डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया (1926/27-2013) हिंदी के प्रमुख आधुनिक भाषाचिंतक थे. 29-30 मार्च 2014 को उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के बेलगाम (कर्नाटक) केंद्र में आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का एक सत्र उनकी स्मृति को समर्पित था. इस सत्र में प्रो. ऋषभ देव शर्मा, प्रो. एम. वेंकटेश्वर, प्रो. हीरालाल बाछोतिया एवं प्रो. रामजन्म शर्मा ने संस्मरण और आलेख प्रस्तुत किए. अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ भाषाचिंतक प्रो. दिलीप सिंह ने अत्यंत भावपूर्ण वक्तव दिया और हिंदी जगत का ध्यान डॉ. कैलाशचंद्र भाटिया के अप्रतिम योगदान की ओर आकृष्ट किया. प्रस्तुत है प्रो. दिलीप सिंह का अध्यक्षीय वक्तव्य.
मंगलवार, 1 अप्रैल 2014
मंगलवार, 25 मार्च 2014
गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014
[व्याख्यान] 'सूं सां माणस गंध' पर प्रो. दिलीप सिंह
[व्याख्यान] 'सूं सां माणस गंध' पर प्रो. दिलीप सिंह
6/9/2013 को दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद में डॉ. ऋषभ देव शर्मा के छठे कविता-संग्रह ''सूं सां माणस गंध'' का लोकार्पण करते हुए दिया गया वरिष्ठ साहित्य-भाषा-चिंतक प्रो. दिलीप सिंह का अत्यंत सारगर्भित दो-टूक वक्तव्य.
मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014
शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2014
भारतीय अनुवाद परिषद का ‘नातालि पुरस्कार’ प्रो. दिलीप सिंह को
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| प्रो. दिलीप सिंह |
हैदराबाद, 15 फरवरी 2014.
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास के कुलसचिव एवं प्रमुख हिंदी भाषावैज्ञानिक प्रो. दिलीप सिंह को भारतीय अनुवाद परिषद, दिल्ली द्वारा अनुवाद के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य हेतु वर्ष 2014-15 का ‘नातालि पुरस्कार एवं सम्मान’ प्रदान किए जाने की घोषणा की गई है.
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास के कुलसचिव एवं प्रमुख हिंदी भाषावैज्ञानिक प्रो. दिलीप सिंह को भारतीय अनुवाद परिषद, दिल्ली द्वारा अनुवाद के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य हेतु वर्ष 2014-15 का ‘नातालि पुरस्कार एवं सम्मान’ प्रदान किए जाने की घोषणा की गई है.
परिषद के महासचिव डॉ. पूरनचंद टंडन से प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रति वर्ष अनुवाद सिद्धांत पर हिंदी भाषा में लिखित मौलिक पुस्तक के लिए दिया जाने वाला यह पुरस्कार एवं सम्मान प्रो. दिलीप सिंह को उनकी सद्यःप्रकाशित कृति ‘अनुवाद की व्यापक संकल्पना’ पर प्रदान किया जा रहा है. इसके अंतर्गत परिषद द्वारा निकट भविष्य में आयोजित एक भव्य समारोह में इक्कीस हजार रुपए की पुरस्कार राशि, शॉल, प्रशस्ति पत्र, सारस्वत प्रतिमा तथा सम्मान चिह्न प्रदान किए जाएँगे.
उल्लेखनीय है कि एक सुस्थापित स्वयंसेवी संस्था द्वारा प्रदान किए जाने वाले इस पुरस्कार का अपना एक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय महत्व है तथा प्रो. दिलीप सिंह को यह पुरस्कार एवं सम्मान जिस पुस्तक पर प्राप्त हो रहा है उसमें अनुवाद शास्त्र पर अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की पृष्ठभूमि में चिंतन करते हुए उन्होंने अनुवाद समीक्षा और मूल्यांकन के विविध व्यावहारिक प्रारूप प्रस्तुत किए हैं जिसे हिंदी अनुवाद चिंतन के क्षेत्र में उनका मौलिक योगदान माना जाता है.
मंगलवार, 28 जनवरी 2014
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