मंगलवार, 20 अगस्त 2013

धूप ने कविता लिखी है गुनगुनाने के लिए

ऋषभदेव शर्मा का कवि-कर्म :
तेवरी, तरकश, ताकि सनद रहे और देहरी 
पाठविश्लेषक प्रो. दिलीप सिंह और कवि प्रो. ऋषभदेव शर्मा 

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’ऋषभदेव जी’ इसी तरह मैं उन्हें पुकारता हूँ। मान और स्नेह, दोनों भाव इस संबोधन में निहित हैं। ’डॉक्टर शर्मा’ कहूँ तो मामला अति औपचारिक हो जाए और ’ऋषभ’ बुलाऊँ तो बदसलूकी लगेगी। वे मुझे ’डॉक्टर साहब’ या ’सर’ ही कहते हैं और आदर बड़े भाई जैसा देते हैं। पहली भेंट उनसे मद्रास में बरसों पहले हुई थी। एक बैठक थी। अटैची लिए सभा (दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा)  प्रांगण में घुसा ही था कि प्रो. भीमसेन ’निर्मल’ दिख गये। अटैची वहीं धर के हम दोनों डाकख़ाने वाले चबूतरे पर बैठ गए। बातें होने लगीं कि एक स्वस्थ-सुदर्शन-सा नवयुवक नमस्कार-नमस्कार करते हुए सामने आया। निर्मल जी ने परिचय कराया। मैं चलने को हुआ कि बिना किसी संकोच के युवक ने मेरी अटैची उठा ली और अतिथि-गृह के कमरे तक  पहुँचा दिया। उनकी इस सरलता ने मन मोह लिया। फिर वे हैदराबाद आ गए, मेरे साथ काम करने। और मेरे साथ आत्मीयता का इतिहास रचा।

छोटे कद, भारी शरीर और गौरवर्ण के ऋषभ जी ’देखनउक’ लगते हैं। फ़िट-फ़ाट रहते हैं – हर धजा उन पर फबती भी खूब है। हमारी तरफ़ देसी मेलों में मिट्टी का ’बबुआ’ मिलता है – बैठा हुआ, सुदर्शन, गोल-मटोल; ऋषभ जी को देखकर अजाने ही उसकी याद आती है। यह बबुआ बड़ा लोकप्रिय है। सभी उसे लेते हैं, अपने घर में सजाते हैं। उसे प्यार करते हैं। हैदराबाद के हिंदी जगत्‌ में ऋषभदेव जी अत्यंत लोकप्रिय हैं। सब उनका साथ चाहते हैं, और वे भी किसी को निराश नहीं करते।

शुरू शुरू में हैदराबाद आए तो कुछ अलग-अलग से रहे। सन्‌ 1997 ई. में मैंने हैदराबाद में प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव की स्मृति में एक संगोष्ठी आयोजित की। बड़ी संगोष्ठी थी, बड़े-बड़े लोग आए थे। तीन दिन की थका देने वाली गतिविधियाँ थीं। उसमें पीछे छिपकर चुपके-चुपके सब काम करते रहे। मैं भी गुपचुप उन्हें ’ऑबज़र्व’ करता रहा। फिर ’पूर्णकुंभ’ (दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा – आंध्र की मासिक पत्रिका। का रवींद्रनाथ श्रीवास्तव स्मृति अंक निकालने की योजना बनी। उनसे जम कर काम लिया और कहा कि आपका नाम सहायक संपादक के रूप में जाएगा। अभिभूत हो गए। फिर संयोग कि ’पूर्णकुंभ’ का संपादन मेरे जिम्मे आ गया। पाँच-छह साल हम दोनों ने मिलकर उसके लिए काम किया। कितने ही विशेषांक निकाले। हर अंक को जानदार बनाया। सच कहूँ, मैं तो निमित्त मात्र था। सारी मेहनत उनकी होती थी। यहाँ तक कि ’संपादकीय’ लिखने के लिए भी वे मेरे पीछे पठान की तरह पड़े रहते थे। कभी-कभी तो मुझे खाली देखते ही कागज़-क़लम लेकर हाज़िर हो जाते कि सर, लिखा दीजिए, प्रेस में जाना है। इसी तरह पीछे पड़-पड़ के उन्होंने मुझसे बहुत कुछ लिखवा लिया है। इस मामले में कई बार वे मेरे ’गणेश’ भी बने हैं। इसके लिए मेरा रोम-रोम उन्हें असीसता है।

हम दोनों ने कई अकादमिक कार्य साथ-साथ किए हैं। अनुवाद संगोष्ठी का आयोजन और उससे संबंधित तीन क़िताबों की तैयारी। श्री मुनींद्र जी के अभिनंदन-ग्रंथ का संपादन। अपने संस्थान और नगरद्वय की अनेक गोष्ठियों – कार्यशालाओं की योजना और उनमें धमाकेदार शिरक़त। तथा संस्थान के पत्रकारिता डिप्लोमा पाठ्‌यक्रम को बनाने से लेकर चलाने - सँवारने तक का काम। जानता हूँ कि मेरे हैदराबाद से धारवाड़ जाने का जितना क्लेश उन्हें हुआ, शायद ही किसी को हुआ हो।

ऋषभदेव जी का मेरे साथ सांसारिक संबंध ही नहीं है, वे मेरी अकादमिक-आत्मा का भी एक हिस्सा हैं; और जीवन के अंत तक रहेंगे। लिखते अच्छा हैं, बोलते उससे भी अच्छा हैं। उनकी आवाज़ में आवेश-जनित खनक होती है। मंच-संचालन भी वे बड़ी तन्यता के साथ करते हैं। कहा जाए, ढीली-ढाली सभा में भी उनका संयोजन जान डाल देता है। हम सब उनकी इस ताक़त को भकुआए ताकते रह जाते हैं। वे अध्यापक, कवि और समीक्षक एक साथ हैं। अध्यापक वे कैसे हैं, यह तो उनके छात्रों से पूछिए। कवि वे संस्कारी हैं। और समीक्षक गंभीर। इन तीनों ही रूपों में उनकी धाक है। पर उनका सबसे उज्ज्वल गुण मुझे लगता है – नया सीखने और नया करने की उनकी अदम्य इच्छा। नया लिखने, नए विषयों पर शोध कराने का जब भी कोई काम उन्हें सौंपा, उन्होंने करके दिखाया, और अच्छा करके दिखाया। निरर्थक गप्पें मारने तो वे कभी घर पर भी नहीं आए। जब आए, कुछ सीखने, कुछ करने, कुछ पढ़ने-लिखने। लगन के साथ काम करने की दीवानगी ने ही शायद हम दोनों के बीच ’ट्यूेनिंग’ बना दी थी। मेरे हैदरबाद से धारवाड़ जाने पर उनकी कमी मुझे बेतरह खलती रही – जैसे दाहिना हाथ कट गया हो। उनके और अपने रिश्तों पर कितना लिखूँ, क्या क्या लिखूँ – कहि न जाय का कहिए।

उनकी कविताएँ मंच से कई बार सुनी हैं। तड़प कर सुनाते हैं। एक-एक शब्द स्पष्ट। उनका उच्चारण बहुत साफ़ है। बोलते समय ध्वनि-लोप भी नहीं होता। औपचारिकता की हद तक वे भाषा को परिष्कृत कर देते हैं। यहाँ तक कि बातचीत भी वे बातचीत के लहज़े में नहीं कर पाते, भाषा का साहित्यिक रूप वहाँ भी सिर चढ़ा रहता है। उनकी यह ’अदा’ मुझे थोड़ी अटपटी भी लगती है पर – जासे जो सध जाय। ’पूर्णकुंभ’ में ’ताकि सनद रहे’’ शीर्षक के अंतर्गत हर माह वे अपनी एक कविता देते थे। उन्हें संगृहीत कर ’ताकि सनद रहे’ (2002) शीर्षक से ही पुस्तकाकार प्रकाशित किया गया है। पूरी पांडुलिपि मैंने देखी थी। प्रसन्नतापूर्वक ’भूमिका’ भी लिखकर दी थी।

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यहाँ पर पहले ‘तेवरी’ (देवराज : ऋषभ : 1982 ई.) और ’तरकश’ (ऋषभ : 1996 ई.) में छपी उनकी तेवरियों पर बात करूँगा। तेवरी की घोषणा में तेवर वाली कविताओं की जो विशेषताएँ गिनाई गई हैं उन्हें मैं कथ्य और भाषा दो स्तरों पर पाठकों की सुविधा के लिए बाँट देता हूँ। कथ्य के स्तर पर यह कहा गया है कि अंसतोषजन्य आक्रोश इसका मुख्य भाव है, रचनात्मक क्रांति इसका लक्ष्य है, व्यवस्था के प्रति आक्रोश इसकी भावभूमि है, दुरभिसंधियों का पर्दाफ़ाश करना इसकी मंशा है और जागृति प्राप्तव्य है। भाषा के स्तर पर इस घोषणा में शैली और शिल्प दोनों पर विचार हैं कि – संप्रेषणीयता इसका मूल धर्म है, ऐसी भाषा जो पाठक की स्मृति में स्थापित हो सके, जो अभिजात प्रवृत्ति से मुक्त हो, जो आम आदमी के मनोभावों से जुड़े, अभिव्यक्ति ’अक्खड़’ हो अर्थात्‌ साफ़-साफ़ बेलाग बात कही जाए, भाषा ग़ैर-सांप्रदायिक, सार्वजनीन और समर्थ हो जो समाज के प्रत्येक स्तर पर संवाद स्थापित कर सके, भाषा के उस रूप को विकसित करना जो सामान्य संपर्क की भाषा होगी। इस भाषा को पाने का तरीक़ा होगा भीड़ के बीच से शब्द उठाना और अभिप्रेत होगा; (श्रोता/पाठक के) मस्तिष्क में उसे बो देना।

इस घोषणा में कथ्य और रूप को समान महत्व देने वाली बात मार्के की है। और इससे भी ज़्यादा समझदारी की बात है इन दोनों को पाठक से सीधे जोड़े रखने की चाहत। अन्यथ इन दोनों को अलग-अलग देखने और बहसने वालों की कमी कभी नहीं रही है। रामचंद्र शुक्ल का यह कथन इस प्रकार की अलगाववादी मनोवृत्ति वालों पर ज़ोरदार टिप्पणी है – “वे समझते हैं कि विचारों का कर्ता एक पुरुष हो सकता है और वाणी या भाषा का दूसरा। ... सो ’विचार’ और ’शब्द’ किसी-किसी की समझ में दो पृथक वस्तुएँ हैं। भाषा के लोकसिद्ध, बेलाग और संवादी होने वाली बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि व्यापकता की दृष्टि से बोलचाल की भाषा में कविता लिखना विशेष उपयोगी है। (मैथिलीशरण गुप्त)।“ ऋषभदेव जी की इन तेवरियों की भाषा नपी-तुली है। उनके विचार भी पारदर्शी हैं और भाषा भी। हिंदी की कविताओं में अक्सर यह दीखता है कि विचारों में धुँधलापन व्याप्त होता है जिसकी छाया भाषा में भी दिखाई देने लगती है और कविता आम पाठक की समझ से बाहर हो जाती है। ॠषभदेव जी संप्रेषणीयता को अगर कविता का मूल धर्म मानते हैं तो अपने लेखन में इसका निर्वाह भी करते हैं – इसे निबाहने में कई जगह सपाटता भी आ गई है या बेतरह बात का बतंगड़ बनाने की प्रवृत्ति भी। पर अधिकतर उनकी ये रचनाएँ समय के अनुरूप हैं और उनके शब्द भावों के अनुरूप। यही गुण उनके काव्य-संसार को निराला की त्रि-आयामी कसौटी पर खरा सिद्ध करता है : (आदर्श कविता वह है) जिसमें कविता का स्वाभाविक प्रवाह, कल्पना की उन्मुक्त गति और स्वतः स्फूर्त भाव गुंथे हुए हों।

’घोषणा’ के अनुसार ही इस पाठ की समीक्षा की जाए तो ऋषभ जी के लिखने की तर्ज़ (स्टाइल), भाषा-प्रयोग में उनकी स्वच्छंदता तथा उनकी कल्पनाशक्ति (इमेजिनेशन) की परख की जा सकती है। और उनकी वैचारिकता भी जाँची जा सकती है जिसमें टुच्ची राननीति, धर्मांधता, सांप्रदायिकता और अपसंस्कृति; अर्थात्‌ क्रूर व्यवस्था के विरुद्ध गुस्सा भी है और भविष्य के लिए उम्मीद भी। प्रतिरोध, इन तेवरियों के मूल में है। और हमारा समय इनमें मुहरबंद है – जब भाषा, धर्म, जाति, क्षेत्र को लेकर घोर संकीर्णतावाद और सनक उभार पर है। हिंसा का वर्चस्व है। सब ओर हत्याएँ हैं।... खाते-पीते संसार में असहमति अपराध है (परमानंद श्रीवास्तव)। अपने विचारों को स्वर देने में ऋषभ की कविताएँ यह सुखद एहसास कराती हैं कि यहाँ लिखी भाषा और बोली जाने वाली भाषा का अंतर कम से कम है। तभी तो संप्रेषणीयता के मूल धर्म का निर्वाह वे कर पाते हैं।

संप्रेषण, भाषा का मूल दायित्व है। ऋषभ ने आम आदमी से संप्रेषण-सूत्र बनाने की ठानी है। हिरनी की आँखों में प्रतिशोधी ज्वाला है, आदमी की बौनसाई पीढ़ियों को/रोज़ गमलों में उगाया जा रहा है, हो गया पत्थर निवाला देख लो, मैं पंक्ति में पीछे खड़ा विराम की तरह, बोझ कितने ही गधों का ढो गया मेरा शहर, एक दूसरे की तरफ़ भौंक रहे हैं लोग, मिमियाना छोड़ो तुम शेर हो गुर्राओ, जैसी पंक्तियाँ स्वतः संप्रेषणीय हैं – इनका टोन (तेवर) आम आदमी की सोच से संबद्ध है। सबसे ख़ास बात है शब्दों का संयोजन – एक तरह का शरारतपूर्ण सहसंयोजन (लक्ष्मीकांत वर्मा) भी, जिसके पीछे से व्यंग्य भी झाँकता है। ऋषभ के इस पूरे पाठ में वाग्वैदग्ध्य (विट), वक्रोक्ति (आयरनी) और व्यंग्य (सटायर) का फिंटा भाषारूप बनता-रचता रहता है। उनके शरारतपूर्ण सहसंयोजन में मात्र आक्रामकता नहीं है, उन्होंने अपने व्यंग्य को नया सामाजिक आशय भी दिया है इसीलिए वह गंभीर है और उसमें जीवित भाषा की गरमाई (परमानंद श्रीवास्तव) भी है। इस व्यापक संप्रेषणीयता की सिद्धि की पहली शर्त है कि (काव्य-कथन) पाठक की स्मृति में स्थापित हो और कविता अपनी ज़मीन से जुड़ी हुई हो। ऐसा तभी संभव है जब पाठ का ढाँचा सादगी में पगा हो और उसकी जड़ें यथार्थ में हों। काँख में खाते दबाये आ गया मौसम, आग लगाकर हाथ सेंकने लड़वाने में माहिर हूँ, तेरी क़लम क़लम नहीं युग की ज़बान है, यह क़लम है खुरपी नहीं/छीलना घास बंद करो, आँखों में आँज दिया कुर्सी ने धुँआ-धुँआ, राजनीति के धनुष से संप्रदाय के तीर, कुर्सी की शतरंज में हत्यारी गोट – जैसी पंक्तियाँ ज़बान पर चढ़ जाती हैं – काँख में दबाना, हाथ सेंकना, समय की ज़बान होना, घास छीलना, आँज देना, राजनीति का धनुष, संप्रदाय के तीर, कुर्सी की शतरंज, हत्यारी गोट जैसी अभिव्यक्तिया ज़मीनी हैं। कविता को सीधे जनता के बीच ले जाने के लिए लोक संवेदना की पहचान और उस पर गहरी पकड़ ज़रूरी है। ये दोनों क्षमताएँ ऋषभ में हैं। (उन्होंने) जनभाषा और साहित्यिक भाषा का भेद मिटा दिया है (परमानंद श्रीवास्तव)। तेवरी की भाषा अभिजात प्रवृत्ति से मुक्त हो और आम आदमी के मनोभावों से जुड़े, ये दोनों शर्तें लोकानुभूति और जन-साधारण से जुड़ाव के माध्यम से ही पूरी हो सकती हैं – जाति पूछ कर बँट रही लोकतंत्र की खीर, क्या पता था खेल ऐसे खेलने होंगे/रक्त-आँसू गूँथ पापड़ बेलने होंगे, बाज़ों के मुँह ख़ून लगा है/ रोज़ कबूतर ये मारेंगे, जूझने का जुल्म से संकल्प दे/आज ऐसी पाठशाला लाइए, उन सबको नंगा करो जिनके मन में खोट, आ गई हाँका लगाने की घड़ी/क्यों अभी तक तू खड़ा खामोश है। ये पंक्तियाँ अपने समय के रू-ब-रू हैं। यह जान लें कि रचना एक समय-यात्रा भी है, पर संवेदन-स्तर पर (प्रेमशंकर)। ऋषभ जी के पाठ में संवेदन का यह स्तर लोक-संवेदना (मिथ) से भी लबरेज है। ये मिथक घोषणा के अन्य पक्षों को भी पूरा करते हैं – अभिजात से मुक्त, आम आदमी के मनोभाव और अपनी ज़मीन से जुड़ी संवेदना मिथकीय संरचना में ढलकर सम्प्रेषणीयता और स्मरणीयता वाले लक्ष्य को भी बख़ूबी साधती है – एक ओर ऋषभ के पाठ में पौराणिक मिथक हैं जो आज लोगों की रग-रग में बसे हैं – कई प्रह्लाद लेंगे आग हाथों पर, रावणों की वाटिका में भूमिजा सीता, राहू चला गुलेल, रावण की नगरी बना आज राम का देश, अश्वमेध वालों से कह दो/अबकी तो लगकुश आये हैं, देव तक्षकों के रक्षक हैं, जनमेजय ने एक बार फिर नागयज्ञ की ठानी है, चीर दी फिर किस जनक ने भूमि की छाती, वोटों का भस्मासुर पीछे पड़ा हुआ है, भीष्म-द्रोणाचार्य सारे रोटियों पर बिक रहे/अर्जुनों का मोह टूटे एक ऐसा युद्ध हो। दूसरे कुछ मिथक लोककथा के रास्ते से भी आए हैं, ये लोक कथाएँ जो दादी-नानी की कहानी के रूप में लोक को घुट्टी में मिलती चली आ रही हैं – क्रूर भेड़िए छिपकर बैठे नानी की पोशाकों में, न्याय को बंधक बनाकर बंदरों का/ वे मिटायेंगे लड़ाई बिल्लियों की। कुछ मिथक इतिहास और साहित्य से भी संबद्ध हैं – मत जयचंदों को दोरंगा होने दो/मेरा शहर गया होरी/खुरपी ले आए धनिया/जग जाएँ गोबर – झुनियाँ/’खुसरो’ कैसे घर जाएगा रैन हुई चहुँ देश।

अक्खड़ अभिव्यक्ति या बेलाग कहने और कथा-संवाद स्थापित करने वाली भाषा के अनेक उपरूप (सब फ़ार्म्स) इस पाठ में मिलते हैं। यहाँ भावों की भिड़ंत (मैथिलीशरण गुप्त) भी दर्शनीय है और सीधा-सादा दृढ़ बयान (परमानंद श्रीवास्तव) भी, दोनों मिलकर ऋषभ की रचनाशीलता को घनीभूत करते हैं। भावों की टकराहट और बयानों की सुदृढ़ता की वजह से ही कई भावों, अनुभूतियों और विचारों का ही नहीं, बिंबों-प्रतीकों का भी दुहराव है इस पाठ में। अक्खड़ता और साफ़-साफ़ बेलाग बात कहने के संदर्भ में इस दुहराव को देखें –

1) बौनी जनता, उँची कुर्सी; एक ऊँचा तख़्त जिस पर भेड़िया आसीन है।
2) देव तक्षकों के रक्षक हैं; मत तक्षक को ऐसे उन्मुक्त विचरने दो।
3) केंचुओं की भीड़ आँगन में बढ़ी/आदमी अब रीढ़ वाला लाइए;मैंने कहा कि हे प्रभो! मैं केंचुआ बनूँ/बदले में सीधी रीढ़ की मुझको सज़ा मिली।
4) श्वेत टोपियाँ पहनकर उगल रहे है रोग;/टोपियों के हर महल के द्वार छोटे हैं;/टोपीवाले नटवर नागर! मेरे तुम्हें प्रणाम;/टोपी वाले बाँट रहे हैं मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे;/कुर्ते का टोपी का कोई विश्वास नहीं।
5) सूर्य की किरणें चलीं लावा बहाने के लिए;जम गया है मोम सारी देह में/गर्म फौलादी निवाला लाइए; जब नसों में पीढ़ियों की हिम समाता है/शब्द ऐसे ही समय तो काम आता है, सूर्य उगा है अब पिघलेगा शहर तुम्हारा।

यही दुहराव संवाद स्थापित करने में भी प्रकट है पर एक अलग तरह से। श्रोता/पाठक को अपने सामने खड़ा करके, उन्हें सम्मिलित करके ऋषभ ने इस पाठ को गुफ़्तगू बनाया है। आइए साहब, मित्रवर, भैया, भैया जी जैसे संबोधन पाठक के लिए हैं और ये पंक्तियाँ –
मित्र! श्वेत टोपी वालों की स्याही में डूबा मन है, टोपियों का चूर कर दें राजमद, बुझे हुए चूल्हों की तुमको फिर से आँच जलानी होगी, फिर क़यामत आज बनकर छाइए साहब, रोटी के हक़ की ख़ातिर तलवार उठाओ रे, तलघरों की क़ैद को तोड़ें चलो, जो फसल में ज़हर भरती उस हवा को चीर डालो।

यहाँ पाठ-विमर्श की दृष्टि से कुछ बातें ख़ास हैं। एक तो यह कि इन तेवरियों की विषयवस्तु राजनैतिक छल,  सांप्रदायिकता और सामाजिक-सांस्कृतिक विघटन से उपजी छटपटाहट है। और इन सबके पीछे यह यथार्थ कि राजनीति लुच्चे-लफंगों का अंतिम आश्रय बन गई है (प्रेमशंकर)। दूसरे यह कि ये विचार इस पाठ में ख़ून की तरह दौड़ते हैं। तीसरे यह कि इनका प्राप्तव्य है जागृति – बस समाज पर एक भयानक चुप्पी छाई है (रघुवीर सहाय) की हालत में कुछ सार्थक बचा लेने की कोशिश (परमानंद श्रीवास्तव) है यह पाठ, जिसमें कविता का ताप भी है गहन मानवीय संवेदना भी। निश्चित ही इस चुप्पी को तोड़ने, जागने-जगाने, कुछ सार्थक बचा पाने के लिए ज़रूरी है ऐसी भाषा का चयन जिसके शब्द भीड़ के बीच से उठाए गए हों और जिनका गहरा प्रभाव जनमानस पर पड़े (मस्तिष्क में उसे बो देना)। ’जागृति’ के आद्य-प्रारूप (आर्कीटाइप) के रूप में ऋषभ ने सूर्य, किरण, धूप, दोपहरी, प्रकाश, रोशनी, रोशनदान को चुना है और इनके माध्यम से अनेक अर्थच्छटाएँ बिखेरी हैं जिनका संबंध सत्य की प्रतिष्ठा, मानव-जीवन और सामाजिक विद्रूपताओं से है – अँधियारे युद्धों में किरणों का मर खपना, रोज़ धूप का क़त्ल हो रहा, दोपहरी इनकी रखेल है/अपने तो साथी साये हैं, रोशनी का इक दुशाला लाइए, बालियों पर अब उगेंगे धूप के अक्षर/सूर्य का अंकुर धरा में कुलबुलाता है, खिल जाय धूप गाँव में हो जाय सवेरा, उग रहा सूरज अँधेरा चीर कर फिर से, मैं सूरज को खोज रहा था संविधान की पुस्तक में/ मेरा बेटा बोला-पापा, रोशनदान ज़रूरी है।

यहाँ ताप भी है, ललकार भी और क्षीण ही सही, आशा की एक किरण भी। ऋषभ का पाठ कहीं-कहीं बड़बोला भी लग सकता है पर यह घुमावदार नहीं है। वह बोलना चाहता है, दुरभिसंधियों का पर्दाफ़ाश करना चाहता है और अ-व्यवस्था के प्रति अपना आक्रोश दर्ज़ करना चाहता है – मैं बोलना चाहता हूँ/वो मेरी ज़बान पकड़ लेताहै : इस तरह मत बोलो/ मैं उँगली दिखाता हूँ कि उधर देखो/उधर ग़लत हो रहा है/वह रोकता है कि उँगली मत दिखाओ/यह ख़तरनाक है (राजेश जोशी : मैं बोलना चाहता हूँ)। ऋषभ अपनी तरह से बोलते हैं, लोकभाषा का सहारा लेकर; लोकभाषा की यह ठसक और स्पष्टोक्ति उनकी पंक्ति-पंक्ति में प्रवाहित है – शीश अपने आग धरती (धरना-रखना – क्रिया एकाधिक जगहों पर प्रयुक्त है), मेह बरसो रे, साँझ परती, छाँह बरगदी, भोर से अंटा चढ़ा कर सो गया मेरा शहर, बहुत मरखनी हो गयी डालो इसे नकेल, उनके पास न कानी कौड़ी फूटा नहीं छदाम, हर कोई बावन गज़ का, पानी उतर चुका सबका, भूख में होता भजन यारो नहीं, कब्र में पाँव लटके हैं कंठ में प्राण हैं अटके, क्या उत्ती के पाथोगे, ऐसी होली खेलियो खींच मुखौटे यार, घर में आग लगाय जमालो, गाल बजाये जाते हैं – जैसी ख़ास देसी रहेटरिक्स, मुहावरों और लोकोक्तियों से बिंधी ये अभिव्यक्तियाँ घोषणा के एकाधिक बिंदुओं के सफल निर्वाह का स्वतः साक्ष्य हैं।

ऋषभ अपनी बात चाहे जैसे कहें सोचते जनहित की हैं – अबकी अगर घर लौटा तो/हताहत नहीं/सबके हिताहित को सोचता/पूर्णतर लौटूँगा (कुंवर नारायण)। ऋषभ का कविता-पाठ सामाजिक अनुभव के प्रति हमें सचेत करता है। उनकी बातों में सार है। उनकी अभिव्यंजना कई स्थलों पर हृदय को हिला देती है। उनका पाठ केवल प्रचार, घोषणा और वक्तव्य नहीं है, वे खुद भी इसमें गहरे रमे हैं – तभी उनका स्वर अलग-सा है – तल्ख़, व्यंग्यभरा, सीधा और तीक्ष्ण। ऋषभ जी की कविता के लिए डॉ. प्रेमशंकर के शब्द उधार ले रहा हूँ जो उन्होंने नागार्जुन की कविता पर विचार करते हुए लिखे हैं, ऋषभ के पाठ के संदर्भ में भी ये सोलह आने सही उतरते हैं : ‘’वे एक निश्छल मन की सहज भावुक अभिव्यक्तियाँ हैं जिन्हें बिना किसी लागलपेट के रख दिया गया है। वहाँ आक्रोश प्रधान है। ... उसका मुख्य आशय अपनी बात जनता तक पहुँचाना है, कबीरी ढंग से।‘’

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अब बात करें उनके तीसरे कविता संग्रह ’ताकि सनद रहे’ (ऋषभ : २००२) की।

सामयिक घटनाओं को पैनी अभिव्यंजना में बाँधकर एक दस्तावेजी संदर्भ देने की कोशिश है ’ताकि सनद रहे’। तात्कालिकता की क्षणभंगुरता के खतरे से इन कविताओं को साफ़ बचाते हुए कवि ऋषभ देव शर्मा ने इनमें भविष्य के अनगिन सपने भर दिए हैं। चुनौती, साहस, संघर्ष और चेतावनी के भावों में पिरोया इस संग्रह का हर मनका अपने में अनूठा है, आबदार है जिसे पैदा करने के लिए भाषा और शिल्प के मँजाव की जिस प्रक्रिया को अपनाया गया है वह कवि के सच्चे और साझे अनुभव की तस्वीर है। कविताओं में मिथकीय धरातल भी यहाँ खूब उभरे हैं। कृष्ण-अर्जुन, दुष्यंत-शकुंतला, नल-दमयंती, कामधेनु, कल्पतरु, प्रह्लाद-होलिका, रावण और नचिकेता एक संसार रचते हैं यहाँ। दंगे, नारी राजनीति और कारगिल जैसे बहुलिखित विषय भी इस संग्रह की कविताओं में वस्तु/काव्य बोध की दृष्टि से टटके लगते हैं। भाषा का तो अचरजकारी प्रयोग है। हिंदी भाषा की बहुस्रोतीय संभावनाओं को कवि ने खन डाला है – फिर बोए हैं अपनी अनुभूतियों के बीज और पोस-पोस कर उगाई हैं कविताएँ। शैली-शिल्प अध्ययन के लिए, मैं समझता हूँ, सभी कविताओं में अकूत संभावनाएँ हैं। सही मायनों में ये कविताएँ हैं क्योंकि न तो ये झंडाबरदारी करती हैं और न ही विद्रोह, क्रांति या कुंठा का छद्मे ओढ़ कर किसी ख़ास पाँत में बैठने को आतुर दीखती हैं। सही, सजग और सन्नद्ध कविता का माकूल ख़ाका है – ’ताकि सनद रहे’।

सामाजिक सत्य से भरेपूरे इस काव्य संग्रह को पढ़कर आपको ज़रूर लगेगा कि केवल विचारधारा या ’इमोशंस’ ही कविता को कविता नहीं बनाते; कविता बनती है – भाषा, शैली और पद के ठेठपन से, ठोस अनुभवों से।

आधुनिकताबोध की सरमायेदार बनी ज़्यादातर हिंदी कविताओं में आज लोक और संस्कृति से जुड़ाव कम हो गया है। कड़वाहट और आक्रोश ने कविता के ऊपरी स्वर को तो तीखा बनाया है, लेकिन कविता बनने का सुख इनसे छिन गया है। यही वजह कविता के जनमानस से दूर होते जाने की भी है। जब हम कवि-रूप में अपने को आम आदमी से ऊपर उठा हुआ मानकर गर्वीले दर्प के साथ और भाषा के ऐसे छलावे भरे रूप में बात करेंगे जिससे जमीनी रिश्ता ही नहीं हो, तो ऐसी कोई भी कृति आस्वाद और टीस दोनों पैदा नहीं कर सकती। इस लिहाज से ’ताकि सनद रहे’ की कविताओं में संभावना दिखाई देती है।

एक तो कवि ने आज के माहौल की सारी विसंगतियों को परखा है और इसके संदर्भों को भारतीय पुराणैतिहासिक कथाओं से संबद्ध करने का अच्छा प्रयास किया है। ऐसा करने से काव्यार्थ की दिशाएँ भी फैली हैं और पाठक के लिए उनकी पकड़ भी आसान हुई है।

दूसरी बात यह कि इन कविताओं े विषय सीधे हमारे आसपास की घटनाओं से लिए गए हैं या हमारी बहुत जानी-बूझी समस्याओं से उठाए गए हैं। इनकी ज्वलंतता में कोई संदेह नहीं है, लेकिन इन्हें अनदेखा करने, इनके प्रति उदासीन रहने की प्रवृत्ति पर चोट करने के कारण भी इन कविताओं का महत्व बढ़ जाता है।

तीसरी बात यह कि किसी भी रचना के लिए पठनीयता का होना, और सिर्फ़ पठनीयता का ही नहीं, संप्रेषण और प्रवाह की निरंतरता का होना बहुत ज़रूरी है जिसके लिए भाषा के सधाव और शैलीय वृत्तियों के कलात्मक उपयोग से कवि को दो चार होना पड़ता है। इन कविताओं में हिन्दी भाषा की व्यापक अभिव्यक्ति क्षमता को कुशलता के साथ इस्तेमाल करने का भाव दिखाई देता है जो और भी मँजकर अधिक अच्छे परिणाम दे सकता है।

ऋषभ देव शर्मा की ये कविताएँ छंदमुक्त होते हुए भी लय की निरंतरता से बँधी हुई हैं। गति के साथ भावों-प्रतिभावों का उन्नयन प्रभावशाली बन पड़ा है। कविता और गद्यभाषा के बीच का संतुलन भी अपेक्षित अनुभूतियों को संप्रेषित करनें में कई जगहों पर सहायक बना है।

इन कविताओं की भावनापरक ऊर्जा कथनों में लिपटकर भी प्रकट हुई है और शाब्दिक छवियों के संश्लिष्ट रचाव से भी। जहाँ एक भाव टूटकर स्थिर होना चाहता है, वहाँ ये दोनों ही प्रक्रियाएँ रंजक तत्व का काम करती हैं। कथनों में मुहावरों का आलोक भी छिपकर झाँकता है जिनमें हिंदी-उर्दू दोनों की साझा विरासत को सम्हाले रखा गया है। कफ़न धारण किए हैं, मूल्य जिनकी उँगलियों पर नाचते हैं, साजिशों में कैद है, कील हम जड़ने चले हैं, बो रहा है आग वह, चीख के होठों पड़ा ताला, सत्य ने खतरा उठाया, मौत से पंजा भिड़ादें, कयामत टूट पड़े तुम्हारे ऊपर, डुबकी लगा गए तुम तो, चोर नज़रों से तुम्हारी ओर देखा – जैसे कथन काव्यसंदर्भ या पूरी कविता की बुनावट में अर्थ भर देते हैं।

इसी तरह इन कविताओं में कई ऐसी शाब्दिक छवियाँ भी उभरी हैं जहाँ दो नितांत भिन्न जातियों के शब्दों का संयोजन विस्तृत भावभूमि को प्रकाशित कर देता है। ऐसे प्रयोग अर्थ की छवियों को भी नया आयाम दे देते हैं। भावबद्धता का यह क्रम काव्यशिल्प को भी प्रखर बनाता है जिसे कवि का भाषाकौशल मानना चाहिए। लाल जबड़े कड़कड़ाती, कुर्सी के कंठ हकलाए हुए हैं, लोभ के पंजे पसारे, चले हम धोने रंज मलाल, कुर्सियों के कान में कलरव पड़ा, मैंने किताबें पहन रखीं थीं, झूठ की चादर लपेटे जल रही होली, वह कामधेनु भी हुई परती-से जो शब्दछवियाँ बनती हैं, वे चित्रात्मक होने के साथ ही भाव के उद्रेक को भी द्विगुणित कर देती हैं। अच्छी बात यह है कि इस तरह के काव्यभाषिक ढलाव में कवि ने भाषा के लोकपक्ष की भी सुध ली है। ऐसा करने से भाव प्रखर हुए हैं और वह कहा जा सका है जो आभिजात्य भाषा उतनी प्रभावी बनकर न कह पाती। क्यों बवाल उठाते हो, जनगण करें धमाल, भींज कर पाँखें, जब शून्य ताके, दूधों नहाई, पौध धान की, नाव काठ की, देह का बाना, जलाकर धर दिया, अपना नाम गोदने के लिए, बैर मत रोपो, बौरा उठे आम्रवन – यह बताते हैं कि लोक भाषा का सही जगह पर एक कोने में किया गया प्रयोग भी पूरे संदर्भ को प्रकाशित कर देता है।

कविताओं के भाव सामयिक हैं और हार्दिक उद्वेग के साथ प्रकट हुए हैं। इसीलिए भावोद्वेलन में सिमटे लघु भाव पुनरावृत्ति से प्रकट करने की जैसी दक्षता कवि ने दिखलाई है, वह इस बात का भी संकेत है कि एक बड़े भाव को किस तरह अभिव्यक्ति के टुकड़ों में बाँटकर फिर से उन्हें संश्लिष्ट करके ’महाभाव’ में परिणत किया जाता है। इस प्रकार की कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करना चाहूँगा :

यह बिंदु है बदलाव का
यह बिंदु है भटकाव का
यह बिंदु है बहकाव का
*****
और हमारा धर्म?
हमारा धर्म क्या है??
क्या ह हमारा धर्म????
***
छ्त गिरा दो
छीन लो छतरी,
मटियामेट कर दो झोंपड़ी भी,
छप्परों को
उड़ा ले जाओ भले।
***
पहली बार छुआ-
महकती हुई धरती ने,
गमकती हुई हवा ने,
लहराते हुए पानी ने,
सहलाती हुई आग ने
और गाते हुए आकाश ने।

इन कविताओं में व्यंग्य, प्रहार, आक्रोश, तल्खी, क्रोध, जुगुप्सा के भाव अंतर्निहित हैं, लेकिन एक अंतर्धारा की तरह। सामाजिक सच्चाइयाँ हैं जिनमें परिस्थितियों ने विसंगतियाँ भरी हैं, लेकिन इनके ऊपर भी ऐसा बहुत कुछ है जिससे बँधकर कलुष को पार किया जा सकता है। ऐसे ही बदलाव की तलाश है ये कविताएँ, जो नारों में समाधान नहीं ढूँढतीं। ये मुड़ती हैं जड़ों की ओर। ये परखती हैं अपने आदर्शों और मूल्यों को; और चेताती हैं भटकाव के उन रास्तों के प्रति जिनका अस्तित्व ही खोखला है। इस पृष्ठभूमि में ’ताकि सनद रहे’ की कुछ पंक्तियाँ देकर अपनी बात कहूँगा :

आदमी तो
भूमि का बेटा,
भूमि पर वह लोटता,
धूलि में सनता,
निखरता धूप में है।
देह से झरता पसीना,
गंध बहती रोम कूपों से उमड़कर।

ये पंक्तियाँ मनुष्य के श्रम और उस श्रम से निर्मित पहचान को उकेरती हैं जहाँ श्रम का संतोष ही आदमी को माथा उठाकर जीने की टेक देता है। व्यंग्य की दो पंक्तियाँ यह जताती हैं कि राजा निर्दोष और प्रजा को दोषी माननेवाली रीति का भीतरी सच क्या है, इस सच की परख कवि ने प्रह्लाद के जरिये की है :

मुकुट तो गलती नहीं करता
केवल प्रजा दोषी रही है।

जो श्रम के भागी नहीं हैं और जो समस्त दोषों से भी मुक्त हैं, उन्हें भी कवि ने चेतावनी दी है कि वे ज़मीन पर उतरें, सबके साथ चलें :

जो चढ़े सिंहासनों पर
भूमि पर उतरें अभी,
हल धरें कांधे,
जो धरा जोते ’जनक’ वह,
वही शासक धरा का
वह धराधिप हो!

कहीं कहीं कविताओं में सामयिक संदर्भ भी प्रमुख बने हैं लेकिन यहाँ भी स्पष्टता और परंपरा से जुड़ाव ने नई काव्यभंगिमा प्रस्तुत कर दी है।
’आपरेशन विजय’ के दो संदर्भ हैं :

युद्ध है अभिशाप
लेकिन
भूमिजा की लाज का जब
हो रहा अब
अतिक्रमण है;
- युद्ध तो अनिवार्य है।
***
साधुवेशी रावणों ने
हरण सीता का किया है,
जाल फैलाया हिरण का,
वध जटयू का किया है।
ये कविताएँ सपनों और आदर्शों का भी अलग धरातल ढूँढती हैं जहाँ एक ओर सामाजिक बोध की स्वीकृति है :

तुम समझने लगे थे अब
माँ और गुड़िया के फ़र्क को।
चाभी के खिलौने और
बाप का अंतर.......
तो दूसरी ओर भविष्य को कुछ दे जाने का संकल्प:
आज यह संकल्प लेकर
रोपता हूँ बीज तुममें,
कल्पतरु अब तुम उगाओ।
कहीं यहाँ ’नीम’ के बहाने पिता की याद है और कहीं ’रंग’ के साथ सकल सृष्टि के सपनों की बात है।
यह देखकर अच्छा लगता है कि ये कविताएँ बिना किसी लागलपेट के खुद बोलती हैं और बहुत साफ बोलती हैं। यह सफाई कुछ कविताओं की संबोध्यता से भी आँकी जा सकती है। कभी पंक्तियाँ सीधे पाठक को संबोधित हैं :
हाथ में रथचक्र लेकर
व्यूह से लड़ने चले हो!
***
तुम न दुहराना कहीं
गाथा वही,
हो न जाए फिर कहीं
अहसास की हत्या!
इंद्र पर भी पाप यह भारी पड़ा।
***
सावधान! होशियार!
कोई अपने घर से बाहर न निकले,
कोई खिड़कियों से झाँकने की
ज़ुर्रत न करे!
***
गलतफहमी है आपको।
सिर्फ़ आधी आबादी नहीं हैं वे।
बाकी आधी दुनिया भी
छिपी है उनके गर्भ में।
वे घुस पड़ीं अगर संसद के भीतर
तो बदल जाएगा
तमाम अंकगणित आपका।
***
कुछ ऐसा करो
कि वे चीखें, चिल्लाएँ,
आपस में भिड़ जाएँ
और फिर
सुलह के लिए
हमारे पास आएँ।
कहीं कविता में अवस्थित पात्र को :
ओ छली दुष्यंत
तुमको तापसी का शाप।
***
घेरकर अभिमन्यु को
तुम मार सकते हो,
किंतु
अर्जुन के
’विजय अभियान’ का
बस एक प्रण है-
अब विजय है – या मरण है;
- युद्ध अब अनिवार्य है!
***
जूझ रहा था जिस समय पूरा देश
समूचे पौरुष के साथ
हर रात
हर दिन
    नए नए मोर्चों पर;
बताओ तो सही
तब तुम कहाँ थे, दोस्त?
कहाँ थे?
***
पिता,
जबसे तुम गए हो
बहुत याद आता है
गाँव वाले अपने घर का
   वह नीम
       जो तुम्हारी उमर का था।

’ताकि सनद रहे’ कविता में पूरे मनुष्य को देखने वाला संग्रह है। पूर्ण पुरुष की संभावना कहाँ होती है, लेकिन कमियों से लड़-जूझ कर ही नई दिशाएँ खुलती हैं – ऋषभ की इन सभी कविताओं में मानवीयता का यह पक्ष सर्वोपरि है; और जो साहित्य मानव और मानवता की धुरी से ही छिटका हुआ हो उसे कविता मानने का मैं तो कोई कारण नहीं देखता।
कवि में एक पाठक की तरह मुझे कई स्तरों पर भावप्रवणता दिखाई दी है। मैं आशा करता हूँ कि भविष्य में यह कवि अपने इस भावबोध को सच्चे भारतीय बोध की नसैनी पर चढ़ाने का प्रयत्न करेगा; और यह भी कि इस पठनीय और रस बोध से युक्त काव्य का हिंदी का साहित्यप्रेमी समाज स्वागत करेगा।

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ऋषभ देव शर्मा के चौथे कविता संग्रह ‘देहरी’ (ऋषभ : 2011) में उनकी चर्चित ‘स्त्रीपक्षीय’ कविताएँ प्रकाशित हैं.

संवेदना यदि कविता का उत्स है तो ऋषभ देव शर्मा की ये कविताएँ संवेदनापरक अभिव्यक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाएँगी. कुछ कविताओं में संवेदना की स्मृतिजन्य उपस्थिति में भावुकता भी दिखलाई पड़ती है. यह ख़ास इसलिए है कि भावुकता प्रकट करने वाली भाषिक अभिव्यंजना आज की कविता से क्रमशः  दूर होती जा रही है.

कहने को तो ये कविताएँ स्त्रीवादी कविताएँ हैं; और अपनी विषयवस्तु में हैं भी. लेकिन ये स्त्री के इर्द गिर्द आकर ही ठहर नहीं गई हैं.  इनमें पारिवारिक संरचना के बदलते स्वरूप की परख है, सामाजिक ढाँचे और मूल्यों के विघटन की आवाज़ है. पुराकथाओं के जरिये पुरुष-स्त्री संबंधों की, और स्त्री की, यातनागाथा की अभिव्यक्ति जैसे घटक भी इस तरह मिलाए हुए हैं कि इनमें स्त्री एक अलग इकाई की तरह नहीं बल्कि धुरी की तरह चित्रित है गोकि  उसकी शोषणक्रिया  के अनुष्ठान कम  ही बदल पाए हैं. कविताएँ इन्हें बदलना चाहती हैं. जो कविताएँ स्त्री की ओर से प्रथमपुरुष में लिखी गई  हैं, उनमें बदलाव की यह  तड़प अधिक मुखर है.

स्त्री की अनेक छवियाँ इन कविताओं में उभरी हैं. आदिवासी से लेकर घर परिवार की, महानगरों की, गाँवों-कस्बों की स्त्रियों  की - घुटन, भीतर भीतर पक रही अनपूरी चाहें जब उनकी ललकार और चुनौती में  बदलती हैं तो यह अलग-अलग कविताओं का संग्रह प्रबंध काव्य का गठन पाता सा लगता है.

कवि ने अनुभूत ही  लिखा है इसलिए हर कविता सच्ची है. झूठ इनमें इतना ही है जितना आए  बिना कोई अच्छी कविता बनती भी  नहीं.


'देहरी' संग्रह की कविताएँ देहरी के भीतर वाली स्त्री के अनेक रूपों का चित्र खींचती हैं और देहरी के बाहर निकल सकने की उसकी इच्छाओं, और इसके बावज़ूद नागपाश की तरह जो सामाजिक रूढ़ियाँ उसे जकड़े हुए हैं उन्हें तोड़ने की जद्दोजहद, को दर्ज करती हैं. साथ ही, देहरी के भीतर जाने और फिर बाहर न निकल पाने की एकतरफा आमद को इस संग्रह की कविताएँ दृढ़ता से नकारती हैं.

- प्रो. दिलीप सिंह
कुलसचिव, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास

सोमवार, 19 अगस्त 2013

फणीश्वर नाथ 'रेणु' पर प्रो. दिलीप सिंह का वक्तव्य



13/14 अगस्त 2013 को केंदीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद में फणीश्वर नाथ 'रेणु' पर केंद्रित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी निवर्तमान प्रोफ़ेसर डॉ.सुवास कुमार के सम्मान में आयोजित थी. पहले सत्र की अध्यक्षता प्रो. दिलीप सिंह ने की. उस सत्र में अन्य मित्रों के साथ अपुन को भी ''आंचलिकता की प्रासंगिकता और हिंदी उपन्यास'' पर बोलने का सुयोग मिला. उसी दिन लंच-काल में प्रो. दिलीप सिंह का यह वक्तव्य रिकॉर्ड किया गया था.साथ ही और भी कई विद्वानों के उदगार. (ऋषभ देव शर्मा)

रविवार, 18 अगस्त 2013

हर कीमत पर आजादी की रक्षा के लिए संकल्पबद्ध हों – प्रो.दिलीप सिंह

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में स्वतंत्रता पर्व संपन्न

हैदराबाद, 15 अगस्त 2013.


स्वतंत्रता दिवस हमें यह याद दिलाता है कि जिस राष्ट्रीय आजादी का हम आज स्वच्छंद उपभोग कर रहे हैं उसे इस देश ने लंबे संघर्ष और भीषण यातनाओं के बाद प्राप्त किया है. संघर्षों का यह इतिहास इस दृष्टि से अनोखा है कि एक ओर हमारे किशोर और युवा क्रांतिकारियों ने उपनिवेशी शासन को सशस्त्र चुनौती दी तथा दूसरी ओर सहनशीलता की चरमसीमा तक अहिंसक आंदोलन ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की इस भावना को प्रमाणित कर दिखाया कि अत्याचारी व्यवस्था को भी अहिंसा की ताकत के सामने आखिरकार झुकना ही पडता है. इस संघर्ष की समस्त गाथा तमाम भारतीय भाषाओं के साहित्य में और लोक की स्मृतियों में सुरक्षित है. आवश्यकता है कि हमारी नई पीढ़ियाँ साहित्य में निहित इस राष्ट्रीय चेतना को आत्मसात करें और मिली हुई आजादी की हर कीमित पर रक्षा के लिए संकल्पबद्ध हों. 

ये उद्गार स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के कुलसचिव प्रो.दिलीप सिंह ने आंध्र सभा में मुख्य अतिथि के रूप में ध्वजारोहण के पश्चात अपने संबोधन में प्रकट किए. इस समारोह में चवाकुल नरसिंह मूर्ति, शेख मोहम्मद कासिम, शेख जमीला बेगम विशेष अतिथि के रूप में शामिल हुए. 

67 वें स्वतंत्रता पर्व के तहत आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि द्वारा महात्मा गांधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण से हुई. इसके बाद ध्वज स्तंभ के समक्ष पूजा का सांस्कृतिक अनुष्ठान संपन्न हुआ और ध्वजारोहण के पश्चात अतिथियों ने अपने उद्बोधनात्मक विचार व्यक्त किए. छात्र-छात्राओं ने राष्ट्र चेतनापरक गीत प्रस्तुत किए. समारोह में सभा के विभिन्न विभागों के व्यवस्थापक, प्राध्यापक, कार्यकर्ता और छात्र उत्साहपूर्वक सम्मिलित हुए. 

आरंभ में आंध्र सभा के सचिव सी.एस.होसगौडर ने मुख्य अतिथि का स्वागत-सत्कार किया. संयोजन प्रो.ऋषभदेव शर्मा ने किया तथा धन्यवाद डॉ.के.बी.मुल्ला ने दिया.



स्वतंत्रता पर्व 2013 by Slidely - Slideshow maker

गुरुवार, 28 मार्च 2013

लोकार्पण : ''भाषा, संस्कृति और लोक''


लोकार्पण समारोह : ''भाषा, संस्कृति और लोक'' [ प्रो. दिलीप सिंह/ वाणी प्रकाशन/2012] : अध्यक्ष- प्रो. केशरी लाल वर्मा; मुख्य अतिथि- प्रो. वी. रा. जगन्नाथन; विशिष्ट अतिथि- प्रो.हीरालाल बाछोतिया, प्रो.गंगा प्रसाद विमल;
 साथ में - एम. सीतालक्ष्मी एवं प्रो.ऋषभदेव शर्मा :
 हैदराबाद: 10 मार्च 2013.
10 मार्च 2013 को दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के हैदराबाद केंद्र में डॉ. दिलीप सिंह द्वारा संपादित ग्रंथ 'भाषा, संस्कृति और लोक' का लोकार्पण-समारोह संपन्न हुआ. अध्यक्ष थे प्रो. केशरी लाल वर्मा और मुख्य अतिथि प्रो. वी. रा. जगन्नाथन. ग्रंथ  की पृष्ठभूमि पर स्वयं प्रो.दिलीप सिंह ने प्रकाश डाला और सामग्री का परिचय प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने दिया.

स्मरणीय है कि कुछ समय पूर्व प्रो.ऋषभ देव शर्मा ने इस ग्रंथ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी अपने ब्लॉग ऋषभ उवाच पर लिखी थी. यहाँ हम उसे उद्धृत कर रहे है....

भाषा, संस्कृति और लोक' : संपादक - प्रो. दिलीप सिंह
- ऋषभ देव शर्मा 

दो महीने से प्रतीक्षा थी इस किताब की. कल जब प्रो. दिलीप सिंह ने ज़िक्र छिड़ने पर औचक ही बैग  से प्रति निकाल कर दिखाई तो मेरा उछलना स्वाभाविक था. 'पं. विद्यानिवास मिश्र स्मृति ग्रंथमाला' [प्रधान संपादक डॉ. दयानिधि मिश्र] के अंतर्गत प्रो. दिलीप सिंह के संपादन में यह पहली किताब आई है. अत्यंत भावुकता और श्रद्धा के साथ उन्होंने सम्पादकीय में लिखा है - मुझे बराबर यह लगता रहा कि उनके अकादमिक व्यक्तित्व को जो भी अर्पित किया जाए वह उनकी विराटता के सामने अपनी लघुता ही प्रकट कर पाएगा.

प्रो. सिंह ने इस कृति ''भाषा, संस्कृति और लोक'' को ''भाषाविज्ञान की व्यावहारिक पीठिका'' उपशीर्षक दिया है जो इसकी विषयवस्तु की स्वतःघोषणा है. पंडित जी के प्रिय क्षेत्रों को ध्यान में रखकर यहाँ सात खण्डों में बीस लेखकों के चौबीस चिंतनपूर्ण आलेख संजोए गए हैं. स्वयं पं. विद्यानिवास मिश्र के ''भारतीय भाषादर्शन की पीठिका'' तथा प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव  के ''आधुनिक भाषाविज्ञान और भारतीय भाषाचिंतन'' , ''भाषिक प्रतीकों की प्रकृति'' और ''धूप की छाँव में : पं. विद्यानिवास मिश्र'' जैसे दस्तावेजी आलेख इस कृति की धुरी हैं जिसके गिर्द अत्यंत विवेकपूर्वक भाषा, संस्कृति एवं लोक विषयक सारी सामग्री को इस तरह संजोया गया है कि पाठक को अपने आप यह बोध होने लगता है कि यह सब मानो पंडित जी के ही विचारलोक का स्वाभाविक विस्तार है - संपादक ने सप्रमाण यह दर्शाया भी है.

इन  सम्मिलित लेखकों में  हैं - प्रो. सुरेश कुमार , डॉ. हीरालाल बाछोतिया, प्रो. कैलाश चंद्र भाटिया, प्रो. गोपाल शर्मा, प्रो. सूरज भान सिंह, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, डॉ. ऋषभ देव शर्मा, डॉ.पियूष कुमार श्रीवास्तव, डॉ. कविता वाचकनवी , प्रो. चतुर्भुज सही, प्रो. जगदीश प्रसाद डिमरी, प्रो. भारत सिंह, डॉ. बलविंदर कौर, डॉ. देव शंकर नवीन, डॉ.अंजू श्रीवास्तव, प्रो. देवराज, प्रो. एम.वेंकटेश्वर एवं प्रो. दिलीप सिंह. 

निस्संदेह 'आधुनिक भाषावैज्ञानिक चिंतन के व्यावहारिक पक्ष को यह किताब जगह-जगह विश्लेषणात्मक पद्धति को अपनाते हुए उजागर करती है. वैचारिक स्तर पर पुस्तक पठनीय है तो आत्मीय धरातल पर पंडित जी के प्रति एक भावभीनी श्रद्धांजलि!' 

भाषा,संस्कृति और लोक 
प्रधान संपादक - डॉ. दयानिधि मिश्र
संपादक प्रो. दिलीप सिंह 
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली 110002
2012 - प्रथम संस्करण 
204 पृष्ठ - सजिल्द
400 /=

रविवार, 30 सितंबर 2012

’अपने पथ पर चलना ही उसका बाना है‘



त्रिलोचन शास्त्री
त्रिलोचन को पढ़ना आपको प्रौढ़ बनाता है। बहुत-बहुत पहले से उनकी कविताएँ बाँध लेती थीं, जब छोड़तीं तो सब कुछ हल्का-हल्का, पूरा पूरा लगता, आज भी लगता है। उनकी कविता का स्वाद उस समय के कवियों से अनूठा था। त्रिलोचन निराशा के नहीं, आशा के कवि बन कर हम नव युवकों को मोह लेते थे। ऐसा वे जब मिलते, तब भी करते थे। त्रिलोचन अपनी राह चले, अपनी अदा से। अगर किसी परंपरा से वे जुड़ते दीख भी पड़ते हैं तो एक हद तक निराला से और कुछ दूर तक नागार्जुन से। मिट्टी, सच, एका और मनुष्यता के वे हर हाल में साथ होते हैं। तभी तो विपदाएँ उनकी आशा और उनके विश्वास के आगे पछाड़ खा-खाकर, हार जाती हैं। उनका दृढ़ कवि व्यक्तित्व हमें अपनी ओर खींचता है, उन जैसा बनने को उकसाता है। वे कठिन कवि नहीं हैं। लोक-समृद्ध कवि हैं। यह कह दूँ कि लोक भाषा का ऐसा समृद्ध उपयोग कहीं और न मिलेगा। लगता है लोग शब्दों और लोक पगे मुहावरों में ही उनके सपने बसे हुए हैं। त्रिलोचन का काई खेमा नहीं है। वे अपने में अकेले ढब के कवि हैं। साफ़, दो टूक, मन की बात कहना कोई उनसे सीखे। वे ‘अपने अंतर की अनुभूति को बिना रँगे चुने’ अपनी आत्मा की अतल गहराई में प्रवाहित भाव-जल में सिझा कर कागज पर उतारते हैं कि उनका दर्द, उनके सपने और उनका आत्मविश्वास सब हमें तत्क्षण् अपने-से लगने लगते हैं। त्रिलोचन का जीवन भटकावों से भरा था संघर्ष, उनके जीवन की सच्ची कहानी था। पर उनका लेखन न तो कभी दयनीय बना और न ही आक्रोश की भट्ठी में जला-भुना। उल्टे वह सध्य और सर्वमंगला बना, खरे सोने की तरह तप-तपकर और-और निखरता गया। और त्रिलोचन की यह पंक्ति सच बनती चली गई कि ’लू लपटों में मिट्टी पक्की हो जाती है।’

त्रिलोचन भाषा के ऐसे सौदागर हैं जो सपने बेचता है। सपने, छोटे-छोटे; अपनाव के,निर्भयता के, गति के, साहबस के, प्रेम के। न जाने कितने सपने, किन-किन के सपने पर सच्चे और संवेदी सपने। इसीलिए त्रिलोचन के लिए कविता विडंबनाओं का मातम करके ‘जीवन को खोना’ नहीं है - ‘कविता तो होना है’ - जीवन से, जीवन में, जीवन के लिए : मृत्यु त्रिलोचन के लिए जीने की चुनौती है और नियति उनकी मुट्ठी में कैद है - ‘घबराना क्यों, जो होने को है/ वह होगा/धूप, ओस, वर्षा से/क्या कोई बचता है।’

त्रिलोचन जीवन के कवि हैं और जीना सिखाते भी हैं। ज़िंदगियों की उन्हें फ़िक्र है। धरती (१९४५) से आगे तक वे जीने का ढंग बताते चले आए हैं। उनके यहाँ प्रकृति और उसके उपकरण ज़िंदगी के उतार चढ़ाव का ही दृष्टांत बने हैं। अपनी, आपकी और हमारी मानवीय कमजोरियों को वे सदा से जानते रहे हैं। ‘तुम्हें सौंपता हूँ’ (१९८५ : राधाकृष्ण) में १९३८ से लेकर १९४६ तक की ग्यारह कविताएँ हैं और १९४७ से  १९६२ तक की तेरह कविताएँ। ‘सबका अपना आकाश’ (१९८७ : राजकमल) में १९४८ से १९६३ तक की कविताएँ संकलित हैं, जिनकी संख्या ५२ है। इनमें से चालीस कविताएँ १९४८-१९५१ के बीच की हैं।  ‘फूल नाम है एक’ (१९८५ : राजकमल) को ९१ कविताओं में से ६६ - १९५४ तक हैं और १५ - १९६२ की। ‘सबका अपना आकाश’ को छोड़ कर शेष दो संग्रहों में शेष कविताएँ ७० और ८० के दशक की हैं।३ कहना यह है कि परतंत्र भारत के अमानवीय माहौल में त्रिलोचन ने मानवता, मनुष्यता और एकता की भावना को स्वर दिया। आजाद भारत के शुरुआती दस सालों में उनकी कविताएँ भारत की नई तस्वीर के प्रति आशान्वित हैं तो उसके बाद की (१९६७ तक की) देश में पनप रही विडंबनाओं पर नज़र रखे हुए हैं। इसके बाद त्रिलोचन आत्मलोचन की ओर मुड़ते हैं, गाँव-नगर के बदलावों को लखते हैं और जीवन की आपाधापी में भूले मनुष्य की पड़ताल करते हैं। वे डगमगाते कहीं नहीं, कभी नहीं। डटने की उनकी मुद्रा रह-रह कर उनकी काव्य-यात्रा में कौंध-कौंध जाती है। बाद की कविताओं में त्रिलोचन की भाषा प्रयोगशील बनी है। उनकी भाषा का नयापन शुरू से ही उठान पर रहा है पर बाद में उस भाषा में निराला जैसी संरचनात्मक तोड़ फोड़ और नागार्जुन जैसी लोक संबद्धता के साथ कहन और संवाद की ही नहीं पत्र की शैली का भी कविता अच्छा खासा स्पेस बनाने लगता है। वे प्रारंभ से ही चीज़ों को आत्मीय बना कर देखने वाले कवि रहे हैं,उनका ‘देखना’ नये कोण से देखना है जिसमें भाषा का वे अपनी तरह से इस्तेमाल करते हैं। काव्य भाषा (कविता की परंपरागत भाषा) और बोलचाल की भाषा दोनों पर उनका अद्‌भुत अधिकार है। इन्हें फेंटना भी वे जानते हैं और अलग अलग कर गाँठना भी। कवि की मुखरता का त्रिलोचन अकेले उदाहरण हैं। वे खूब बोलते हैं। पर सधे हुए स्वर में। उन्हें अपनी भाषा और अपने भावों पर पूरा भरोसा है। वे मौन नहीं जानते और इसीलिए कविता में खुद डूबे रहने की मौनी कवियों की आदत उन्हें नहीं रुचती। वे बात करना चाहते हैं, सब से। अपने मन की कहना चाहते हैं - ‘कवि हो तो अपने ही भीतर रहो न डूबे/डूब गए जो, सबसे वे, सब उनसे ऊबे।’ यह त्रिलोचन का वह काव्य सत्य है जो उन्हें अनोखा कवि बनाता है - त्रिलोचन का कवि बहिर्मुखी है - वह आस-पास की सब चीज़ों, सब लोगों को बाहर से ही नहीं भीतर तक देखता है। इस देखने में भाषा उनका साथ देती है। त्रिलोचन के सारे कविगुण (प्रेम, आस्था, विश्वास, दृढ़ता, संघर्षशीलता,जिजीविषा आदि) भाषा पर उनके अपरिमित अधिकार से जगर मगर करते हैं ; पढ़ें तो गहरे उतर जाते हैं - ‘चलना ही था मुझे - सडक, पगडंडी, दर्रे/कौन खोजता; पाँव उठाया और चल दिया/खाना मिला न मिला, बड़ी या छोटी हर्रे/नहीं गाँठ बाँधी, श्रम पर अधिक बल दिया।’

त्रिलोचन की कविता अपने पाठक से आम संवाद है, नज़दीकी बातचीत। इस बातचीत में इसीलिए वे अपने लोगों का ‘तू’ या ‘तुम’ से संबोधित करते हैं ; ‘आप’ से कभी नहीं। सीधे संवाद का यह पाठ कई तरह के जीवन सत्यों को भिन्न-भिन्न कलेवर में प्रकट करता है। एक कलेवर इसमें ‘गान’ का है। त्रिलोचन ने गीत, ग़ज़ल और सॉनेट तीनों लिखे। मुक्त छंद की कविता तो लिखी ही। वे गीत की ताकत पहचानते हैं। गीत ही उनके यहाँ स्वर, लय, गान का पर्याय हैं और एकता के कारक भी - ‘अपने अपने कंठ किलाओ, गाओ, गाओ, गाओ।’ जीवन संगीत की एक तान स्वर साधना मनुष्य को यह सीख भी देती है कि ‘उन्हें भेंट जो आगे आए।’ जो आगे बढ कर अपनत्व चाहे उसे गले लगाना, तभी संभव है भेद-भाव का मिटना और ऐसे समाज की रचना जहाँ ‘अपनाव ही बने गई अवस्था।’ त्रिलोचन ‘मिलकर गाने’ को जीवन और समाज से अटूट जुड़ने का एक जरिया मानते हैं। इस समूह गान में कहीं कहीं उनका लोक बिद्ध मन भी बिंबित है - ‘आज सुनाना/फिर मिलकर गाना है/शैली बिरहे वाली।’ ‘बिरहा’ भोजपुरी क्षेत्र की एक विरहाकुल शैली है जिसे सुर, उठा उठा कर कई लोग गाते हैं - तब दुःख मानो बँट जाता है और दर्द छँट जाता है। सब अपने हो जाते हैं; अपनों से भी अपने/कवि की प्रकार भी है कि ‘मेरे अपने, अपनों से भी अपने/खुले कंठ से गा तो/नए गीत जीवन के।’ खुले कंठ, यानी अपनी अंतरंग की भीतरी पर्त से - जिसमें न कोई दुःख हो, न बनावट और न ही अनमान मन/सब कुछ बस उन्मुक्त हो, इससे कम कुछ भी नहीं/तभी तो ये जीवन गीत बनेंगे, वह भी नये, नवेले,ताज़ा, टटके। इस जीवन गीत का न अंत है न इति। यह कभी रुकता भी नहीं। साँस की तरह धड़कता रहता है - अनवरत/मरण आए, बिछोड़ा आए जीवन गीत चुकता नहीं, रुकता नहीं - ‘जो छूटे हैं/उनके लिए नहीं रुक जाता है,/गाता है/गति के गान।’ हंस के हवाले से प्रस्फुटित यह पंक्ति सुख में दुख में चलते जाने, आगे बढ़ने और जीवन की गति को न रुकने देने का प्रेरक संदेश है। गति ही जीवन है - यह परम सत्य यहाँ उजागर है। सब चलें, सब बढ़ें, ‘सब अपनी अपनी लय पाएँ’। एक दूसरे के साथ स्तर साधें। ‘कभी तुम्हारा स्वर दुहराएँ’ हम और कभी तुम हमारा। स्वर दुहराओ, कुछ इस तरह कि ‘एक लहर में लहराएँ फिर/कंठ कंठ के गान।’ तभी यह असंभव भी संभव हो पाता है कि ‘गीत कहीं कोई गाता है/गूँज किसी उर में उठती है।’ प्रेम,लगाव और एकता प्रेम की भावना के नतीजे को त्रिलोचन इन शब्दों में दिखाते हैं - ‘गा कर अपने गान स्वरों से आसमान को/मुखर करेंगे और प्यार सबको परसेगा।’ प्रेम की आवाज़ को दिग दिगंत तक मुखरित करने का ऐसा संकल्प विभोर करने वाला है, वही ले सकता है यह संकल्प जो औरों के साथ हो; दिन रात, अहर्निश, पल पल ‘मेरा दिन भी औरों के ही साथ कहीं है।’ एक आदमी की तरह साथ रहने और आदमी की तरह पहचाने जाने की बड़ी छोटी सी अभिलाषा एवज में चाहता है कवि कि - ‘आदमी हम ऐसे हों/कि जिनके बीच रहते हैं/वे भी हमें आदमी कहें/और यों ही सदा जानते रहें।’ आज के अलगाव, बिलगाव और विखंडन के उत्तर आधुनिक समय में त्रिलोचन के इस भाव की फिर फिर पड़ताल और फैलाव ज़रूरी है।

त्रिलोचन जीवन की उत्कृष्टता के हामी कवि होने के साथ ही जीना सिखाने वाले एक बिरले कवि हैं। उनकी कविताएँ इस मामले में मात्र इशारा नहीं करतीं, सीधी और साफ़ भाषा में जीने के गुर समझती हैं। ‘भर दे दुनियाँ को खिलखिल से’ कहने वाले त्रिलोचन अपने आत्मीयों (समस्त मानव समुदाय उनके लिए आत्मीय है) को दुनिया जहान को खुशी देने का पाठ पढ़ाते हैं। सिर्फ ‘देने’ का नहीं ‘खुशी’ से भर देने का, जिसके लिए उनका शब्द ‘खिलखिल’ - अपार और निश्च्छल प्रसन्नता ही खिलखिलाती है। भय, मृत्यु, आलस्य का त्रिलोचन से बड़ा कोई दुश्मन नहीं - साहस, अमरता, गति के वे पक्षधर हैं - ‘बाधाओं की भीड़ देख कर/आधे पथ से फिरना कैसा?/जाने दो जब मरण सदम है,/कायर का-सा मरना कैसा?/दिन न एक रस सदा मिलेंगे/संशय मन में भरना कैसा?’ इन पंक्तियों का एक एक शब्द कितना कुछ सिखा जाता है - ‘कैसा’के प्रयोग से यह सीख निर्भय जीवन का हमारे लिए पथ प्रशस्त कर देती है। और ये पंक्तियाँ हमें साहस, तेज और ओज के अगले पड़ाव पर ला खड़ा करती हैं कि - ‘बाधाओं की ओर न आँख उठाओ/अत्याचारी को निस्तेज बनाओ/ पराजयों में गान विजय के गाओ।’ त्रिलोचन जानते हैं कि तन-मन का आलस्य मनुष्य को जल्दी घेर लेता है। आलस्य से शिथिल लोगों की जागृति ही उसे कर्मठता की ओर, संकल्पों ी ओर, विवेक की ओर मोड़ सकती है, सो, कवि ने पुकार लगाई है - ‘मत अलसाओ/मत चुप बैठो/तुम्हें पुकार रहा है कोई।’ और फिर ‘क्या’ संरचना में लिपटी ये पंक्तियाँ भी - ‘पछताना क्या, थक जाना क्या,/बलसाना क्या, भय खाना क्या,/जब तक साँसा तब तक आसा/यह मंत्र सुनाती हूँ।’ ‘संधा तारा’ के माध्यम से दिया गया यह जीवन मंत्र गाँठ में बाँध लेने योग्य है। और इसी के साथ हताशा और दुःख की जगह जीवन में विश्वास, संकल्प और सुधि (विवेक) को अपनाने का आग्रह करने वाले ये प्रेरक और उद्‌बोधक वाक्य - ‘कब कटी है आँसुओं से राह जीवन की/दीप सा विश्वास ही है चाह जीवन की/साँस है संकल्प, सुधि है थाह जीवन की।’ इसलिए पग पग पर ‘जोत नई उकसाओ/पैर बढ़ाओं।’ इस तरह मानव जीवन को बिखरने न दे पाने की शपथ ले कर चलने वाले कवि हैं - त्रिलोचन। मनुष्य को इतनी चिंता मेरे जाने और किसी कवि ने नहीं की है - ‘सो गया था दीप/मैंने फिर जगाया है’ - जब लिखते हैं त्रिलोचन तो एक पल भी अविश्वास नहीं होता। एक कविता को लगभग पूरा पढ़ा जाय, कवि की जीना सिखाने के सात्विक हठ को तफसील से समझने और जीवन में धारने के लिए - ‘बढ़ो मृत्यु की ओर नज़र से नज़र मिलाओ/डर क्या है, जीवन में जो कुछ कल होना है/आज अभी हो जाय/तुम्हें यदि कुछ खोना है/तो अपने मन का भय/जड़ मूल से हिलाओ/इस दुर्बल तरु को,धक्के अनवरत खिलाओ/इस उस क्षण में उखड़ जाएगा, जो कोना है/इसका अपना, वहाँ साहस बीना है,/फिर इस बिरवे को विवेक-जल सदा पिलाओ.../कितनी सार सँभाल रखो पर जीवन की लौ/बुझती ही है ..... आगे फटती है पो,/कौन कहेगा तुमने सागर व्यर्थ थहाए।’ कोई संशय अब नहीं कि त्रिलोचन कबीर की काशी में जितना रहे, रम कर हरे। प्रेम के बिना आदमी से कुछ न बनेगा। प्रेम कबीर का भी बिंदु है मानवता का और त्रिलोचन का भी - ‘प्यार बीज है, मन बोता है/चीन्ह चीन्ह कर क्षेत्र; कहाँ से वह पाता था/ऐसे ऐसे बीज/बीज कोई खोता है?’ प्रेम ही जीवन है। कवि त्रिलोचन से और इस बहाने सभी कवियों से कहा प्रेम ने ‘कवि मुझको भूले न भूलना/जीवन को सर्वदा रूप मैं देता आया।’

त्रिलोचन की कई कविताओं से उनका जीवन झाँकता है और उनकी सोच भी। आलोचकों ने कहा है कि यह उनकी ‘आत्मपरकता’ है, ‘आत्मग्रस्तता’ नहीं। ‘निराला’ की तरह त्रिलोचन अपनी जंदगी के कड़वे मीठे अनुभवों को ही नहीं प्रकटते; एक मोड़ पर खड़े होकर आत्मालोचन भी करते हैं। इसके अलावा भी सर्जना के पड़ावों पर उन्हें बरग लाने वालों पर व्यंग्य रसे सराबोर टिप्पणियाँ भी करते हैं। त्रिलोचन के इस जीवन सत्य में एक स्तर वह साहस, जुझारूपन और दृढ़ता वाला है जिन्हें साथ ले कर चलने का आग्रह वे अपने प्रियजनों से भी करते रहे हैं - वही भाव ‘मैं’ के साथ इस तरह अभिव्यक्त हुआ है - ‘दूज का है चाँद, तम मेरा करेगा क्या/राह मैं चलता रहूँगा,/ठोकरें सहता रहूँगा,/गिर पडूँगा, फिर उठूँगा,/और फिर चलता रहूँगा;/ठोकरों से, हार से/कोई डरेगा क्या/साथ चाँदी है, न सोना,/कर्म के ही बीज बोना,/खेत काया है, बना है,/और यह अवसर न खोना;/हाथ बाँधे यह लहर कोई तरेगा क्या।’ आत्मालोचन के स्तर पर त्रिलोचन अपने जीवन का लेखा जोखा करने हुए खोने के सत्य से घबराते या हताश नहीं होते, अपनी कमियों कमज़ोरियों से सबक लेकर, कलुष को धो पोंछकर आगे बढते रहने की ठान चलते हैं - ‘जब अपना लेखा जोखा/किया, बात उतराई, खुल कर आगे आई,/इधर उधर में रहा,गाँठ का भी सब खोया।/दिन रहते मैंने सुधि पाई,/और नहीं, अब और नहीं, ढोया तो ढोया। दिन रहते सुधि पाने वाले कवि हैं त्रिलोचन। सुबह के भूले की तरह शाम को लौट पड़ने का विश्वास लिए हुए। आदमी दोषों का पुतला है, पर दोषों को न वह खुद देखना चाहता है; न उसे यह बर्दाश्त होता है कि कोई दूसरा उसके दोषों पर उँगली दसे। त्रिलोचन ऐसे आदमी नहीं हैं - वे खुलकर कहते हैं कि ‘कड़वी से कड़वी भाषा में दोष बताओ/मुझको मेरे; सदा रहूँगा मैं आभारी।’ और अपनी गलतियों का उन्हें भान भी है, और इसका भी कि वे क्यों हुईं - ‘जहाँ जहाँ मैं चूका, थी मेरी लाचारी।’ लाचारी इसलिए कि ‘मेरे मन में एक और मन है जो सारी/बातें उल्ट दिया करता है, सब तैयारी/रह जाती है।’ मन की दुर्बलता किसमें नहीं होती? उसे तो जीतना ही होता है। कहा भी गया है - मन के जीते जीत है मन के हारे हार। त्रिलोचन अपने दुचित्ते मन को जीत कर उलट गई बातों को सीधी कर लेने को दृढ़ संकल्प हैं - ‘मैं फिर अपने को देखूँगा, फिर जो उतरन,/इधर उधर की, इनकी उनकी संचित की है/फेंक फाँक दूँगा।’ त्रिलोचन यह भी कहना चाहते हैं कि मानव मन प्रकृतिकः मैला नहीं होता, वह कलुष बनता है बाहरी तत्वों और प्रभाव से। दिन रहते त्रिलोचन इन उतरनों को चीन्ह तो पाए ही हैं, इन्हें फेंक फाँक देने को उद्यत भी हैं। यह बाहर की मैल कवि त्रिलोचन को सर्जना का अलग बाना धारने को भी ललचाती रही है। वे सामान्य आदमी थे, पर ऊँचे कवि। प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, साम्यवाद के पैरोकार उन्हें अपनी-अपनी ओर खींचने का बहुविध यत्न करते हैं - ‘प्रतिभा नहीं चाहिए, मेरे गट में आओ, इधर उधर मत भटको।’ पर त्रिलोचन का उन्हें कहना है कि ‘आओ, इस प्रगतिवाद को छोड़ें/कविता की बात करें।’त्रिलोचन ने ‘कविता’ के सिलसिले में कभी समझौता नहीं किया और अपने बहलाने फुसलाने वालों पर करारा व्यंग्य भी किया - ‘हो तुम भी घोचूँ ही/भाषा, छंद, भाव के/पीछे जान खपाते हो/पद गया जमाना/इनका/छोड़ो भी/आओ, अब से मन माना/लिखा करो/गद्य ही ठीक है/अब कटाव के/ढब बदले हैं/बोल चढ़े हैं भाव ताव को/ .....विषय नहीं सूझता?/अजी तुम लिख दो‘ढेला’/इसके बाद लिखो ‘हँसता था’/इसके आगे?/बहुत खूब, आ हा, ‘भीनी सुगंध उड़ती थी/फिर नभ में उमड़ा घुमड़ा मेघों का मेला,/सन्नाटा छा गया, धरा पर अंकुर जागे’/यह प्रयोग है, कलम जिधर चाहा मुड़ती थी।’ त्रिलोचन ‘वादों’ की सच्चाई से खूब वाकिफ़ हैं कि वे सब ‘पर्त बनाए/शब्द रचा करते हैं, - वही अर्थ उतराए/जिसकी आकांक्षा हो,/चाल दिखा जाते हैं।’ कविता त्रिलोचन के लिए समाजी यथार्थ को सही बदलाव की ओर मोड़ने और लोगों के दुख-दर्द को पी पी कर जीने का उपक्रम है। वे आशा, विश्वास और साहस के कवि हैं। वे जीवन की नश्वरत को बूझते हैं अतः निर्भय हैं। वे पंत की तरह दूसरे जीर्ण पत्रों के द्रुत गति से झर जाने की अभिलाषा नहीं रखते और न ही निराला की तरह जीवन की सांध्य बेला का मातम करते हैं। वे अंत को सहज देखते हैं और पौढ़े जीवन के दर्प के साथ कह पाते हैं कि ‘बिछे बाग में थे पतझर के टूटे पत्ते,/ऊपर किसलय नई शान से लहराते े/वायु तरंगों में, रह रह कर दिखलाते थे। नई नई थिरकन।/.... हवा बही, सूखे पत्ते बोले, चल, चल, चल/हम सब देख चुके हैं जो तू देख रहा है,/भोग चुके हैं, जिन भोगों की साध जगाए/तू जीवन से लगा हुआ है;/हमें खाद बनना है, विधि का लेख रहा है/इसी अर्थ का, ऊँचे थे हम नीचे आए।’ त्रिलोचन एक अलग किस्म के कवि लगते हैं तो इसीलिए कि वे सच बोलते हैं, पूरे साहस के साथ। उनका कवि सर्वजन के साथ फिरता है। उन्हें सच्चे सपने बेचता है। त्रिलोचन के ये सपने ही उन्हें धरती के जनपद के कवि के रूप में मान प्रतिष्ठा दिलवाते हैं : सपने लो सपने लो/मन चीते सपने लो/जिसका विश्वास टूट गया हो/साथ और कोई न हो/वह मेरे सपने ले/जिसका बल, अवसर पर, धोखा दे जाता हो/वह मेरे सपने ले/जिसको कुछ करने की, भलीभाँति जीने की, इच्छा हो/वह मेरे सपने ले/गाँव-गाँव नगर-नगर गली-गली डगर/मैं पुकार रहा हूँ/सपने लो सपने लो।’ सच, त्रिलोचन की कविताएँ यह सब करती हैं, ढाँढस बँधाती हैं, साथी बनकर दूर तक साथ चलती हैं, बल देती हैं, आत्मविश्वास बढ़ाती हैं, कुछ करते रहने को उकसाती हैं, खालिस जीवन जीने के गुर बतलाती हैं, स्वावलंबन बन कर सीना ताने जीने का साहस देती हैं - ‘नहीं चाहिए, नहीं चाहिए मुझे सहारा,/मेरे हाथों में पैरों में इतना बल हैं,/स्वयं खोज लूँगा किस किस डाली में फल है।’ त्रिलोचन की कविताएँ थके हारों को भी मंजल तक पहुँचने की शाम्र देती हैं - ‘दुनिया का रास्ता अपने पैरों चल लेंगे/मंज़िल तक पहुँचेगे तब जा कर कल लेंगे।’ त्रिलोचन का जीवट उनकी ज़िंदगी और उनकी कविता में भी कूट कूट कर भरा हुआ दिपता रहा है। कविता और जीवन का फर्क चाहे कहीं और मिली, त्रिलोचन की सर्जना में दोनों चंदन पानी की तरह घुलमिल गए हैं।

त्रिलोचन की चार कविताएँ ‘फूल नाम है एक’ में नागार्जुन पर हैं। दोनों एक ही लगते हैं, कई स्थलों पर; कविता में भी, ज़िंदगी में भी। दोनों कभी डरे नहीं किसी से, जूझे और लड़े दोनों। फकीरी दोनों ने स्वेच्छा से वरण की, फिर भी तने रहे जीवन भर। दिखावे, दंभ, तामझाम को अपने पास भी फटकने नहीं दिया दोनों ने। दलित, वंचित दोनों को जानते थे,अपना अपना मानते थे। साफ़गो दोनों थे, जीवन के लिए मरते थे। अपनी अस्मिता का मान करते थे। टूट जाँय, पर झुके दोनों नहीं कभी कहीं, जीवन भर। नागार्जुन के लिए जो भी लिखा त्रिलोचन ने वह सब का सब, जस का तस उन पर भी सच्चा उतरता है 
(१) कहा एक महिला ने, नागार्जुन तो कवि से/नहीं जान पड़ते/आए तो ज्यों ही आए/त्यों ही/घुलमिल गए/ढंग ऐसे कब पाए/थे हमने कवियों के ..../एक मजूर ने कहा,नागार्जुन ने मेरे/बच्चे को बहलाया फिर रोटियाँ बताईं/खाईं और खिलाईं/खुशियाँ साथ मनाईं/गम आया तो आए/टीह टाह की/घेरे/खड़े रहे असीस बन कर/हठ हरा, फेरे/फिरे नहीं, चिंताएँ मेरी गनी गनाई।
(२) नागार्जुन क्या है, अभाव है/जमकर लड़ना/विषम परिस्थितियों से उसने सीख लिया है,/लिया जगत से कुछ तो उससे अधिक दिया है ....../विपदा ने भी इस घर को अपना माना है,/इस विपदा पर कवि ने लहर हँसी की छापी,/आँखों की प्याली छटा स्वप्न की खापी;/अपने पथ पर चलना ही उसका बाना है।
(३) नागार्जुन जनता का है/जनता के बन में/आमग नहीं दिखलाई देता/यह जनधारा/लिए जा रही है उसका .... /पल दो पल को यदि हारा/लोटा पोटा भू पर और/ग्लानि को गारा।
(४) अपने दुख को देखा सबके ऊपर छाया,/आह पी गया, हँसी व्यंग्य की ऊपर आई ../कभी व्यंग्य उपहास कभी आँखें भर आईं/अत्याचार अनप पर नागार्जुन का कोड़ा/चूका कभी नहीं, कोड़ा है वह कविता का/कहीं किसी ने जानबूझकर अनमल ताका/अगर किसी का तो कवि ने कब उसको छोड़ा।

त्रिलोचन की अभिव्यक्तियों का संसार भी बहुरूपी और अनोखा है। कविता का सौंदर्य आँकना भी उन्हें आता है और खुलकर कहना भी। खुलकर कहने में त्रिलोचन मुहावरों का खूब प्रयोग करते हैं। हिंदी के कविता इतिहास में इतने सारे मुहावरों का ऐसा सधा प्रयोग किसी कवि में नहीं मिलता। किसी हिंदी कथाकार के पास भी शायद ही इतने मुहावरे मिलें। काव्य सौंदर्य बड़ी सरलता से त्रिलोचन पैदा करते हैं कि पंक्तियाँ याद रह जाती हैं :
·         शिशिर काल के कुहरे पर जब चित्र सुनहले/रवि अपने कर से लिखता है
·         उष्ण करों से सूर्य धरा को सहलाता है
·         खेती के ऊपर सोने का पानी छाया
·          चाँद/ढिबरी के गाढ़े धुएँ जैसे/बादलों में था/
प्रवाह/बादलों का आज खर था/चाँद लुका छिपी खेलता सा/लगा/ 
हवा/ठंडी-ठंडी देह-मन को जुड़ाती हुई/आती/जाती
·          बादल घिर आए/ताप गया पुरवा लहराई/
दल के दल घन ले कर आई/जगीं वनस्पतियाँ मुरझाई
/जलधर तिर आए
·          बरखा, मेघ-मृदंग थाप पर/लहरों से देती हैं जी भर/
रिमझिम रिमझिम नृत्य ताल पर/पवन अथिर आए
·          पुर-पुर गई दरार/शुष्कता कहाँ खो गई

लोक सिद्धता इन सुंदर प्रकृति चित्रों में भी त्रिलोचन की मुखर है। ढिबरी का गाढ़ा धुआएँ शहरी प्रतीक नहीं है, लुकाछिपी का खेल, जुड़ाना क्रिया, पुरवा का लहराना, दरार का पुरना,लोक अनुभव की जमीन से उपजी अभिव्यक्ति हैं। ऐसे ढेरों उदाहरण त्रिलोचन की कविताओं में मिलते हैं और सिर्फ़ उन्हीं में मिलते हैं। लोक शब्दों, लोक अनुभवों, लोक जीवन को त्रिलोचन ने भाषा में कुछ इस तरह लपेट दिया है कि काव्यार्थ में चमक आ गई है और अभिव्यंजना टटकी हो गई है। कविता में मुहावरेदानी का ऐसा ही लोक सम्मत जादू त्रिलोचन जगाते हैं। ऐसा करने से भाव जाग जाते हैं, अनुभूतियाँ चौकन्नी हो जाती हैं और काव्य भाषा एक तरह के अद्‌भुत आस्वाद से भरीपूरी हो जाती है :
·         दुख तो तिल से ताड़ जल्द हो जाते हैं
·          जीवन में तुमने भी कितने पापड़ बेले
·          जैसी हाट, बाट वैसी है/क्यों फिर थोड़ी सी आस बाँध ली पल्ले
·          होड़ा होड़ी जहाँ मची है
·          जिसकी तकदीर तान कर सोई है
·          तबियत खट्टी आज अहिंसा की है
·          शांति की सट्टी मंद पड़ी है
·          डाँटा फटकारा चिंताओं को/’अब जाओ,/जहाँ तुम्हारा जी चाहे, हुड़दंग मचाओ,/मेरी जान छोड़ दो/आह कहाँ कल पाई/मैंने पल भर को भी
·         हाट पहुँच तो गए टेंट में दाम नहीं है
·          अपना गला फँसाकर मैंने भर पाया है
·          चाभो माल, बनाओ उल्लू, मौज से जियो
·          ठोक बजा कर देख लिया, कुछ कसर न छोड़ी/दुनिया के सिक्के को बिल्कुल खोटा पाया
·          अचरज है मुझको कि त्रिलोचन कैसे/इतना अच्छा लिखने लगा ... /एक फिसड्डी आकर अपनी धाक जमाये/देख नहीं सकता हूँ मैं यों ही मुँह बाये?
·          पर यह कथन बहुत सच्चा है,/इसका अंश न कुछ कच्चा है
·          खींचानोची मची हुई है अपनी अपनी
·         कौर छीनकर औरों का जो खा जाते हैं
·          यहाँ माल है जिसका चोरना/वह दूकान चला पाता है
·          कसम जवानी की यदि/मैंने पाँव हटाए।

जो काव्य पंक्तियाँ इस आलेख में यहाँ वहाँ उद्घरित की गई हैं उनमें भी मुहावरेदानी मिल जाएगी। उन मुहावरों को त्रिलोचन ने तरजीह दी है जो आम जन की व्यावहारिक भाषा का अहम हिस्सा बन चुके हैं। सबसे बड़ी बात है संदर्भ में वांछित अर्थ पैदा करने और सकुशल पाठक तक पहुँचाने के लिए ढेरों-ढेर मुहावरों का कविता की पूरी संरचना में सटीक संयोजन। क्योंकि कविता भाषिक तत्वों के जमान से नहीं, उनके परस्पर और समजस्वीकृत संयोग से बनती है।

त्रिलोचन का भाषा संसार अत्यंत समृद्ध है। संस्कृत से लेकर बोली तक की शब्द शक्ति की उन्हें गहरी पहचान है। वे भाषा के भीतर रहने वाले कवि हैं। एक एक शब्द की आत्मा उनकी पहचानी हुई है। नयापन उनकी काव्य भाषा की विशेषता है। विराम चिह्नों का प्रयोग उनकी काव्य भाषा में खूब हुआ है, पदों और वाक्यों की तोड़ कर संयोजित करने में वे इनका कुशल प्रयोग करते हैं। शब्दों की जात को पहचान कर उन्हें अर्थगर्म बनाना सिर्फ और सिर्फ त्रिलोचन ही जानते हैं। भाषा की जातीयता त्रिलोचन के कवि के लिए पहली और आखिरी कसौटी है। अवधी और भोजपुरी शब्दों की ताकत वे पहचानते हैं। बोली-शब्दों के उच्चरित रूप को उन्होंने कविता की जय बनाने के लिए बखूबी शामिल किया है। अन्य स्रोतों के शब्दों को भी वे लोक प्रचलित ध्वनि भेद के साथ अपनी कविता में ले आने में संकोच नहीं करते। भाषिक विधान के कारण ही उनकी कविता औरों से हट कर लगती है। भाषा के आभिजात्य में उनका तनिक भी विश्वास नहीं है। उनकी कविता ज़मीन की भाषा को अपनाती है। जिस भाषा में वे सोचते हैं, उसी में लिखते हैं और जिस भाषा में वे लिखते हैं उसे (उस) जनपद के लोग बूछते समझते हैं। कुल मिलाकर कहें तो त्रिलोचन की भाषा के अपने निजी संस्कार हैं। यह भाषा आम कंठ की वाणी है जो कवि के स्वर में फूटी है। त्रिलोचन की काव्य भाषा गहरे विश्लेषण की माँग करती है। फिलहाल कुछ नये नये से भाषिक संगठनों को प्रकार के रूप में देखते चलें :

प्रकार : I
१.  चुप हो जा/ऐसे मैं निकालता हूँ कि/दर्द तो भाई अलग,/
तुझे मालूम भी न होगा,/कब आई और मोचनी खींच ले गई (मोच)
२. मन इतना टेकी/रहा कि तड़पा किया (टेक धारण करने वाला)
३. वह ऐसी डाही है (डाह करने वाली)

प्रकार : II
१.  बाहर का डर भीतर के खग को न तरासे/
शांति सुमति हो, दुःख कभी मन को नगरासे ...। मन में न हरासे (त्रासे, गासे, ह्रासे)
२. कैसा युग है, कहीं अकन लो, हाय हाय है (आँक लो)
३. सुबह सुहाई देख उधर तो (सुहावनी)
४. क्या इस जन से रूछे (रूढ़े, अलग)
५. मँजर गये आम
६. पत्ते पुराने पियरा चले
७. मैंने हहास सुना आसमान का (अट्ठहास)
८. ढर्रा नोखा है (अनोखा)

प्रकार : III
१.  इन दिनों क्या कुछ नए झमेले/तुमको घर रहे हैं
२. अब ढहते हैं मन के/मोहक महल
३. तुमने महिमा की सर्वत्र कनात तनाई
४. सब कुछ स्वार्थ-सूत्र में नाधा
५. हाथ मैंने उँचाए हैं
६. डर नहीं है/हँसा जाऊँगा
७. सोच लो, जो बीज बोओगे तुम्हें लुनना पड़ेगा
८. अपराए हैं तो तराए भी हैं ये/आप आ गए हैं बराए भी हैं ये
९. मौन रह कर टोया था/टीस जहाँ उठती थी
१०. आज प उठती थी
१०. आज अँगडा रही है

प्रकार : IV
१.  तुम तो जैसे थके थकाए भरपाए हो
२. यह अपना घर है जिसमें टोटा/ही टोटा है
३. घोर घाम है, हवा रुकी है। सिर पर आ कर सूर्य खड़ा है

प्रकार : V
१.  अभी चला क्या, बहुत, बहुत आगे, चलना है। दुबिधा छन ही जाएगी
२. ऊना मन, चू उठी नीरवता
३. खिसक चली रात/नखत चले,/उठा अलस/नियति हिली,/हँसी प्रात
४. रामनाथ का मकान बैठ गया है
५. फेरे करते रहे, पाँव उनके खिया गए
६. धर्मशाला की कुर्सी ऊँची है
६. कोई राग तुम कढ़ा दो/आशा म नहीं जाएगी

प्रकार : VI
युतियाँ (युक्तियाँ), नाराज़ी (नाराज़गी), अथिर (अस्थिर), प्रात (प्रातः), अपनाव (अपनत्व), मुसका कर (मुस्कुरा कर), आकास (आकाश), जोत (ज्योति), अभिलाष (अभिलाषा),बरस (वर्ष), नश्वत (नक्षत्र)

त्रिलोचन की कविताओं का बड़ा हिस्सा छायावाद की छाया में पला पुसा है अतः छायावादी शब्द समूह को उन्होंने पर्याप्त स्थान दिया ै जैसे - बादल, घन, जलघर, बरखा, पवन,दादुर, मोर, पपीहा, समीर, इंद्रधनु, कंठ, गान, पावस, मधु, संध्या, प्रात, राका, शारदा, ज्योत्स्ना, चाँदनी,लहर, उपवन, सुषमा, शरद, पारिजात, बेला, कपोत, दीप, ज्योति, स्नेह, मंजरियाँ, नीड़, खग, भोर, सरोवर,भौंरे, क्षितिज, उषा, विहग, नीरव, छाया, तम, व्योम, ओस, गुंजन, पुष्प, मझर, सरिता, सुमन दल, नव,प्राण, प्रभा, ज्योति पथ, धारा तिमिर, उमा, विजन, हास, बीन, लय, झंकार, तरंग, तारक, स्निग्ध, श्याम धन, उत्ताप, काकली, मौन, दृग, मलिन, दूब, किरण, पथिक, उद्भ्रांत, एकाकी, पंक, आनंद, रस, शतदल,सम्मोहन, निर्जन, वाणी, मधुगीत, पीडा, अश्रु, हास, पथ, निशा, उषा, अरुण, प्रभा, मेह, पिक पंकज, राव,गंध, तान, आभा, झंकार, आँसू, अमृत।

एक तो यह कि कवि को अपनी काव्य परंपरा के भाषिक उपादानों का भान होना चाहिए और वह त्रिलोचन में अकूत है। दूसरे यह कि इस शब्द समूह को उन्होंने नये भावों की उद्भावना के लिए नये अर्थ संधान के साथ अपनी काव्य भाषा में बुना है। अधिकांश कवि नव्यता को परंपरा से कटाव और आधुनिकता को जातीयता से अलगाव के रूप में लेते हैं और चुकते हैं। त्रिलोचन ने आधुनिक यथार्थ बोध को प्रकटाने के लिए परंपरा से पराप्त शब्द भंडार को पड़ताल ी, और जाँच परख कर नये संदर्भ और नया काव्योन्मेष पैदा किया। कुछ उदाहरण देखें -
·         पथ पर चल कर जो बैठ गए/वे क्या देखेंगे प्रात नए
·          ये अनंत के लघु लघु तारे/दुर्बल अपनी ज्योति पसारे/अंधकार से कभी न हारे
·          आओ,/अच्छे उमगे समीर,/जरा ठहरो/फूल जो पसंद हो उतार लो/शाखाएँ,टहनियाँ,/हिलाओ, झकझोरो,/जिन्हें गिरना हो गिर जाँय/जाँय जाँय
·          कहीं एक भी दुःख न रहने पाए/नई उषा आई है आज जगाने
·          गान बन कर प्राण ये कवि के तुम्हारे पास आए
·          अमृत प्राण का अति दुर्लभ है देखो कहीं न चुकने पाए
·          मेघ ने सित छत्र ताना/वायु ने चामर हिलाए/इंद्रधनु नत सूर्म ने दी/चंद्र ने दीपावली की/तुम न हारे देख तुमको दूसरे जन भी न हारे
·          झूम रहे हैं धान हरे हैं, झरती हैं झीनी मंजरियाँ/खेल रही हैं खेल लहरियाँ/जीवन का विस्तार है आँखों के आगे
·          गया स्नेह भी और रह गए आप निखट्टू
·          लतिका द्रुम में नूतन फूल लगाओ
·          रस भरने को रस जीवन का सुखा दिया है

त्रिलोचन के कथ्य और भाषा में जो लोच और लय है वह आम आदमी से उनकी रूहानी प्रतिबद्धता का ही नतीजा हैं। वे किसानों और दलितों को अपना बना कर रचने वाले हिंदी के कुछ गिने चुने कवियों में से एक थे। वास्तव में त्रिलोचन गँवई थे और वैसी ही धजा में जिये भी। उनकी कविता भी गाँव के ठेठ देहाती की नज़र से देश, दुनिया और प्रकृति को देखते हुए बनी है। हिंदी के किसी कवि ने शायद ही कभी लिखा हो कि ‘गीत गड़रियों के सुन सुन कर दुहराऊँगा।’ इन गीतों को लोक भीनी खुशबू त्रिलोचन की कविता में किसी न किसी स्तर पर रची बसी है। वे इस गड़रिये के गीत को दूर-दूर से सुन कर मुतासिर नहीं हुए हैं - उसके जीवन को और खुद उसे भी अच्छी तरह जानते हैं - ‘गाता अलबेला चरवाहा/चौपायों को साथ संभाले/ ... नए साल तो ब्याह हुआ है। अभी अभी बस जुआ छुआ है/घर घरनी परिवार है आँखों के आगे।’उनकी एक कविता में फेरू की कहानी है। वह ठाकुर साहब के यहाँ काम करता है। ठकुराइन काशीवास करके लौटी हैं - ‘फेरू अमरेथू रहता है/वह कहार है .../कहा उन्होंने मैंने काशीवास किया है/काशी बड़ी भली नगरी है/वहाँ पवित्र लोग रहते हैं/फेरू भी सुनता रहता है।’ दलित विमर्श की इतनी मार्मिक और इतनी कम बोलने वाली कविता भी आज के शोर शराबे वाली दलित रचनाओं में ढूँढनी पड़ेगी, मिल सकेगी, ऐसा लगता नहीं। उनकी एक और कविता ‘प्रेरणा’ (तुम्हें सौंपता हूँ) ऊपर कहे सब कुछ को उभार देती है - ‘मेरी कविता कल मुसहर के यहाँ गई थी/मैं भी उसके साथ गया था जो कुछ देखा/लिखा हुआ है मेरे मन में जब घर लौटा/तब मुझसे नाराज हुए जो बड़े लोग थे/उनकी वह नाराज़ी मैं चुपचाप पी गया/वे समझे मैं समझदार हूँ इसी राह से/चला करूँगा जिस पर सब चलते आए हैं/पर मुझको उसकी कुटिया ने और बुलाया/पाँव दबा कर अबकी उसके यहाँ मैं गया/टीहुर की बातें कानों पी असी साल का/जाड़ा बरखा घाम खा चुकी थी वह वाणी/अब केवल साँसें थीं अब केवल वाणी थी। अब केवल वह कुटिया थी जिसमें बैठा था।’ टीहुर की जाड़ा बरखा घाम खा चुकी अनुभवी वाणी ही त्रिलोचन की कविताओं का सरमाया है। फेरू, टीहुर या घीसू, गोबर त्रिलोचन से यह मासूम-सा सवाल भी करते हैं कि ‘घर में कविताएँ/क्या कभी काम आती हैं/क्या इनसे दाल छौंक सकते हैं/हल्दी का काम/क्या इनसे चल सकता है।’ और त्रिलोचन का उन्हें जवाब मिलता है कि - मैंने तो व्रत ले रखा है तुम सब के लिए; मिट्टी के पुतलों में दिव्य अभिमान भरने का और थोड़े संकल्प भी किए हैं - चाहता हूँ तुम भी इन्हें शपथ, प्रण और व्रत की तरह अपने जीवन भर धारे रहो - ‘जो उठाई है ध्वजा झुकने न देना/जो दिखाई है प्रगति रुकने न देना/जो जगाई शक्ति है लुकने न देना/जो लगाई लौ कभी चुकने न देना।’

त्रिलोचन जैसा पर दुख कातर और जन उपकारी कवि ही यह कह सकता था कि ‘यही विनय मेरी है, मुझे याद मत रखना/अपने किए सँजोए का संचित फल चखना।’ कवि त्रिलोचन तुम्हें जानने मानने वाले हम सब अपने कर्मों से बँधे अपनी-अपनी डगर चल रहे हैं। तुम्हारी कविताओं ने हमें जीने का सहूर सिखाया है। पर क्षमा मिले गुरु, तुम्हें याद न रखने वाली तुम्हारी बात हम न मान सकेंगे। तुम शरीर से पास हो न हो, तुम्हारा काव्य तुम्हारी ही तो छवि है। तुम्हें याद रखने को वो ही बहुत है उस जमीनी काव्य की भलमानस बनावट को कैसे भूल सकेगा कोई। तुम तो कह कर चल दिए। पर एक बात कह दें तुमसे; चाहे तो इसे अवहेलना ही समझो, तुम क्यों न अपनी कि 
‘इन दिनों तुम बहुत याद आये,/
जैसे धुन राग के बाद आये।’;