शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2021

महात्मा गांधी का भाषा चिंतन



 महात्मा गांधी का भाषा चिंतन

- प्रो. दिलीप सिंह
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गांधी और भाषा

यह बात कहने की नहीं है कि गांधी जी कोई भाषा वैज्ञानिक नहीं थे। लेकिन कहने की बात यह जरूर है कि वे अपने समय के भारत के भाषाई यथार्थ को जाँच-परख चुके थे – गहराई के साथ। उनके भाषाई चिंतन की पृष्ठभूमि में ये यथार्थ ही अनुभूत रूप में व्यक्त मिलते हैं। गांधी जी सत्य के आग्रही थे, अतः भाषा के प्रश्न को भी वे सत्यबल के साथ हल करने को दृढ़ संकल्प थे। यह ध्यान दें तो अचरज होता है कि गांधी जी के समय का कोई नेता हमें ‘भाषा’ के प्रश्न को इतने व्यापक धरातल पर व्याख्यायित करता या जीवन पर्यंत इनसे जूझता नहीं मिलता। वे भारतीय भाषाओं के लिए लड़े–भिड़े भी और अपने भाषा- दर्शन को सीधे–सच्चे ढंग से देश की जनता तक पहुँचाया भी। लिखकर, और अधिकतर अपने भाषणों के माध्यम से। इन पर दृष्टियात करें तो इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता कि उनकी भाषा–दृष्टि अत्यंत व्यापक थी। दो तरह से, एक तो वे भारतीय भाषाओं को उनका उचित देय दिलाने को दृढ़ प्रतिज्ञ थे और दूसरा कि भाषा के माध्यम से वे भावात्मक, सांस्कृतिक और भाषाई एकता का प्रयास इस तरह से कर रहे थे जो स्वतन्त्रता संग्राम का हिस्सा बन सके। संक्षेप में कहा जाय तो भारत की आत्मा (भाषाई अस्मिता) और भाषाई यथार्थ (बहुभाषिकता-बहुसांस्कृतिकता) की गांधी को स्पष्ट पहचान थी। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो गांधी एक सजग समाज भाषा विज्ञानी सिद्ध होते हैं। आगे यह प्रतिपादन स्वतः प्रमाणित होता जाएगा।

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गांधी का समय और भारतीय भाषा-परिदृश्य

भारत आने के बाद ही (1915) अपनी भारत-यात्रा के दौरान गांधी जी को यह भान हो गया था कि ब्रिटिश शासन अपने समस्त अलगाववादी अस्त्र –शस्त्रों के साथ भारतीय भाषाओं और उनकी अस्मिता के सभी तत्वों को कुचलने के षणयंत्र में लिप्त है। वे भलीभाँति समझ चुके थे कि ब्रिटिश शासन अँग्रेजी भाषा और संस्कृति के वर्चस्व को बढ़ाने की फिक्र में भाषाई धोखाधड़ी तक पर उतर आया है। बहुभाषिक भारत में ‘शिक्षा में भाषा’ के प्रश्न को भारतीय भाषाओं से जोड़ने के बजाय अँग्रेज नीति – नियंताओं ने अँग्रेजी भाषा के दबाव को ‘शिक्षा’ का लक्ष्य निर्धारित करके भारतीय संस्कृति तथा भारतीय भाषाओं को उपयोगी व्यवहार क्षेत्रों (डोमेन्स) में पीछे धकेलने की कसम खा ली थी। इतना ही नहीं भारतीय भाषाओं को देसी और गँवारू (वर्नाकुलर) सिद्ध करने की निंदनीय पहलें भी शुरू हो चुकी थीं। भाषा – अध्ययन के ऐसे –ऐसे पीठ और भाषाविद (?) ब्रिटिश शासन के दुष्चक्रों को साकार करने के लिए खड़े किए गए जो भारत की ‘सामासिक संस्कृति’ से रची- बसी फुलवारी को एक वीराने में तब्दील करने के प्रयास में प्राणप्रण से जुट गए थे। भारत में भाषा – संघर्ष (लैंग्वेज कांफ्लिक्ट) ही भाषाई यथार्थ है, इस तरह के भ्रामक भाषा वैज्ञानिक शोधपत्रों, पुस्तकों और सर्वेक्षण रपटों का अंबार लगा दिया गया था। इस तरह के मिथ्या प्रचारों में आर्य- द्रविड़ भाषाओं, हिन्दी और उसकी बोलियों, सीमावर्ती भाषाओं (बार्डर लैंग्वेजेज़) तथा हिन्दी – उर्दू पर न जाने कितने गलत भाषा वैज्ञानिक निष्कर्ष देकर इनके बीच वैमनस्य फैलाने की कोशिशें की जा रही थीं। सच, भारतीय भाषाओं और हिन्दी भाषा के लिए यह एक बहुत कठिन समय था। ऐसे माहौल में गांधी भारतीय भाषाओं के लिए ढाल बनकर आ खड़े हुए।

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दूरद्रष्टा गांधी

गांधी दूरद्रष्टा थे। वे भारत की सभी समस्याओं को जनसंदर्भ में देखने वाले मनीषी थे। अतः भारतीय भाषाओं पर किए जा रहे इस अनाचार को उन्होंने गहराई से पहचाना। वे अपने भाषाचिंतन में बार–बार यह संकेत देते हैं कि भाषा के टूटने का अर्थ है समाज और संस्कृति की टूटन। गांधी जी यह समझते थे कि भाषा में जोड़ने और तोड़ने की दोनों शक्तियाँ निहित होती हैं। वे समझ चुके थे कि ब्रिटिश शासन भारतीय भाषाओं का इस्तेमाल समाज और संस्कृति को तोड़ने के लिए करने पर आमादा है। ऐसे में वे भाषा द्वारा देश को जोड़ने का संकल्प लेकर आगे आए। गांधी का सपना संगठित राष्ट्र का सपना था। अपने इस सपने को साकार करने के लिए उन्होंने अन्य कई अवरोधों के साथ-साथ उन भाषाई अवरोधों को भी तोड़ने का प्रयास किया जिनकी पालपोस ब्रिटिश सरकार कर रही थी। इस मार्ग पर वे स्वयं चले और असंख्य भारतवासियों को भी इस पर चलने के लिए प्रेरित किया। गांधी जी की इसी भाषाई चेतना ने ‘राष्ट्रभाषा आंदोलन’ की नींव रखी, जिसका एकमात्र लक्ष्य था – राष्ट्रीय एकता की स्थापना।

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राष्ट्रभाषा हिंदी का गांधीवादी यथार्थ

भारतीय भाषाओं के निरंतर क्षरण और अपमान से गांधी जी क्षुब्ध थे। एकता, सहभाव और मेलजोल से निर्मित भारत का भाषाई यथार्थ उन्हें दरकता हुआ दिखाई पड़ने लगा था। भारतीय भाषा परिदृश्य में वे हिंदी भाषा के महत्व को जान चुके थे। एक अखिल भारतीय संपर्क भाषा (पैन इंडियन लिंक लैंग्वेज) के रूप में उसकी ‘जोड़ने वाली’ शक्ति को परख चुके थे। गांधी जी की दृष्टि में राष्ट्रभाषा हिंदी का यथार्थ पाँच मूलभूत क्षमताओं (कांपिटेंस) से आबद्ध था – भारत की प्रमुख संपर्क भाषा के रूप में, सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति की समन्वयक भाषा के रूप में, भारतीय साहित्य के उत्थान एवं आदान–प्रदान के लिए जोड़ भाषा के रूप में, एक वैज्ञानिक भाषा के रूप में तथा देश को एकजुट रखने वाली राष्ट्रभाषा के रूप में। हिंदी भाषा की इन क्षमताओं पर गांधी जी बोलते रहे, लिखते रहे और राष्ट्रभाषा आंदोलन को दिशा देने के लिए अपनी ‘भाषा नीति’ बनाते रहे। अपनी इसी नीति के चलते उन्होंने हिंदी भाषा के प्रचार–प्रसार को स्वतन्त्रता संग्राम का एक अस्त्र बनाया और अपने रचनात्मक कार्यक्रम में खादी के साथ हिंदी को एक महत्वपूर्ण स्थान दिया। कहना न होगा कि ये दोनों प्रतीक गांधी के सामने ही स्वावलंबन और स्वभाषा अस्मिता का पर्याय बन गए थे।

गांधी जी एक राष्ट्र के लिए एक राष्ट्रभाषा के हिमायती थे। उन्हीं के शब्दों में – ‘समूचे हिंदुस्तान के साथ व्यवहार करने के लिए हमको हमारी भाषाओं में से एक ऐसी जबान की जरूरत है जिसे अधिक से अधिक संख्या में लोग जानते और बोलते हैं और जो सीखने में सुगम हो। इसमें शक नहीं कि हिंदी ही ऐसी भाषा है’। गांधी जी के इस विचार में हिंदी भाषा की वकालत उसमें निहित ‘व्यापक व्यवहार की भाषा’ तथा ‘सुगम भाषा’ के गुणों के कारण की गई है। जिसे आगे चलकर उन्होंने राष्ट्रभाषा की संज्ञा दी और जिसके प्रचार–प्रसार के लिए पूरे भारत में, विशेष रूप से दक्षिण भारत में ऐसी अलख जगाई कि राष्ट्रीय एवं भावात्मक एकता की बयार बह चली। ‘राष्ट्रभाषा हिंदी’ के संदर्भ में उन्हीं का एक उद्धरण देखें – ‘अगर हिंदुस्तान को एक राष्ट्र बनाना है तो चाहे कोई माने या न माने, राष्ट्रभाषा हिंदी ही बन सकती है क्योकि हिंदी को जो स्थान प्राप्त है वह किसी दूसरी भाषा को नहीं मिल सकता। अगर स्वराज करोड़ों निरक्षरों का, दलितों और अंत्यजों का हो और हम सब के लिए हो तो हिंदी ही एकमात्र राष्ट्रभाषा हो सकती है’। यहाँ यह देखने की बात है कि गांधी जी ‘राष्ट्र भाषा’ के प्रश्न को भावावेश में नहीं उठा रहे हैं। एक यथार्थ भाषा परिदृश्य सदैव उनके समक्ष है। यहाँ भी वे हिंदी की व्याप्ति को अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में तरजीह दे रहे हैं। ‘हिंदी को जो स्थान प्राप्त है’ वाक्य स्पष्टत: हिंदी की अखिल भारतीय व्याप्ति तथा राष्ट्रीय एकीकरण की उसकी शक्ति की ओर इशारा कर रहा है। इस उद्धरण के दूसरे भाग में वे यह भी कह रहे है कि जो भाषा अभिजन की आकांक्षाओं का साथ दे वही स्वराज के सपने को साकार कर सकती है।

हिंदी भाषा के माध्यम से ‘राष्ट्रीय एकता’ के लक्ष्य की पूर्ति गांधी की ‘राष्ट्रभाषा’ का एक खास पहलू था। वे जानते थे कि एक राष्ट्रभाषा के बिना इस लक्ष्य की प्राप्ति नहीं की जा सकती थी। उन्होंने बार-बार यह उद्घोषणा की कि – भारत को एकता की कड़ी में जोड़ने के लिए हिंदी ही उपयोगी भाषा है। वे पूरे भारत में ‘एकता की भाषा’ के रूप में हिंदी को स्थापित करना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार–प्रसार का बीड़ा उठाया जिसकी भूमिका वे अपने प्रसिद्ध ‘इंदौर भाषण’(19 मार्च,1918) में बना चुके थे। इसी वर्ष उन्होंने दक्षिण भारत में हिंदी की एक संस्था स्थापित कर दी – दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास और 18 वर्षीय अपने पुत्र देवदास गांधी को इस कार्य के लिए मद्रास (अब चेन्नई) भेज दिया। इस संस्था का मूल वाक्य है – ‘एक राष्ट्रभाषा हिंदी हो, एक हृदय हो भारत जननी’। यह वास्तव में गांधी जी के ‘राष्ट्रभाषा’ संबंधी चिंतन से सिंचा वाक्य है। गांधी जी स्वयं इस संस्था के आजीवन अध्यक्ष रहे।

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गांधी और ‘हिंदुस्तानी’

हिंदी भाषा की ‘सुगमता’ की बात गांधी जी बहुत सोच–समझ कर कर रहे थे। वे हिंदी भाषा की सुबोधता और संप्रेषणीयता के हामी हैं, यह बात वे कई तरह से कहते चले आ रहे थे। संभवतः इसीलिए कहीं-कहीं उन्होंने राष्ट्रभाषा के लिए ‘हिंदुस्तानी’ शब्द का भी प्रयोग किया है। ‘हिंदुस्तानी’ भारत में प्रचलित बोलचाल की हिंदी का मूल रूप है जिसे आधार बनाकर अँग्रेजी शासन ने बोझिल उर्दू (हाई उर्दू) और संस्कृतनिष्ठ हिंदी (हाई हिंदी) जैसे कृतिम भाषा रूप गढ़ कर हिंदी को हिंदुओं की और उर्दू को मुसलमानों की भाषा कहकर एक सांप्रदायिक रंग दे दिया था। गांधी जी अंग्रेजों के इस षणयंत्र को समझ रहे थे। इसीलिए वे ज़ोर देकर कह रहे थे कि राष्ट्रभाषा के रूप में वे जिस संपर्क भाषा हिंदी की बात कर रहे हैं, यह वही भाषा रूप है जिसका प्रयोग भारत की आम जनता करती है और जिसे देश के हिंदू और मुसलमान दोनों बोलते समझते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ‘हिंदुस्तानी’ ही जनभाषा के रूप में भारत के एक बड़े हिस्से में मौखिक संप्रेषण व्यापार की भाषा है। गांधी के इस मंतव्य को उनकी पुस्तिका ‘राष्ट्रभाषा हिंदुस्तानी’ (1947) के भीतरी आवरण पर अंकित इस अनुच्छेद से भलीभाँति समझा जा सकता है – ‘हिंदुस्तानी का मतलब उर्दू नहीं, बल्कि हिंदी और उर्दू की वह खूबसूरत मिलावट है जिसे उत्तरी हिंदुस्तान के लोग समझ सकें और नागरी या उर्दू लिपि में लिखी जा सकती हो। यह पूरी राष्ट्रभाषा है, बाकी अधूरी’। हिंदी–उर्दू के बीच अलगाव पैदा करके हिंदू और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक विद्वेष पैदा करने वाली दूषित ब्रिटिश प्रवृत्ति से गांधी जी को आत्मिक कष्ट हुआ था। इस प्रवृत्ति से टकराने के लिए ही उन्होंने ‘हिंदुस्तानी आंदोलन’ खड़ा किया। भाषा के प्रश्न पर गांधी जी को दो स्तर पर जूझना पड़ रहा था – एक ओर राष्ट्रीय एकता के लिए और दूसरी ओर सांप्रदायिक सद्भाव के लिए। हिंदुस्तानी’ के पक्ष में वे यहाँ तक कह चुके थे कि – उत्तर भारत में मुसलमान और हिंदू दोनों एक ही भाषा बोलते हैं (और वह है हिंदुस्तानी –लें)। गांधी जी के लिए हिंदुस्तानी का तात्पर्य उस आम मौखिक परंपरा वाली हिंदी से था जिसमें भाषा–अवमिश्रण के, आदान–प्रदान के और मेलजोल के बीज विद्मान थे, अर्थात जो सदियों से भारत की समन्वित एकात्मकता का माध्यम थी जिसे ‘भाषा–इतिहास’ में कभी हिंदी, कभी हिंदुई तो कभी हिंदी,रेख्ता या खड़ी बोली और उर्दू के नाम से अभिहित पाते हैं।

वे भलीभाँति यह जानते थे और उन्होंने कहा भी कि ‘अंतर पढ़े-लिखे लोगों ने पैदा किया है’। अपने इस कथन की व्याख्या करते हुए उन्होंने लिखा कि – ‘इसका अर्थ यह है कि हिंदू शिक्षित वर्ग ने हिंदी को केवल संस्कृतमय बना दिया है। इस कारण कितने ही मुसलमान उसे समझ नहीं सकते। लखनऊ के मुसलमान भाइयों ने उर्दू में फारसी भर दी है और हिंदुओं के समझने के अयोग्य बना दिया है। यह दोनों केवल पंडिताऊ भाषाएँ हैं और इनको जनसाधारण में कोई स्थान प्राप्त नहीं है। यहाँ इस बात की ओर भी ध्यान दें कि खड़ी बोली में जो जन सहभागिता है, रेख्ता में जो मेलजोल का भाव है, या हिंदी में जो जन समान्य की भाषा का रूपांतर है,वह सब गांधी की ‘हिंदुस्तानी’ के भीतर आ सिमटा है।

यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि ‘खड़ी बोली’ मुसलमानों के भारत आने के बहुत पहले से यहाँ मौजूद थी। यही खड़ी बोली (हिंदी) उर्दू का भी मूलाधार बनी। पं. अंबिका प्रसाद वाजपेयी ने अपनी पुस्तक ‘हिंदी पर फारसी का प्रभाव’(संवत 2016) में वली मौलवी वहीउद्दीन साहब ‘सलीम’ का यह उद्धरण दिया है – ‘हिंदी को हम अपनी जबान के लिए अमल्लुनिसान (भाषा की जननी) और मूलायअव्वल (मूलतल) कह सकते हैं। उसके बगैर हमारी जबान की कोई हस्ती नहीं है’। गांधी जी हिंदी–उर्दू के इसी मूल तत्व की गवाह ‘हिंदुस्तानी’ के पक्ष में खड़े हुए थे।

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हिंदी–उर्दू की तकरार और गांधी

पर क्या कहें अंग्रेजों की भाषा नीति को, जो सांप्रदायिक भाषावाद फैलाने में लिप्त थी। हिंदी – उर्दू के बीच विभाजन रेखा खींचकर इनके बीच की खाई को गहरा करने में जुटी थी। वे कहते भी हैं, और बार–बार इस बात को दोहराते भी हैं कि – हिंदी और उर्दू दोनों भाषाएँ दो भिन्न भाषाएँ नहीं हैं। इसीलिए वे कृत्रिम हिंदी और कृत्रिम उर्दू के पैरोकारों के सामने ‘हिंदुस्तानी’ का परचम लेकर डटकर खड़े हुए। यहाँ अंग्रेजों ने एक और चाल चली, उन्होंने ‘हिंदुस्तानी’ को उर्दू का पर्याय सिद्ध करने का षणयंत्र शुरू कर दिया। उनके पिट्ठू वैयाकरण ‘हिंदुस्तानी व्याकरण’ के नाम पर ‘उर्दू का व्याकरण’ लिखने में लग गए। गांधी जी यह भी देख रहे थे। वे उर्दू –हिंदी के बीच के बढ़ते विभेद से अचरज में थे। पर वे हारे नहीं। इसका समाधान उन्होंने अपनी ज़िंदगी में ही ढूंढा। तर्क दिए, बहसें कीं,समझावन की, विरोध सहे। यह सब गांधी चिंतन में लिपिबद्ध है। अंतत: वे अपनी बात कहते–कहते ही चले गए। गांधी के चले जाने के बाद हिंदी–उर्दू के उलझे प्रश्न को सुलझाने के यत्न कई भाषाविदों ने जारी रखे जिनमें धीरेन्द्र वर्मा, किशोरी दास वाजपेयी, रामविलास शर्मा, रवीन्द्र नाथ श्रीवास्तव, अशोक केलकर और पं. विद्यानिवास मिश्र का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है।

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लिपि का प्रश्न और गांधी

हिंदी–उर्दू के बढ़ते विभेद से गांधी जी खिन्न थे। एक जगह तो उन्होंने यह भी कह दिया है कि – ‘हम हिंदी – उर्दू के झगड़े में पड़कर अपना बल क्षीण नहीं करेंगे। लिपि की कुछ तकलीफ जरूर है। राष्ट्र में दोनों को स्थान मिलना चाहिए। इसमें कुछ कठिनाई नहीं है। अंत में जिस लिपि में ज्यादा सरलता होगी, उसकी विजय होगी’। यहाँ ध्यान दें कि हिंदी – उर्दू अस्मिता का प्रश्न लिपि की अस्मिता का प्रश्न भी बन गया था। हिंदू–मुसलमान एक होकर रहें इसलिए उन्होंने दोनों लिपियों में ‘हिंदुस्तानी’ लिखने की बात कहीं थी। गांधी जी समन्वय की भाषा, सम्प्रेषण की उस मौखिक भाषा ‘हिंदुस्तानी’ को राष्ट्रभाषा के पद पर आसीन करने की जद्दोजहद कर रहे थे और समस्या आ खड़ी हुई लिखी जाने वाली भाषा के लिपि चयन की, (अर्थात वही कृत्रिम हिंदी, कृत्रिम उर्दू को लिखे जाने की)। गांधी जी के सपने टूटने के कगार पर थे। भाषा को लिखने का माध्यम ‘भाषाई अस्मिता’ का प्रश्न बना दिया गया था। इसीलिए लिपि के प्रश्न को ‘परेशानी का कारण’ मानते हुए उन्होंने दोनों लिपियों के प्रयोग की स्वीकृति दी थी। इस स्वीकृति के लिए उन्हें घोर विरोध का भी सामना करना पड़ा – यह सब लिखित रूप में दर्ज है। गांधी की यह दृढ़ मान्यता थी कि इस प्रकार के लेखन से उच्च हिंदी या उच्च उर्दू को बढ़ावा नहीं मिलेगा। पं. विद्यानिवास मिश्र ने कहीं यह व्यंग किया था कि ‘उर्दू के धनी–धौरी नागरी लिपि से लाभ तो लेना चाहते हैं, पर अलग लिपि के बिना उन्हें अपना अस्तित्व प्रमाणित नजर नहीं आता’। गांधी के सामने भी कुछ ऐसा ही प्रश्न खड़ा था जहाँ एक संप्रदाय अपनी लिपि की मान्यता का अनावश्यक आग्रह कर रहा था,जिस पर गांधी को समझौते का मार्ग भी अपनाना पड़ा और जिससे वे विलग हुए अपनी मृत्यु के ठीक पाँच दिन पहले ‘हरिजन सेवक’ (25 मार्च, 1948) में यह लिखकर कि ‘ नागरी और उर्दू लिपि के बीच में जीत नागरी की होगी’।अपने अंतिम दिनों तक गांधी जी भाषा के माध्यम से राष्ट्रीय एकता एवं सांप्रदायिक सद्भाव के लिए लड़ते रहे। देश–विभाजन ने उनके भाषाई–सौहार्द्र के सपने को चकनाचूर कर दिया था। गांधी का भाषा चिंतन राष्ट्र निर्माण के सपने से संबद्ध था। उन्होंने ‘सच’ के बल पर अपनी बातें कहीं। संपर्क भाषा, राष्ट्रभाषा, शिक्षा में भाषा, स्वभाषा गौरव पर विचार किया। राष्ट्रभाषा हिंदी और हिंदुस्तानी के प्रचार–प्रसार के लिए प्राणप्रण से जुटे। भारतीय भाषाओं और उनके साहित्य को भरपूर मान दिया।

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गांधी के भाषा चिंतन के आयाम

गांधी जी ने जीवन भर हिन्दी में बोलने का प्रण ले रखा था। अपनी विनम्रता के चलते वे यह कहते रहे थे कि ‘मेरी हिन्दी अच्छी नहीं है’ या यह भी कि ‘मैं भारत कि भाषाओं को बोलने वालों के मन की बहुत अच्छे से नहीं जनता’ पर वे दोनों ही को खूब जानते-पचानते थे। उनकी खुद की हिन्दी सरल संप्रेषणीय और मर्मभेदी हिन्दी का ऐसा वाजिब पाठ है जिसने भारत के जनसमूह (चाहे वे किसी प्रांत के हों) की आत्मा को झकझोर कर रख दिया था। दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा वे आते रहते थे। मेरे चेन्नई प्रवास के दस वर्षो में कई बुजुर्ग हिन्दी सेवियों ने अलग-अलग शब्दों में यह बताया था कि अपनी प्रार्थना समाओं में गांधी जी हिन्दी में अधिक से अधिक दस वाक्य बोलते थे जो श्रोताओं पर सीधी चोट करते थे। उनकी बोली-गई हिन्दी के रिकार्ड सुन कर या उनकी लिखी हिन्दी पढ़ कर ‘भाषा की सरलता’ से उनका क्या तात्पर्य था, इसका पता चल जाता है।

गांधी जी अंग्रेजी भाषा को अतिरिक्त महत्व देने के सख्त खिलाफ थे। बनारस में (1916) जब उनका स्वागत अंग्रेजी मे किया गया तो उन्होंने खूब फटकारा और यहाँ तक कह दिया कि ‘हिन्दी भाषी प्रांतो में अंगेजी ज्यादा झाड़ते हैं और अंग्रेजी कि गुलामी में प्रसन्न हैं’। शिक्षा के क्षेत्र में अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व को उन्होंने चुनौती दी। गांधी जी का मानना था कि शिक्षा का संदर्भ राष्ट्र की प्रकृति के अनुरूप होना चाहिए जब कि ब्रिटिश शासन द्वारा निर्धारित शिक्षा के आधार भूत सिद्धांत राष्ट्र विरोधी थे। गांधी जी ने अंग्रेजी शिक्षा का विरोध करते हुए कड़े शब्दो में यह कहा था कि – ‘करोड़ो लोगो को अंग्रेजी कि शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है’। अंग्रेजी पोषित भारतीय शिक्षा-पद्धति को गांधी जी भारत को गुलाम बनाए रखने की सजिश मानते थे –‘मैकाले ने शिक्षा की जो बुनियाद डाली, वह सचमुच गुलामी की बुनियाद थी’। भारतीयों के अंग्रेजी मोह की भी उन्होंने कस कर भर्त्सना की। कांग्रेस की सभाओं में लोगो को अंग्रेजी में अपनी बात कहते हुए सुनकर उन्होंने कहा था कि –‘यह कितने दुख की बात हैं कि हम स्वराज की बात भी पराई भाषा में करते हैं’। काशी में (1916) नागरी प्रचारिणी सभा के सम्मेलन में उन्होंने वकीलों और छात्रों से अंग्रेजी का प्रयोग छोड़ कर हिन्दी का व्यवहार करने की अपील की थी। 1916 मे ही स्वभाषा: स्वराज विषय पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के अपने ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने खुलकर कह दिया था कि – ‘विदेशी भाषा में बोलना स्वदेश में अप्रतिष्ठा और अपमान की बात है’। गांधी जी कि दृष्टि में अंग्रेजी बनाम भारतीय भाषाओं का परिदृश्य एकदम स्पष्ट था। उनका दृढ़ विश्वास था कि भारतीय भाषाओं की निकटता, चाहे वह भाषाई हो या सांस्कृतिक, जिस तरह की है, वहाँ तक अंग्रेजी भाषा की पहुँच हो ही नहीं सकती।

भारत में भाषाओं के सहअस्तित्व को वे भारत की सबसे बड़ी शक्ति मानते थे। समाज, भाषा और संस्कृति के अंतस्संबंधों की उन्होंने सटीक ढंग से विवेचना की है। गांधी जी का जीवन से गहरा संबंध था। वे भारतीय लोक और उसकी आकांक्षाओं को नजदीक से जांच-परख चुके थे। इसीलिए भाषा को उन्होंने जीवन और समाज के सामने रख कर देखा। एक समाजचेता भाषाचिंतक की तरह।

संभवत: इसीलिए भारतीय भाषा यथार्थ के मूल तक गांधी की सजह पहुँच थी। इतनी सहज कि उनकी वाणी ने साहित्यकारों को आंदोलित कर सृजनात्मक लेखन में ‘हिंदुस्तानी’ के प्रवाह को समोने के लिए प्रेरित कर दिया। हिन्दी में प्रेमचंद इसके शीर्ष प्रवक्ता बने।

संक्षेप में कहा जाय तो गांधी का भाषा-चिंतन उनके अपने व्यावहारिक अनुभवों के मंथन का परिणाम है। उनके इस चिंतन में तत्कालीन भारत का वर्तमान और ‘हिन्द स्वराज’ वाले भविष्य का परस्पर द्वन्द मुखरित है। भाषा पर बात शुरू करते ही उनके समक्ष पूरा राष्ट्र और उसके लोग खड़े हो जाते थे। वो लोग जो अपने दैनिक व्यवहार में आमफहम हिंदुस्तानी बोलते थे और वे भी जो हिन्दी का प्रयोग संपर्क भाषा (लिंक लैंग्वेज) या व्यापक संप्रेषण की भाषा (लैंग्वेज फार वाइडर कम्युनिकेशन) के रूप में भारत के हर प्रांत में कर रहे थे। गांधी जी का विरोध भी हुआ। उनसे कई प्रश्न भी पूछे गए। बहसें की गईं। उधर ब्रिटिश शासन भारतीय बहुभाषिक यथार्थ को वैमनस्य और संघर्ष में बदल डालने पर आमादा था। पर गांधी जी अपनी राह चलते रहे। भाषा पर किसी राजनेता की गांधी जी जैसे गहरी संलग्नता उनके समय के और आज के भी किसी नेता में दिखाई नहीं देती। इस मामले में गांधी जी अपनी मिसाल आप हैं। उनके भाषा संबंधी विचारो के पीछे भारत का भाषिक यथार्थ मुखरित है अत: इनका बारंबार विवेचन करने की जरूरत आज भी है और आगे भी हमेशा पड़ती रहेगी।

निदेशक
लुप्तप्राय भाषा केंद्र
इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक (म॰प्र॰)
मो॰ 8989105802

शनिवार, 28 जून 2014

लाल रेखा - कहाँ कहाँ से गुजर गया

किताबों के बहाने - 8                                                 प्रो. दिलीप सिंह 

लाल रेखा/ कुशवाहाकान्त/
चिंगारी प्रकाशन/ वाराणसी/
प्रकाशन वर्ष - 1954/ मूल्य - 3रु.

रविवार, 25 मई 2014

तेलुगु साहित्य - कहाँ कहाँ से गुजर गया

किताबों के बहाने - 7
प्रो. दिलीप सिंह 

लफ्टंट पिगसन की डायरी - कहाँ कहाँ से गुजर गया

किताबों के बहाने - 6 
- प्रो. दिलीप सिंह 


मेरे प्रिय सब चले गए


- प्रो. दिलीप सिंह



बीज भाषण : 29 मार्च 2014 : बेलगाम संगोष्ठी

मेरे प्रिय सब चले गए
- प्रो. दिलीप सिंह 

हिंदी साहित्य के लिए साल 2013 और 2014 के आरंभिक दो महीने बहुत ही मनहूस, दुखदायी और नुकसानदेह साबित हुए हैं. 

इन चौदह महीनों में हिंदी भाषा और साहित्य के कई नक्षत्र बुझ गए. ये वे नक्षत्र थे जिन्होंने अपने पाठकों को नई राह दिखाई, बहुत कुछ समझाया और दृष्टि संपन्न किया. 

विजयदान देथा गए : राजस्थानी लोक कथाओं को हिंदी में लाकर जिन्होंने हिंदी की लोकभूमि को देशव्यापी मान्यता दिलवाई. लोक कथाओं में छिपी मानवीय संवेदनाओं और समस्याओं की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया. मनुष्य की जिजीविषा, उसके संघर्षों और उसके सपनों को अभिव्यक्ति देने वाले सरल कथानक को पाठकों का मित्र बनाया. 

फिर के.पी.सक्सेना भी हमें छोड़ गए. लखनऊ में रहने वाले हास्य कथाकार. धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, मनोरमा आदि पत्र-पत्रिकाओं और हिंदी दैनिकों के माध्यम से वे आधे दशक तक पाठकों के कंठहार बने रहे. वे अपने पर भी हँस सकते थे. अपनी वृद्धावस्था और पोपले होते मुँह पर भी. मध्य वर्ग के पारिवारिक जीवन पर उन्होंने ‘मैं’ शैली में जैसी कथा यात्रा की है वह रोचक और शिक्षाप्रद है. के.पी. ने लखनऊ के निम्न मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज को हँस हँस कर रचा जिससे लखनऊ की तहज़ीब के दर्शन भी हमें हुए और उनकी दशा-दुर्दशा के भी. उनके ‘बड़े मियाँ’, ‘छोटे मियाँ’ और ‘नवाब मियाँ’ जैसे पात्रों ने मुस्लिम जीवन के अनेक पहलू हमारे समक्ष खोल डाले. के.पी. का साहित्य ‘अल्पसंख्यक’ समुदाय केंद्रित लेखन पर बात करने वालों के ध्यान में आना चाहिए. 

फिर डॉ. रघुवंश भी नहीं रहे – इलाहाबाद की नाक थे डॉ. साहब. हाथ से लाचार थे तो पैर से लिखने का अभ्यास कर लिया. अपनी तरह के काव्य आलोचक. केंद्रीय हिंदी संस्थान में व्याख्यान दिए जो ‘समसामयिक हिंदी कविता’ के शीर्षक से छपे. वे पहले साहित्य के गंभीर पाठक थे, फिर आलोचक. हिंदी में उनके जैसी आलोचना की परंपरा उन्हीं से शुरू होकर उन्हीं पर खत्म हो जाती है. 

और चले गए बाल साहित्य के शालीन प्रणेता श्रीप्रसाद जी. काशीवाशी. इतने सरल की सरलता भी शर्म कर जाए. शिशु गीत से लेकर बाल कविता, बाल कहानी से लेकर बाल नाटक तक उन्होंने लिखे - हम लोगों ने उन्हें बचपन में भी पढ़ा, जवानी में भी और बुढापे में भी. 

शैलेश मटियानी - ‘भोगे हुए यथार्थ’ को वाणी देने वाले कथाकार - भी इसी अवधि में हमारे बीच से चले गए. मटियानी जी का जीवन अत्यंत कठिन रहा था. उन्होंने मजदूरी की, चाय की दूकान में जूठे बर्तन धोए, बूचड़ की दूकान में गोश्त काटा और हमेशा एक ‘मजदूर’ का जीवन जिया. मार्क्सवाद के ‘सर्वहारा’ का जीवन उन्होंने खुद जी कर देखा, सहा पर इससे डरे-घबड़ाए बिना कलम उठा ली. उनकी कलम ‘कटु यथार्थ’ की अभिव्यंजना का हथियार बन गई. मटियानी जी ने अपने लेखन द्वारा हमें कठिन से कठिन जीवन जीने की, और जिंदगी की तल्खियों से लड़ने की कला सिखाई. उनके समीक्षात्मक आलेख भी साहित्यिक छद्म के सारे पर्दों को तार तार कर देने वाले रहे हैं. गरीबी की शान ही उनका जीवन था. 

अभी अभी गए हैं – अमरकांत. बलिया निवासी. ‘कहानी’ के संपादक. इलाहाबाद में लंबी साहित्य साधना. कस्बाई जीवन के पोर पोर से अमरकांत जी परिचित थे. उनकी कहानियाँ निम्न मध्यवर्ग और मध्यवर्ग के छोटे छोटे सुखों-दुखों-आकांक्षाओं का महाकाव्य हैं. वे लिखते नहीं थे – बोलते थे. अपने पहले ही उपन्यास ‘सूखा पत्ता’ से उन्होंने कथा-शिल्प का एक नया स्वरूप ही रच दिया. बलिया शहर इस उपन्यास का कथानायक है. 

ये चार रचनाकार जिनका पुण्य स्मरण करने आज हम यहाँ एकत्रित हैं, इसी विध्वंसक कालखंड में हमारे बीच से उठ गए. ये सब क्या उठे, इनके कामों पर मान करने वाला हिंदी का गौरवान्वित मस्तक पीड़ा से चकरा गया, संज्ञाशून्य हो गया. क्योंकि ये सभी अपनी तरह की अकेली ही नहीं, पथप्रदर्शक तथा अपने अपने क्षेत्र की प्रवर्तक प्रतिभाएँ थीं. 

गज़ब यह कि ये चारों मुझ से अति निकट या निकटता से आबद्ध थे. कैलाश चंद्र भाटिया मेरे पितृतुल्य थे. वे भी मुझे बेटे से कम नहीं समझते, मानते थे. मेरे आरंभिक अकादमिक रूप को संवारने में उनकी भूमिका भूले से नहीं भूलती. इतना संतोष अवश्य है कि उनके अवसान से दो महीने पहले अलीगढ़ में उन्हें देख आया था. हिंदी भाषा के वे हितचिंतक अध्येता थे. एक संपूर्ण हिंदी भाषाविद. 

परमानंद जी ने मुझे पाठक के रूप में भी सदा प्रेरित किया – चाहे उनका कवि रूप हो या आलोचक का. वे थोड़े समय ‘आलोचना’ के संपादक भी थे. उनकी कविता जीवन की तल्खी और कमीनगी को भी कमनीय बनाकर रखती है. पर संवेदना की सच्चाई उसके भीतर छिपी करुणा, आक्रोश अथवा संघर्ष के पाठ को काव्यात्मक ढंग से प्रकट कर ही देती है. परमानंद जी आलोचक भी विशिष्ट थे. उनकी निजता सिर्फ उनकी ही थी. नए कवियों को वे अपनी आलोचना के केंद्र में लाने में कभी भी पीछे नहीं हटे. हिंदी के पुरोधा रचनाकारों की आलोचना में भी उनकी आलोचना दृष्टि सदैव तटस्थ रही – ऊँचा उठाने या नीचे गिराने की प्रचलित आलोचना प्रणाली के लिए वे जीवनपर्यंत एक प्रतिरोध की भूमिका में खड़े रहे. उनकी आलोचना में काव्यभाषा के प्रति उनकी सजगता भी प्रकट होती रहती है. वे रूपवादी या शैलीवैज्ञानिक आलोचना के उस तरह कटु आलोचक नहीं थे जैसे कि उनके अन्य समकालीन आलोचक थे बल्कि उन्होंने अपनी तरह से शैलीवैज्ञानिक और रूपवादी आलोचना पद्धति को अपनी आलोचना में जगह दी. वे वास्तव में हिंदी आलोचना में ‘नई राहों के अन्वेषी’ आलोचक थे. 

राजेंद्र यादव का चले जाना एक धाकड़ और निडर व्यक्तित्व के अवसान जैसा है. उनका खुलापन, उनकी राजनैतिक चेतना, उनके सामाजिक सरोकार जगजाहिर हैं. अतिशयोक्ति को भी उन्होंने विमर्श का जरूरी हिस्सा बना दिया. साहित्य जगत में बखेड़े खड़े करके क्रमशः उन्हीं बखेड़ों को गंभीर विमर्श में बदल डालने की उनकी प्रतिभा बेजोड़ थी. वे किसी भी पाखंड को कभी न बख्शने की कसम खाकर आगे बढ़ने वाले रचनाकार और संपादक थे. समसामयिक भारत के खून में पल रहे पाखंड रूपी कैंसर को उन्होंने तेज नश्तर से कुरेदना शुरू किया तो हाहाकार मच गया. सबसे बड़ी बात यह कि उन्होंने ‘सच’ को ज़बान दी. सच के लिए जब वे झूठ से लड़ने निकले तो जानते थे कि इस लड़ाई में ‘ललकार’ अनिवार्य है. आलोचना, सभ्यता समीक्षा और सामाजिक सरोकारों पर ‘हंस’ के संपादकीय के माध्यम से ललकार की अनेक प्रोक्तियाँ राजेंद्र यादव ने रचीं. कई रूढ़ि बन गईं तो कई ने हिंदी लेखन और आलोचना की नई भाषा गढ़ने में मदद की. स्त्री, दलित और आदिवासी विमर्श की पहचान को शाश्वत बनाकर उन्होंने एक रास्ता दिखाया. कहीं कहीं यह रास्ता ठोकर देने वाला भी है. पर उनका लेखन इन ठोकरों से बच पाने का विवेक भी अपने पाठक में निरंतर विकसित करता रहता है. राजेंद्र यादव अपनी रचनाशीलता के आरंभ से ही अपने अन्य समकालीन कथाकारों से अनूठे थे. और जाते समय तक वे अपने इस अनूठेपन के नए नए साक्ष्य हमें देते रहे – कभी हमें शॉक देकर, कभी हमारे भीतर तिलमिलाहट भरकर तो कभी अपना मुरीद बनाकर. 

ओमप्रकाश वाल्मीकि ‘दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’ तैयार करके हमें देने वाले हिंदी के पहले और संभवतः आखिरी रचनाकार थे. उनकी आत्मकथा ने दलितों के प्रति चिंतन करने को हम सबको मजबूर कर दिया था. उनकी दलित कविताओं की संवेदना के भीतर दलित जीवन की छोटी छोटी चित्रावलियाँ एक विराट काव्यसत्य में जब बदलने लगती हैं तो कडुवाहट, आक्रोश, घृणा और शर्म तथा और भी न जाने कितने भाव सहृदय पाठक के मन को मथने लगते हैं. वाल्मीकि हिंदी में दलित साहित्य लेखन के प्रवर्तक ही नहीं, स्वयं हिंदी दलित साहित्य का एक आंदोलन बन चुके थे. उनके जाने से ऐसा लग रहा है मानो किसी नदी का प्रवाह कुछ समय के लिए ठहर गया हो.

आज इस समय हम हिंदी साहित्य और भाषा के एक सूने सूने परिवेश में खड़े हैं. इतना सूनापन शायद हम सबने पिछले पचास वर्षों में एक साथ इतने गहन रूप में कभी महसूस न किया था. हम आज इस सुनसान में खड़े होकर यह सोचने को विवश है कि अब आगे क्या होगा! ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ के संदेश पर मानो हमारा विश्वास डगमगा गया है. 

परमपिता परमात्मा इन सभी की आत्मा को शांति देने की हम सबकी, आज की इस संगोष्ठी के माध्यम से, प्रार्थाना को स्वीकार करे. अब इससे अधिक हम और कर भी क्या सकते हैं? सिवाय प्रार्थना और आयोजनों के! 

मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

(वीडियो) प्रो. कैलाश चंद्र भाटिया को प्रो. दिलीप सिंह की श्रद्धांजलि





डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया (1926/27-2013) हिंदी के प्रमुख आधुनिक भाषाचिंतक थे. 29-30 मार्च 2014 को उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के बेलगाम (कर्नाटक) केंद्र में आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का एक सत्र उनकी स्मृति को समर्पित था. इस सत्र में प्रो. ऋषभ देव शर्मा, प्रो. एम. वेंकटेश्वर, प्रो. हीरालाल बाछोतिया एवं प्रो. रामजन्म शर्मा ने संस्मरण और आलेख प्रस्तुत किए. अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ भाषाचिंतक प्रो. दिलीप सिंह ने अत्यंत भावपूर्ण वक्तव दिया और हिंदी जगत का ध्यान डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया के अप्रतिम योगदान की ओर आकृष्ट किया. प्रस्तुत है प्रो. दिलीप सिंह का अध्यक्षीय वक्तव्य.