोढेला’/इसके बाद लिखो हँसता था’/इसके आगे?/बहुत खूबआ हा, ‘भीनी सुगंध उड़ती थी/फिर नभ में उमड़ा घुमड़ा मेघों का मेला,/सन्नाटा छा गयाधरा पर अंकुर जागे’/यह प्रयोग हैकलम जिधर चाहा मुड़ती थी।’ त्रिलोचन वादों’ की सच्चाई से खूब वाकिफ़ हैं कि वे सब पर्त बनाए/शब्द रचा करते हैं, - वही अर्थ उतराए/जिसकी आकांक्षा हो,/चाल दिखा जाते हैं।’ कविता त्रिलोचन के लिए समाजी यथार्थ को सही बदलाव की ओर मोड़ने और लोगों के दुख-दर्द को पी पी कर जीने का उपक्रम है। वे आशाविश्वास और साहस के कवि हैं। वे जीवन की नश्वरत को बूझते हैं अतः निर्भय हैं। वे पंत की तरह दूसरे जीर्ण पत्रों के द्रुत गति से झर जाने की अभिलाषा नहीं रखते और न ही निराला की तरह जीवन की सांध्य बेला का मातम करते हैं। वे अंत को सहज देखते हैं और पौढ़े जीवन के दर्प के साथ कह पाते हैं कि बिछे बाग में थे पतझर के टूटे पत्ते,/ऊपर किसलय नई शान से लहराते े/वायु तरंगों मेंरह रह कर दिखलाते थे। नई नई थिरकन।/.... हवा बहीसूखे पत्ते बोलेचलचलचल/हम सब देख चुके हैं जो तू देख रहा है,/भोग चुके हैंजिन भोगों की साध जगाए/तू जीवन से लगा हुआ है;/हमें खाद बनना हैविधि का लेख रहा है/इसी अर्थ काऊँचे थे हम नीचे आए।’ त्रिलोचन एक अलग किस्म के कवि लगते हैं तो इसीलिए कि वे सच बोलते हैंपूरे साहस के साथ। उनका कवि सर्वजन के साथ फिरता है। उन्हें सच्चे सपने बेचता है। त्रिलोचन के ये सपने ही उन्हें धरती के जनपद के कवि के रूप में मान प्रतिष्ठा दिलवाते हैं : सपने लो सपने लो/मन चीते सपने लो/जिसका विश्वास टूट गया हो/साथ और कोई न हो/वह मेरे सपने ले/जिसका बलअवसर परधोखा दे जाता हो/वह मेरे सपने ले/जिसको कुछ करने कीभलीभाँति जीने कीइच्छा हो/वह मेरे सपने ले/गाँव-गाँव नगर-नगर गली-गली डगर/मैं पुकार रहा हूँ/सपने लो सपने लो।’ सचत्रिलोचन की कविताएँ यह सब करती हैंढाँढस बँधाती हैंसाथी बनकर दूर तक साथ चलती हैंबल देती हैंआत्मविश्वास बढ़ाती हैंकुछ करते रहने को उकसाती हैंखालिस जीवन जीने के गुर बतलाती हैंस्वावलंबन बन कर सीना ताने जीने का साहस देती हैं - नहीं चाहिएनहीं चाहिए मुझे सहारा,/मेरे हाथों में पैरों में इतना बल हैं,/स्वयं खोज लूँगा किस किस डाली में फल है।’ त्रिलोचन की कविताएँ थके हारों को भी मंजल तक पहुँचने की शाम्र देती हैं - दुनिया का रास्ता अपने पैरों चल लेंगे/मंज़िल तक पहुँचेगे तब जा कर कल लेंगे।’ त्रिलोचन का जीवट उनकी ज़िंदगी और उनकी कविता में भी कूट कूट कर भरा हुआ दिपता रहा है। कविता और जीवन का फर्क चाहे कहीं और मिलीत्रिलोचन की सर्जना में दोनों चंदन पानी की तरह घुलमिल गए हैं।

त्रिलोचन की चार कविताएँ फूल नाम है एक’ में नागार्जुन पर हैं। दोनों एक ही लगते हैंकई स्थलों परकविता में भीज़िंदगी में भी। दोनों कभी डरे नहीं किसी सेजूझे और लड़े दोनों। फकीरी दोनों ने स्वेच्छा से वरण कीफिर भी तने रहे जीवन भर। दिखावेदंभतामझाम को अपने पास भी फटकने नहीं दिया दोनों ने। दलितवंचित दोनों को जानते थे,अपना अपना मानते थे। साफ़गो दोनों थेजीवन के लिए मरते थे। अपनी अस्मिता का मान करते थे। टूट जाँयपर झुके दोनों नहीं कभी कहींजीवन भर। नागार्जुन के लिए जो भी लिखा त्रिलोचन ने वह सब का सबजस का तस उन पर भी सच्चा उतरता है 
(१) कहा एक महिला नेनागार्जुन तो कवि से/नहीं जान पड़ते/आए तो ज्यों ही आए/त्यों ही/घुलमिल गए/ढंग ऐसे कब पाए/थे हमने कवियों के ..../एक मजूर ने कहा,नागार्जुन ने मेरे/बच्चे को बहलाया फिर रोटियाँ बताईं/खाईं और खिलाईं/खुशियाँ साथ मनाईं/गम आया तो आए/टीह टाह की/घेरे/खड़े रहे असीस बन कर/हठ हराफेरे/फिरे नहींचिंताएँ मेरी गनी गनाई।
(२) नागार्जुन क्या हैअभाव है/जमकर लड़ना/विषम परिस्थितियों से उसने सीख लिया है,/लिया जगत से कुछ तो उससे अधिक दिया है ....../विपदा ने भी इस घर को अपना माना है,/इस विपदा पर कवि ने लहर हँसी की छापी,/आँखों की प्याली छटा स्वप्न की खापी;/अपने पथ पर चलना ही उसका बाना है।
(३) नागार्जुन जनता का है/जनता के बन में/आमग नहीं दिखलाई देता/यह जनधारा/लिए जा रही है उसका .... /पल दो पल को यदि हारा/लोटा पोटा भू पर और/ग्लानि को गारा।
(४) अपने दुख को देखा सबके ऊपर छाया,/आह पी गयाहँसी व्यंग्य की ऊपर आई ../कभी व्यंग्य उपहास कभी आँखें भर आईं/अत्याचार अनप पर नागार्जुन का कोड़ा/चूका कभी नहींकोड़ा है वह कविता का/कहीं किसी ने जानबूझकर अनमल ताका/अगर किसी का तो कवि ने कब उसको छोड़ा।

त्रिलोचन की अभिव्यक्तियों का संसार भी बहुरूपी और अनोखा है। कविता का सौंदर्य आँकना भी उन्हें आता है और खुलकर कहना भी। खुलकर कहने में त्रिलोचन मुहावरों का खूब प्रयोग करते हैं। हिंदी के कविता इतिहास में इतने सारे मुहावरों का ऐसा सधा प्रयोग किसी कवि में नहीं मिलता। किसी हिंदी कथाकार के पास भी शायद ही इतने मुहावरे मिलें। काव्य सौंदर्य बड़ी सरलता से त्रिलोचन पैदा करते हैं कि पंक्तियाँ याद रह जाती हैं :
·         शिशिर काल के कुहरे पर जब चित्र सुनहले/रवि अपने कर से लिखता है
·         उष्ण करों से सूर्य धरा को सहलाता है
·         खेती के ऊपर सोने का पानी छाया
·          चाँद/ढिबरी के गाढ़े धुएँ जैसे/बादलों में था/
प्रवाह/बादलों का आज खर था/चाँद लुका छिपी खेलता सा/लगा
हवा/ठंडी-ठंडी देह-मन को जुड़ाती हुई/आती/जाती
·          बादल घिर आए/ताप गया पुरवा लहराई/
दल के दल घन ले कर आई/जगीं वनस्पतियाँ मुरझाई
/जलधर तिर आए
·          बरखामेघ-मृदंग थाप पर/लहरों से देती हैं जी भर/
रिमझिम रिमझिम नृत्य ताल पर/पवन अथिर आए
·          पुर-पुर गई दरार/शुष्कता कहाँ खो गई

लोक सिद्धता इन सुंदर प्रकृति चित्रों में भी त्रिलोचन की मुखर है। ढिबरी का गाढ़ा धुआएँ शहरी प्रतीक नहीं हैलुकाछिपी का खेलजुड़ाना क्रियापुरवा का लहरानादरार का पुरना,लोक अनुभव की जमीन से उपजी अभिव्यक्ति हैं। ऐसे ढेरों उदाहरण त्रिलोचन की कविताओं में मिलते हैं और सिर्फ़ उन्हीं में मिलते हैं। लोक शब्दोंलोक अनुभवोंलोक जीवन को त्रिलोचन ने भाषा में कुछ इस तरह लपेट दिया है कि काव्यार्थ में चमक आ गई है और अभिव्यंजना टटकी हो गई है। कविता में मुहावरेदानी का ऐसा ही लोक सम्मत जादू त्रिलोचन जगाते हैं। ऐसा करने से भाव जाग जाते हैंअनुभूतियाँ चौकन्नी हो जाती हैं और काव्य भाषा एक तरह के अद्‌भुत आस्वाद से भरीपूरी हो जाती है :
·         दुख तो तिल से ताड़ जल्द हो जाते हैं
·          जीवन में तुमने भी कितने पापड़ बेले
·          जैसी हाटबाट वैसी है/क्यों फिर थोड़ी सी आस बाँध ली पल्ले
·          होड़ा होड़ी जहाँ मची है
·          जिसकी तकदीर तान कर सोई है
·          तबियत खट्टी आज अहिंसा की है
·          शांति की सट्टी मंद पड़ी है
·          डाँटा फटकारा चिंताओं को/अब जाओ,/जहाँ तुम्हारा जी चाहेहुड़दंग मचाओ,/मेरी जान छोड़ दो/आह कहाँ कल पाई/मैंने पल भर को भी
·         हाट पहुँच तो गए टेंट में दाम नहीं है
·          अपना गला फँसाकर मैंने भर पाया है
·          चाभो मालबनाओ उल्लूमौज से जियो
·          ठोक बजा कर देख लियाकुछ कसर न छोड़ी/दुनिया के सिक्के को बिल्कुल खोटा पाया
·          अचरज है मुझको कि त्रिलोचन कैसे/इतना अच्छा लिखने लगा ... /एक फिसड्डी आकर अपनी धाक जमाये/देख नहीं सकता हूँ मैं यों ही मुँह बाये?
·          पर यह कथन बहुत सच्चा है,/इसका अंश न कुछ कच्चा है
·          खींचानोची मची हुई है अपनी अपनी
·         कौर छीनकर औरों का जो खा जाते हैं
·          यहाँ माल है जिसका चोरना/वह दूकान चला पाता है
·          कसम जवानी की यदि/मैंने पाँव हटाए।

जो काव्य पंक्तियाँ इस आलेख में यहाँ वहाँ उद्घरित की गई हैं उनमें भी मुहावरेदानी मिल जाएगी। उन मुहावरों को त्रिलोचन ने तरजीह दी है जो आम जन की व्यावहारिक भाषा का अहम हिस्सा बन चुके हैं। सबसे बड़ी बात है संदर्भ में वांछित अर्थ पैदा करने और सकुशल पाठक तक पहुँचाने के लिए ढेरों-ढेर मुहावरों का कविता की पूरी संरचना में सटीक संयोजन। क्योंकि कविता भाषिक तत्वों के जमान से नहींउनके परस्पर और समजस्वीकृत संयोग से बनती है।

त्रिलोचन का भाषा संसार अत्यंत समृद्ध है। संस्कृत से लेकर बोली तक की शब्द शक्ति की उन्हें गहरी पहचान है। वे भाषा के भीतर रहने वाले कवि हैं। एक एक शब्द की आत्मा उनकी पहचानी हुई है। नयापन उनकी काव्य भाषा की विशेषता है। विराम चिह्नों का प्रयोग उनकी काव्य भाषा में खूब हुआ हैपदों और वाक्यों की तोड़ कर संयोजित करने में वे इनका कुशल प्रयोग करते हैं। शब्दों की जात को पहचान कर उन्हें अर्थगर्म बनाना सिर्फ और सिर्फ त्रिलोचन ही जानते हैं। भाषा की जातीयता त्रिलोचन के कवि के लिए पहली और आखिरी कसौटी है। अवधी और भोजपुरी शब्दों की ताकत वे पहचानते हैं। बोली-शब्दों के उच्चरित रूप को उन्होंने कविता की जय बनाने के लिए बखूबी शामिल किया है। अन्य स्रोतों के शब्दों को भी वे लोक प्रचलित ध्वनि भेद के साथ अपनी कविता में ले आने में संकोच नहीं करते। भाषिक विधान के कारण ही उनकी कविता औरों से हट कर लगती है। भाषा के आभिजात्य में उनका तनिक भी विश्वास नहीं है। उनकी कविता ज़मीन की भाषा को अपनाती है। जिस भाषा में वे सोचते हैंउसी में लिखते हैं और जिस भाषा में वे लिखते हैं उसे (उस) जनपद के लोग बूछते समझते हैं। कुल मिलाकर कहें तो त्रिलोचन की भाषा के अपने निजी संस्कार हैं। यह भाषा आम कंठ की वाणी है जो कवि के स्वर में फूटी है। त्रिलोचन की काव्य भाषा गहरे विश्लेषण की माँग करती है। फिलहाल कुछ नये नये से भाषिक संगठनों को प्रकार के रूप में देखते चलें :

प्रकार : I
१.  चुप हो जा/ऐसे मैं निकालता हूँ कि/दर्द तो भाई अलग,/
तुझे मालूम भी न होगा,/कब आई और मोचनी खींच ले गई (मोच)
२. मन इतना टेकी/रहा कि तड़पा किया (टेक धारण करने वाला)
३. वह ऐसी डाही है (डाह करने वाली)

प्रकार : II
१.  बाहर का डर भीतर के खग को न तरासे/
शांति सुमति होदुःख कभी मन को नगरासे ...। मन में न हरासे (त्रासेगासेह्रासे)
२. कैसा युग हैकहीं अकन लोहाय हाय है (आँक लो)
३. सुबह सुहाई देख उधर तो (सुहावनी)
४. क्या इस जन से रूछे (रूढ़ेअलग)
५. मँजर गये आम
६. पत्ते पुराने पियरा चले
७. मैंने हहास सुना आसमान का (अट्ठहास)
८. ढर्रा नोखा है (अनोखा)

प्रकार : III
१.  इन दिनों क्या कुछ नए झमेले/तुमको घर रहे हैं
२. अब ढहते हैं मन के/मोहक महल
३. तुमने महिमा की सर्वत्र कनात तनाई
४. सब कुछ स्वार्थ-सूत्र में नाधा
५. हाथ मैंने उँचाए हैं
६. डर नहीं है/हँसा जाऊँगा
७. सोच लोजो बीज बोओगे तुम्हें लुनना पड़ेगा
८. अपराए हैं तो तराए भी हैं ये/आप आ गए हैं बराए भी हैं ये
९. मौन रह कर टोया था/टीस जहाँ उठती थी
१०. आज प उठती थी
१०. आज अँगडा रही है

प्रकार : IV
१.  तुम तो जैसे थके थकाए भरपाए हो
२. यह अपना घर है जिसमें टोटा/ही टोटा है
३. घोर घाम हैहवा रुकी है। सिर पर आ कर सूर्य खड़ा है

प्रकार : V
१.  अभी चला क्याबहुतबहुत आगेचलना है। दुबिधा छन ही जाएगी
२. ऊना मनचू उठी नीरवता
३. खिसक चली रात/नखत चले,/उठा अलस/नियति हिली,/हँसी प्रात
४. रामनाथ का मकान बैठ गया है
५. फेरे करते रहेपाँव उनके खिया गए
६. धर्मशाला की कुर्सी ऊँची है
६. कोई राग तुम कढ़ा दो/आशा म नहीं जाएगी

प्रकार : VI
युतियाँ (युक्तियाँ)नाराज़ी (नाराज़गी)अथिर (अस्थिर)प्रात (प्रातः)अपनाव (अपनत्व)मुसका कर (मुस्कुरा कर)आकास (आकाश)जोत (ज्योति)अभिलाष (अभिलाषा),बरस (वर्ष)नश्वत (नक्षत्र)

त्रिलोचन की कविताओं का बड़ा हिस्सा छायावाद की छाया में पला पुसा है अतः छायावादी शब्द समूह को उन्होंने पर्याप्त स्थान दिया ै जैसे - बादलघनजलघरबरखापवन,दादुरमोरपपीहासमीरइंद्रधनुकंठगानपावसमधुसंध्याप्रातराकाशारदाज्योत्स्नाचाँदनी,लहरउपवनसुषमाशरदपारिजातबेलाकपोतदीपज्योतिस्नेहमंजरियाँनीड़खगभोरसरोवर,भौंरेक्षितिजउषाविहगनीरवछायातमव्योमओसगुंजनपुष्पमझरसरितासुमन दलनव,प्राणप्रभाज्योति पथधारा तिमिरउमाविजनहासबीनलयझंकारतरंगतारकस्निग्धश्याम धनउत्तापकाकलीमौनदृगमलिनदूबकिरणपथिकउद्भ्रांतएकाकीपंकआनंदरसशतदल,सम्मोहननिर्जनवाणीमधुगीतपीडाअश्रुहासपथनिशाउषाअरुणप्रभामेहपिक पंकजराव,गंधतानआभाझंकारआँसूअमृत।

एक तो यह कि कवि को अपनी काव्य परंपरा के भाषिक उपादानों का भान होना चाहिए और वह त्रिलोचन में अकूत है। दूसरे यह कि इस शब्द समूह को उन्होंने नये भावों की उद्भावना के लिए नये अर्थ संधान के साथ अपनी काव्य भाषा में बुना है। अधिकांश कवि नव्यता को परंपरा से कटाव और आधुनिकता को जातीयता से अलगाव के रूप में लेते हैं और चुकते हैं। त्रिलोचन ने आधुनिक यथार्थ बोध को प्रकटाने के लिए परंपरा से पराप्त शब्द भंडार को पड़ताल ीऔर जाँच परख कर नये संदर्भ और नया काव्योन्मेष पैदा किया। कुछ उदाहरण देखें -
·         पथ पर चल कर जो बैठ गए/वे क्या देखेंगे प्रात नए
·          ये अनंत के लघु लघु तारे/दुर्बल अपनी ज्योति पसारे/अंधकार से कभी न हारे
·          आओ,/अच्छे उमगे समीर,/जरा ठहरो/फूल जो पसंद हो उतार लो/शाखाएँ,टहनियाँ,/हिलाओझकझोरो,/जिन्हें गिरना हो गिर जाँय/जाँय जाँय
·          कहीं एक भी दुःख न रहने पाए/नई उषा आई है आज जगाने
·          गान बन कर प्राण ये कवि के तुम्हारे पास आए
·          अमृत प्राण का अति दुर्लभ है देखो कहीं न चुकने पाए
·          मेघ ने सित छत्र ताना/वायु ने चामर हिलाए/इंद्रधनु नत सूर्म ने दी/चंद्र ने दीपावली की/तुम न हारे देख तुमको दूसरे जन भी न हारे
·          झूम रहे हैं धान हरे हैंझरती हैं झीनी मंजरियाँ/खेल रही हैं खेल लहरियाँ/जीवन का विस्तार है आँखों के आगे
·          गया स्नेह भी और रह गए आप निखट्टू
·          लतिका द्रुम में नूतन फूल लगाओ
·          रस भरने को रस जीवन का सुखा दिया है

त्रिलोचन के कथ्य और भाषा में जो लोच और लय है वह आम आदमी से उनकी रूहानी प्रतिबद्धता का ही नतीजा हैं। वे किसानों और दलितों को अपना बना कर रचने वाले हिंदी के कुछ गिने चुने कवियों में से एक थे। वास्तव में त्रिलोचन गँवई थे और वैसी ही धजा में जिये भी। उनकी कविता भी गाँव के ठेठ देहाती की नज़र से देशदुनिया और प्रकृति को देखते हुए बनी है। हिंदी के किसी कवि ने शायद ही कभी लिखा हो कि गीत गड़रियों के सुन सुन कर दुहराऊँगा।’ इन गीतों को लोक भीनी खुशबू त्रिलोचन की कविता में किसी न किसी स्तर पर रची बसी है। वे इस गड़रिये के गीत को दूर-दूर से सुन कर मुतासिर नहीं हुए हैं - उसके जीवन को और खुद उसे भी अच्छी तरह जानते हैं - गाता अलबेला चरवाहा/चौपायों को साथ संभाले/ ... नए साल तो ब्याह हुआ है। अभी अभी बस जुआ छुआ है/घर घरनी परिवार है आँखों के आगे।उनकी एक कविता में फेरू की कहानी है। वह ठाकुर साहब के यहाँ काम करता है। ठकुराइन काशीवास करके लौटी हैं - फेरू अमरेथू रहता है/वह कहार है .../कहा उन्होंने मैंने काशीवास किया है/काशी बड़ी भली नगरी है/वहाँ पवित्र लोग रहते हैं/फेरू भी सुनता रहता है।’ दलित विमर्श की इतनी मार्मिक और इतनी कम बोलने वाली कविता भी आज के शोर शराबे वाली दलित रचनाओं में ढूँढनी पड़ेगीमिल सकेगीऐसा लगता नहीं। उनकी एक और कविता प्रेरणा’ (तुम्हें सौंपता हूँ) ऊपर कहे सब कुछ को उभार देती है - मेरी कविता कल मुसहर के यहाँ गई थी/मैं भी उसके साथ गया था जो कुछ देखा/लिखा हुआ है मेरे मन में जब घर लौटा/तब मुझसे नाराज हुए जो बड़े लोग थे/उनकी वह नाराज़ी मैं चुपचाप पी गया/वे समझे मैं समझदार हूँ इसी राह से/चला करूँगा जिस पर सब चलते आए हैं/पर मुझको उसकी कुटिया ने और बुलाया/पाँव दबा कर अबकी उसके यहाँ मैं गया/टीहुर की बातें कानों पी असी साल का/जाड़ा बरखा घाम खा चुकी थी वह वाणी/अब केवल साँसें थीं अब केवल वाणी थी। अब केवल वह कुटिया थी जिसमें बैठा था।’ टीहुर की जाड़ा बरखा घाम खा चुकी अनुभवी वाणी ही त्रिलोचन की कविताओं का सरमाया है। फेरूटीहुर या घीसूगोबर त्रिलोचन से यह मासूम-सा सवाल भी करते हैं कि घर में कविताएँ/क्या कभी काम आती हैं/क्या इनसे दाल छौंक सकते हैं/हल्दी का काम/क्या इनसे चल सकता है।’ और त्रिलोचन का उन्हें जवाब मिलता है कि - मैंने तो व्रत ले रखा है तुम सब के लिएमिट्टी के पुतलों में दिव्य अभिमान भरने का और थोड़े संकल्प भी किए हैं - चाहता हूँ तुम भी इन्हें शपथप्रण और व्रत की तरह अपने जीवन भर धारे रहो - जो उठाई है ध्वजा झुकने न देना/जो दिखाई है प्रगति रुकने न देना/जो जगाई शक्ति है लुकने न देना/जो लगाई लौ कभी चुकने न देना।

त्रिलोचन जैसा पर दुख कातर और जन उपकारी कवि ही यह कह सकता था कि यही विनय मेरी हैमुझे याद मत रखना/अपने किए सँजोए का संचित फल चखना।’ कवि त्रिलोचन तुम्हें जानने मानने वाले हम सब अपने कर्मों से बँधे अपनी-अपनी डगर चल रहे हैं। तुम्हारी कविताओं ने हमें जीने का सहूर सिखाया है। पर क्षमा मिले गुरुतुम्हें याद न रखने वाली तुम्हारी बात हम न मान सकेंगे। तुम शरीर से पास हो न होतुम्हारा काव्य तुम्हारी ही तो छवि है। तुम्हें याद रखने को वो ही बहुत है उस जमीनी काव्य की भलमानस बनावट को कैसे भूल सकेगा कोई। तुम तो कह कर चल दिए। पर एक बात कह दें तुमसेचाहे तो इसे अवहेलना ही समझोतुम क्यों न अपनी कि 
इन दिनों तुम बहुत याद आये,/
जैसे धुन राग के बाद आये।’;